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राजनीति-सरकार

अगर सोनिया और मनमोहन ईमानदार नहीं हैं तो सब बेईमान हैं

स्‍ीपीना संसद ना संविधान से अब देश चलेगा अन्ना के विधान से और देश में केवल नकारात्मक बात करने वाले और भोजपुरी में कहे तो गलचौरी करने वाले इस विधान के लागू होने से पहले तक ताली बजायेंगें, लेख लिखेंगे, फेसबुक सहित सभी ऐसे स्थानों पर नयी आजादी की कहानियां लिखेंगे. ऐसा लगेगा कि महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, भगत सिंह, आजाद सभी ये लोग ही है. सीमाओं पर कुर्बानियां इन्होंने या इनके परिवारों ने ही दिया है और अब जीत का जश्न मना रहे हैं.  इनकी बातों से ऐसा भी लगता है कि भारत के लिए कुर्बानियां देने वाले आजादी कि लड़ाई लड़ने वाले निहायत नासमझ थे. ऐसा भी लगता है कि संविधान सभा में जो लोग बैठे थे वे देशद्रोही, बिना पढ़े लिखे, और गैर जिम्मेदार लोग थे. बाबा साहब अम्‍बेडकर से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद हों या एचएन कुंजरू तक सभी को इस सूरमाओं से राय लिए बिना संविधान कि रचना नहीं करना चाहिए था.

स्‍ीपी

स्‍ीपीना संसद ना संविधान से अब देश चलेगा अन्ना के विधान से और देश में केवल नकारात्मक बात करने वाले और भोजपुरी में कहे तो गलचौरी करने वाले इस विधान के लागू होने से पहले तक ताली बजायेंगें, लेख लिखेंगे, फेसबुक सहित सभी ऐसे स्थानों पर नयी आजादी की कहानियां लिखेंगे. ऐसा लगेगा कि महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, भगत सिंह, आजाद सभी ये लोग ही है. सीमाओं पर कुर्बानियां इन्होंने या इनके परिवारों ने ही दिया है और अब जीत का जश्न मना रहे हैं.  इनकी बातों से ऐसा भी लगता है कि भारत के लिए कुर्बानियां देने वाले आजादी कि लड़ाई लड़ने वाले निहायत नासमझ थे. ऐसा भी लगता है कि संविधान सभा में जो लोग बैठे थे वे देशद्रोही, बिना पढ़े लिखे, और गैर जिम्मेदार लोग थे. बाबा साहब अम्‍बेडकर से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद हों या एचएन कुंजरू तक सभी को इस सूरमाओं से राय लिए बिना संविधान कि रचना नहीं करना चाहिए था.

इस वक्त देश में जिस तरह कि बहसें चलाई जा रही हैं उससे दो बातें प्रचारित करने की पूरी कोशिश कुछ लोगों द्वारा की जा रही है. पहला – 63 सालों में इस देश में कुछ हुआ ही नहीं, देश बर्बाद हो गया और बहुत पिछड़ गया.  दूसरा – भारत में केवल भ्रष्‍टाचार होता है, काला धन का कारोबार होता है और कुछ होता ही नहीं है. ये लोग ये बताना चाहते हैं कि भारत ना तो विज्ञान में आगे बढ़ा, ना शिक्षा में, ना चिकित्सा में, ना शक्ति में और किसी भी क्षेत्र में नहीं. इन्हें भारतीयों के मिलने वाले नोबल पुरस्‍कारों से नफरत है, इन्हें भारत की एकता से नफरत है, इन्हें 65, 71, कारगिल कि जीत से नफरत है, इन्हें असमान में छोड़े जा रहे केवल अपने नहीं दुनिया के दूसरे देशों के भी उपग्रहों की सफलता से नफ़रत है. इन्हें दुनिया के चंद प्रगतिशील देशों में भारत के शामिल हो जाने से नफरत है. इन्हें दुनिया की पहली या दूसरी ताकत बनते हुए भारत से नफरत है. तभी तो आत्मविश्‍वास से लबरेज होते भारत में विश्‍वास का बड़ा संकट खड़ा करने का प्रयास बड़े सोचे समझे तरीके से किया जा रहा है.

