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साहित्य जगत

अंधविश्वास के आगे

आस्था और विश्वास, दोनों शब्दों के अपने गहरे अर्थ हैं। आस्था एक विश्वास को जन्म देती है, वह एक पड़ाव है, जहां से कोई यात्रा शुरू कर सकता है। परंतु हर विश्वास सच होगा, ऐसा समझना मूर्खता के अलावा कुछ और नहीं  है। आस्था की ही तरह अनास्था भी एक तरह का विश्वास ही है। यह भी कहना ठीक नहीं कि अनास्था हमेशा सच की जमीन पर खड़ी रहती है। आगे की यात्रा के बिना अनास्था भी आखिरकार जड़ता की ओर ही ले जाती है, गहरे अंधेरे कुएं में ढकेल देती है। हर व्यक्ति अपनी कुछ आस्थाओं के साथ जीता है। कुछ परंपरा से मिली हुईं, कुछ उसकी खुद की गढ़ी हुईं। आस्था हो या अनास्था, अगर उसकी यात्रा विश्वास या अविश्वास पर जाकर खत्म हो जाय, तो समझो वह अंधविश्वास की जड़ता से बाहर नहीं है। बिना तर्क के विश्वास और अविश्वास, दोनों ही व्यक्ति को जड़ता की पथरीली जमीन पर ला पटकते हैं।

आस्था और विश्वास, दोनों शब्दों के अपने गहरे अर्थ हैं। आस्था एक विश्वास को जन्म देती है, वह एक पड़ाव है, जहां से कोई यात्रा शुरू कर सकता है। परंतु हर विश्वास सच होगा, ऐसा समझना मूर्खता के अलावा कुछ और नहीं  है। आस्था की ही तरह अनास्था भी एक तरह का विश्वास ही है। यह भी कहना ठीक नहीं कि अनास्था हमेशा सच की जमीन पर खड़ी रहती है। आगे की यात्रा के बिना अनास्था भी आखिरकार जड़ता की ओर ही ले जाती है, गहरे अंधेरे कुएं में ढकेल देती है। हर व्यक्ति अपनी कुछ आस्थाओं के साथ जीता है। कुछ परंपरा से मिली हुईं, कुछ उसकी खुद की गढ़ी हुईं। आस्था हो या अनास्था, अगर उसकी यात्रा विश्वास या अविश्वास पर जाकर खत्म हो जाय, तो समझो वह अंधविश्वास की जड़ता से बाहर नहीं है। बिना तर्क के विश्वास और अविश्वास, दोनों ही व्यक्ति को जड़ता की पथरीली जमीन पर ला पटकते हैं।

अमूमन यह माना जाता है कि आस्था और विश्वास तर्क को मार देते हैं। यह नासमझी कुछ संगठित गिरोहों ने पैदा की है। आम तौर पर कुछ सवालों को वे बहस के दायरे से बाहर रखना चाहते हैं और ऐसे मामलों में वे फतवा दे देते हैं कि यह आस्था का प्रश्न है, यह विश्वास का सवाल है। यह बिल्कुल गलत धारणा है। हर समाज में, हर देश में कुछ चीजें, कुछ मान्यताएं पारंपरिक तौर पर लंबे समय से पीढ़ी दर पीढ़ी श्रुत और स्वीकृत चली आ रही होती हैं। वे रूढ़ हो जाती हैं और मानने या न मानने की पूरी आजादी के बावजूद ज्यादातर लोग उन्हें इसलिए मान लेते हैं, क्योंकि उनके पुरखे भी उन्हें मानते आये हैं।

मसलन कुछ महाकवियों ने अपनी भव्य और आकर्षक काव्य कल्पना से राम के चरित्र को भगवत्ता दे दी, उनके साधारण नायकत्व को चमत्कारिक असाधारणता प्रदान कर दी और लोग मानने लगे कि राम भगवान थे, हैं भी। धीरे-धीरे यह आकर्षक कल्पना रूढ़ हो गयी। तमाम लोगों की इस स्थापना में आस्था है, विश्वास भी। पर केवल यह विश्वास क्या राम को किसी के सामने भौतिक रूप में खड़ा कर सकता है? ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी सामाजिक समूह ने एक साथ राम को पा लिया हो या वे स्वयं आकर उनके सामने खड़े हो गये हों यह कहते हुए कि लो मैं राम हूं, आ गया तुम्हारे पास, तुम्हारे सामने, तुम्हारा दुख हरने, तुम्हारी पीड़ा नष्ट करने।

