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अखबारों में पांच किमी बाद की खबर नहीं मिलती

अखबार सुबह हाथ में आता है और हमें पता चलता है कि मेरे पड़ोस में क्या हुआ लेकिन सिर्फ पांच किलोमीटर के [caption id="attachment_2171" align="alignright"]न्यूज पेपरन्यूज पेपर[/caption]दायरे में। इसके बाद की खबर का तो अखबार में पता ही नहीं होता है कि वहां क्या हुआ होगा। मै देहरादून मे रहता हूं और मूल रूप से पहाड़ का रहने वाला हूं। इसलिए मै पहाड़ के बारे में जानने की अधिक इच्छा रखता हूं लेकिन इस इच्छा को हमेशा मन में ही मारना पड़ता है। जी हां, यह सच है मेरे जैसा हाल यहां रहने वाले हर उस पहाड़ी नागरिक का है जो अपने परिवार से दूर यहां नौकरी करने आया है। यह सब हो रहा है अखबारों की पन्ना बदलाऊ संस्कृति के चलते।

न्यूज पेपर

अखबार सुबह हाथ में आता है और हमें पता चलता है कि मेरे पड़ोस में क्या हुआ लेकिन सिर्फ पांच किलोमीटर के न्यूज पेपरदायरे में। इसके बाद की खबर का तो अखबार में पता ही नहीं होता है कि वहां क्या हुआ होगा। मै देहरादून मे रहता हूं और मूल रूप से पहाड़ का रहने वाला हूं। इसलिए मै पहाड़ के बारे में जानने की अधिक इच्छा रखता हूं लेकिन इस इच्छा को हमेशा मन में ही मारना पड़ता है। जी हां, यह सच है मेरे जैसा हाल यहां रहने वाले हर उस पहाड़ी नागरिक का है जो अपने परिवार से दूर यहां नौकरी करने आया है। यह सब हो रहा है अखबारों की पन्ना बदलाऊ संस्कृति के चलते।

आज हालात यह है कि पूरे प्रदेश में एक कोने से दूसरे कोने की बात तो छोड़ दो, पांच किलोमीटर के दायरे के बाद की खबर अखबारों में नहीं है। कहने को तो अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तार व राष्ट्रीय सहारा जैसे अखबार देहरादून से छपते हैं लेकिन इनमें भी सिर्फ देहरादून की ही खबर होती है। शहर से बाहर निकल कर पांच किलोमीटर बाद क्या हुआ, किसी को पता हीं नहीं चलता है।

आज हालत यह है कि देहरादून में रहने वाले लोगो को पहाड़ तो दूर तीर्थ नगरी हरिद्वार के समाचारों का पता नहीं चल पाता है। यह परम्परा सबसे पहले अमर उजाला ने शुरू की थी। आज सभी अखबार उसी परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। सभी अखबार हर पांच किलोमीटर के बाद पन्ना बदल देते हैं, कही शहर तो कहीं गढ़वाल संस्करण के नाम पर तो कहीं डाक संस्करण के नाम पर। हमारा प्रदेश जटिल भौगोलिक परिस्थितियों वाला प्रदेश है और यहां दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की निगाहें हमेशा ही राजधानी की ओर लगी रहती है कि यहां हमारे हित की कौन सी बात हो रही होगी।

सरकार जनता के लिए क्या करने जा रही है और इन दिनों राज्य की राजधानी में क्या चल रहा है आदि जानने के लिए सभी की निगाह सुबह के अखबार पर होती है लेकिन अखबार हैं कि उन्हें राजधानी की बातें को पहुंचाने में झिझक आती है। आप राजधानी की खबरों को पहाड़ के गांव में नहीं पढ़ सकते हैं। गांव की खबरों को राजधानी में नहीं पढ़ सकते। अखबार गांव-गांव तो पहुंच रहे हैं लेकिन खबरें नहीं पहुंच पा रही हैं। यह स्थिति हमारे इस नव सृजित प्रदेश के लिए कम कष्टकारी नहीं है।


लेखक कुमार अनिल देहरादून में रहते हैं और पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं।

 

 

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