किसी देश के जीवन में 60  साल 60  सेकेंड के बराबर होता है और दुनिया के तथाकथित बड़े और विकसित देशों के मुकाबले हमारे महान भारत ने ज्यादा तेजी से तरक्की भी किया, अपनी कमियों पर विजय भी पाया और जहां जो कमजोरियां दिखीं उनको दूर भी किया. जहां दूसरे एक बोली, एक भाषा, एक धर्म वाले देशों को भी एक साथ रखने में कामयाबी नहीं मिल पा रही है और गृहयुद्ध तथा आतंकवाद और विभिन्न समस्याओं के शिकार हैं और फ़ौज तथा तानाशाही से भी काबू में नहीं कर पा रहे हैं,  वहीँ तमाम भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों, जातियों और धर्मों वाले इस देश की मजबूत एकता और दुनिया का सिद्ध हो चुका सबसे मजबूत लोकतंत्र कुछ लोगों को चुभ रहा है. कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी पता नहीं कैसे बिना इतिहास और वर्तमान कि समीक्षा किये इस अभियान में शामिल हो जाते हैं,  तो जो अभी तक नासमझ है या देश और नागरिकता का अर्थ ही नहीं समझना चाहते हैं,  उनको क्या कहा जाये? जनसंख्या 121 करोड़ से ज्यादा है पर नागरिक कितने है? यह बहस का विषय है. जब जो धर्म अपने उपदेशों के द्वारा समाज को सही दिशा और त्याग कि शिक्षा देता था,  वही अनाप शनाप धन दौलत और तमाम बुराइयों का शिकार दिखलाई पड़ रहा है तो उस चर्च और राजा के सौ साल से ज्यादा चले युद्ध की याद आ ही जाती है. किसी ने लिखा था कि बादशाहों से फकीरों का बड़ा था मर्तबा, जब तक सियासत से उनका कोई मतलब ना था.

देश के चिंतनशील और जिम्मेदार लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ज्यों ही अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा भारत आये और संसद को संबोधित कर भारत को महान स्वीकार किया तथा हर भारतीय सीना चौड़ा कर चलने लगा, दुनिया के लोग भारत में आकर पैसा लगाने को तैयार होने लगे, देश के विरुद्ध सोचने वाले और षड़यंत्र करने वाले ठिठक कर खड़े हो गए, अचानक ऐसा क्या हुआ कि उस स्थिति को भारत के लिए प्रयोग होने से पहले ही भारत को बुरा राष्‍ट्र घोषित करने की मुहिम देश के अंदर से ही शुरू हो गयी.  इतिहास इसकी समीक्षा करेगा जरूर और वे ताकतें बेनकाब भी होंगी. आजादी कि लड़ाई में भी तो इस देश की बहुत सी ताकतें या तो फिरंगियों के साथ सीधे-सीधे खड़ी थीं या स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ मुखबिरी कर रही थीं. कुछ वैसी ही ताकतें आज भी देश के खिलाफ खड़ी हैं. इनकी संख्या हजारों या लाखों में होती है और ये 120 करोड़ से ज्यादा के देश को आदेशित करना और तानाशाही पूर्ण तरीके संचालित करना चाहते है.