कोई भी आस्था, कोई भी विश्वास अपने आदिम या प्रारंभिक रूप में सच नहीं होता। वह न भूगोल का हिस्सा बन सकता है, न ही इतिहास का। दोनों के लिए तर्क चाहिए, प्रमाण चाहिए। इसीलिए विश्वास एक नयी यात्रा का आरंभ है। विश्वास की पुष्टि तर्क से ही हो सकती है। हमेशा से तर्क खोज का एक आवश्यक उपकरण रहा है। खोज विश्वास से भी प्रारंभ हो सकती है और अविश्वास से भी, आस्था से भी शुरू हो सकती है और अनास्था से भी। इसमें किंचित भी अवैज्ञानिक नहीं है। आकस्मिक आविष्कारों के अलावा विज्ञान भी अपनी हर खोज किसी परिकल्पना से शुरू करता है। उसकी हर परिकल्पना सकारात्मक होती है। वह एक भौतिक सच की कल्पना करता है और फिर अपने प्रयोगों और तर्कों के सहारे उसकी हर संभावना की पड़ताल करता है। सच होने पर वह अपनी परिकल्पना को स्वीकार कर लेता है अन्यथा दूसरी परिकल्पना करता है। ऐसा कोई भी भौतिक सच हर देश, काल और परिस्थिति में, हर व्यक्ति या समूह के लिए हमेशा अपने तर्क पर खरा उतरता है। विज्ञान इसीलिए जब तक तार्किक यात्रा पर होता है, सांप्रदायिक नहीं होता। मान लीजिये अगर कभी वह बिना प्रयोगों के किसी परिकल्पना को सच घोषित करने की कोशिश करे तो वह भी एक तरह का अंधविश्वास ही रचेगा।

अमूर्त या दार्शनिक विषयों पर आस्था और अनास्था, विश्वास और अविश्वास  की पूरी गुंजाइश रहती है। कोई चाहे तो माने, चाहे तो इनकार कर दे। विश्वास और अविश्वास, दोनों ही स्थितियों में स्वीकार्य तर्क की खोज करनी होगी। पहले को होने का तर्क चाहिए तो दूसरे को न होने का। जब तक तर्क नहीं है, दोनों ही अंधविश्वास की कगार पर खड़े हैं। हो सकता है, स्वीकार गलत हो, हो सकता है, अस्वीकार। संभव है, स्वीकार करके आगे बढ़ने वाला अस्वीकार के शिखर पर जा खड़ा हो या अस्वीकार से अपनी यात्रा शुरू करने वाला स्वीकार के आस-पास। जिस आस्था का कोई तर्क न हो, वह स्वीकार्य नहीं है। इसी तरह तर्कहीन अनास्था भी स्वीकार्य नहीं।

इसी अर्थ में आस्था और अनास्था, विश्वास और अविश्वास, अगर अनुसंधान का अवसर न दें, अगर आगे की खोज का मार्ग प्रशस्त न करें, तो उनका समाज के लिए कोई मूल्य नहीं है। आदमी की मूल चेतना अनुसंधान की है। वह या तो विश्वास करता है खोज करने के लिए या खोज करता है विश्वास के लिए। जो भी मनुष्य की इस मौलिकता को नकारते हैं, वे कुछ ऐसा थोपना चाहते हैं, जिसमें उनका कोई गहरा हित है। तर्क और खोज के बिना किसी समाज की न भौतिक प्रगति हो सकती है, न ही वह वैचारिक संपन्नता हासिल कर सकता है। आस्था उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी अनास्था क्योंकि दोनों ही तर्क का अवसर देते हैं, खोज के लिए प्रेरित करते हैं।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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