इस बात से किसे एतराज है कि देश से बुराइयाँ मिटनी चाहिए, भ्रष्‍टाचार ख़त्म होना चाहिए, काला धन का कारोबार बंद होना चाहिए इत्यादि. बहुत सी बातें हैं जिन पर देश में चिता भी है और चिन्तन भी. यदि चिंतन नहीं होता तो सूचना का अधिकार बना ही नहीं होता. जो भी हजारों करोड़ कला धन वापस आया है वो आया ही नहीं होता. सत्ता में भागीदार लोग जेल में गए ही नहीं होते और जेल जाने वाले यदि कोई और भी उनके कामों में शामिल है तो अब तक मुंह खोल चुके होते. कम से कम पूर्व की सरकारों की तरह ये सरकार जिन पर भ्रष्‍टाचार प्रमाणित हो जा रहा है,  उन्हें बचा नहीं रही है बल्कि कानून को मजबूती से काम करने को प्रोत्साहित कर रही है. किसी का पैसा खो जाता है या चोरी हो जाता है तो हमारी अपनी व्यवस्था हमें तुरंत नहीं दिलवा पाती है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर वो काफी दिन में मिल पाता है. यहाँ तो काला धन उन देशों में है जिनकी अर्थव्यवस्था ही उसी पर निर्भर है. अंतर्राष्‍ट्रीय कानूनों के अंतर्गत प्रावधानों से ही वह वापस आयेगा और उस में लगने वाला समय लगेगा या फिर इतनी हिम्मत हो कि हमारी सेनाएं उन देशों पर हमला कर धन वापस ले आयें.  अगर मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी ईमानदार नहीं है तो किसी के ईमानदार होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.

देश को भ्रमित करने वालों का कहना है कि 80 प्रतिशत लोग चोर हैं इन्हें छोड़ कर, चुनाव में जनता पैसे और शराब लेकर वोट देती है, इन्हें छोड़ कर सारे लोग काला धन रखते हैं,  इन्हें छोड़ कर संसद और विधान सभाओं में अयोग्य लोग हैं और कोई भी कानून बनाना नहीं जनता है इन्हें छोड़ कर. देश में कोई भी देश के बारे ने नहीं सोचता और न देश भक्त है इन्हें छोड़ कर. ये देश चलाने का जो तरीका चाहते है उस में देश की राजधानी हो या प्रदेश की, जिला मुख्यालय हो या कोई और इनका कहना है कि जहां भी कुछ लोग इकट्ठे हो जायें और ये ऐलान कर दें कि वही देश के मालिक या प्रतिनिधि हैं तो उस वक्त वे जो भी आदेश देते जायें वही संविधान और कानून मान लिया जाये तथा उनके आदेशों का पालन तुरंत हो वर्ना वे जो चाहेंगे करेंगे. इस अन्ना विधान में फ़ौज के दफ्तर में इकट्ठे लोग फ़ौज की नीति और युद्ध की योजना तैयार करेंगे, जो साईकिल नहीं चलाना जानते वे एयर फ़ोर्स को कौन सा जहाज खरीदना चाहिए या कौन सी मिसाइल लेनी चाहिए ये बताएँगे. जिन्होंने तालाब नहीं देखा वे नेवी की नीति तैयार करेंगे. 10  डकैत या चोर मिल कर पुलिस को कानून बताएँगे. जब भी कुछ लोग किसी अदालत में इकट्ठे हो जायेंगे वो निचली अदालत हो या सर्वोच्च न्यायलय उनसे पूछ कर ही फैसले होंगे. जब भी कोई भीड़ अखबार के या टीवी के दफ्तर को घेर लेगी वह तय करेगी कि अख़बार में क्या छपे या टीवी में क्या दिखाया जाये. इसी तरह भीड़ या यूँ कहे कि कुछ लोगों की भीड़ देश की नयी व्यवस्था चलाएगी.

यदि लाखों लोगों की क़ुरबानी से आजाद हुए और बड़ी कुरबानियों से कायम रहते हुए तरक्की करते देश को ऐसे ही चलना है तो इन मुट्ठी भर लोगों तथा इन के चंद समर्थकों को ये व्यवस्था मुबारक. पर ऐसा लगता नहीं है कि महान हिंदुस्तान इतना कमजोर हो गया है कि कुछ लोगों की साजिश कामयाब हो पायेगी, वे उसी गति को प्राप्त होंगे जिसको आजादी की लड़ाई में गद्दारी कर प्राप्त हुए थे. ये देश १२० करोड़ की इच्छा और उनके द्वारा बनाये संविधान से चलेगा न कि किसी और विधान से.

लेखक डा. सीपी राय स्‍वतंत्र राजनैतिक चिंतक और स्‍तंभकार हैं.

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