कौन याद रखता है अंधेरे वक्त के साथियों को सुबह होते ही चिरागों को बुझा देते हैं। आज 10 अगस्त के बेशर्म सन्नाटे के गुजरने के बाद यह शब्द श्रद्धांजलि समर्पित है एक ऐसे जाबांज शहीद को जो नामचीन नहीं है लेकिन शहादत के रिवाज में वह अगड़ा है, पर अफसोस हमे मालूम नहीं। अपने बुड्ढ़े व लाचार मां बाप के सपनों को देश के लिए स्वाहा करने वाले मध्यम वर्गीय परिवेश के इस शहीद की शहादत की याद देश को कराना इसलिए जरूरी है कि करो या मरो के आन्दोलन में यह देश का पहला बलिदान था। पर अफसोस कि हमें मालूम नहीं कि वह भी सन 1942 की 10 अगस्त थी।
आगरा के हाथीघाट से जो सड़क दरेसी की तरफ जाती है, उस पर अंग्रेज पुलिस की कड़ी नाकेबंदी को चीरता हुआ एक नौजवान आगे बढ़ रहा था। हाथ में तिरंगा था, तभी पुलिस की बंदूके गरजी, एक गोली उसकी बांह में लगी वह उठा, चला, लेकिन फिर बंदूकों की धांय-धांय सुनाई दी, जिसने उस नौजवान का सीना छलनी कर दिया। वह फिर नहीं उठा, कभी नहीं उठा, पर अफसोस हमें मालूम ही नहीं।
क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद बंबई में 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति में महात्मा गांधी बोले थे- कांग्रेस से मैं ने यह बाजी लगवाई है कि या तो देश आजाद होगा अथवा कांग्रेस खुद फना हो जाएगी। करो या मरो हमारा मूल मंत्र होगा। 8 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति ने अंग्रेजों भारत छोड़ों प्रस्ताव स्वीकृत किया। 9 अगस्त 1942 को बंबई में गांधी जी समेत राष्ट्रीय आन्दोलन के सभी बडे़ नेता गिरफ्तार कर लिए गए। सारे देश में गिरफ्तारी और दमन चक्र पूरे वेग से प्रारंभ हो गया। आगरा में कुछ नेता तो पहले ही पकडे़ जा चुके थे। कुछ फरार थे। अपने नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में 10 अगस्त को सारे शहर में पूर्ण हड़ताल थी।
मोतीगंज स्थित कचहरी के मैदान में एक आम सभा का ऐलान किया जा चुका था। सारा शहर अज्ञात भय से आतंकित था और सभी के मन में आसन्न संकट के बादल छाए हुए थे। जनता की सहानुभूति आन्दोलन के साथ ही अंग्रेज निजाम के अफसर आम सभा को विफल करने पर उतारू थे। सारे शहर में पुलिस का सख्त पहरा था। वह चौकन्नी थी। अंग्रेज की पुलिस मोटर लारियां सायरन बजाती इधर से उधर दौड़ रही थी। जमुना किनारे के आसपास बने बगीचे उस दिन सुनसान पडे़ थे। मोतीगंज के मैदान का मुख्य फाटक बंद था। उसके सामने सशस्त्र सिपाहियों की लंबी कतार मौजूद थी। उनसे आगे कुछ फासले पर इसी तरह की तीन कतार और थी, पास ही डटे हुए थे पुलिस अधिकारी और सिटी मजिस्ट्रेट। कुछ लोगों को आभास हो गया था कि आज गोली चले बिना नहीं रह सकती।
इसलिए वे चुंगी के सामने वाले रेलवे के मैदान में एक गुमटी के पीछे गोलियों की बौछार से बचने के लिए जा खडे़ हुए थे। मुख्य द्वार से हटकर पुलिस ने दाएं बांए हो कर तीन तीन कतारों में पोजीशन ले ली। कुछ लोग हाथीघाट जाने वाली सड़क पर जमा थे। कुछ पत्थरों की आड़ में छिपे हुए तमाशा देख रहे थे। आम सभा करने की जिद पर अडे़ लोग सड़क पर ही इकट्ठा हो गए। कांग्रेस के बाबूलाल मित्तल को सभा की सदारत सौंपी गई। जैसे ही बाबूलाल मित्तल बोलने को खडे़ हुए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनकी गिरफ्तारी से तनाव बढ़ गया। कुछ लोग उनकी रिहाई करने एवं सभा में बोलने के लिए नारेबाजी करने लगे। तनाव बढ़ता देख पुलिस ने पोजीशन ले ली। उत्तेजित भीड़ ने पुलिस बल पर कत्तलों (पत्थर के छोटे टुकडों) की वर्षा शुरू कर दी।
पोजीशन लिए हुए सिपाही कत्तलों की मार से इतने भयभीत हो गए कि अपना बचाव करने के लिए पीछे भागते नजर आएं। जनता पत्थरों की चोट मार रही थी और सिपाही भाग रहे थे। जनता ने उन्हें चुंगी के फाटक तक खदेड़ दिया। पुलिस ने अब पहले चक्र की गोलियां चलाई, कुछ लोग पत्थर की आड़ में हो गए। सामने वाली भीड़ में भगदड़ मच गई। पुलिस ने दूसरे चक्र की गोलियां दागी। लोग भयभीत हो कर इधर-उधर भाग रहे थे, जो लोग स्ट्रेची पुल की तरफ भागे वे वहां तैनात सिपाहियों की गिरफ्त में आ गए। कुछ उत्साही नौजवान गोलियों की परवाह न करके पुलिस पर खुलेआम पत्थर बरसा रहे थे।
पत्थरों की ओट के कारण वे सुरक्षित बचे हुए थे कि तभी परशुराम शर्मा नामक नौजवान तिरंगा हाथ में लिए उठ खड़ा हुआ। जिस समय उसकी दायीं बांह में पुलिस की पहली गोली लगी वह सामने पुलिस पर पत्थर बरसा रहा था। उसके जमीन पर गिरते ही पुलिस पर पत्थरों की बरसा रूक गई। पुलिस की गोलियां भी अब शांत हो चुकी थी। अंग्रेज पुलिस वाले शहीद परशुराम शर्मा की लाश को मोटर लारी में डालकर जिला अस्पताल ले गए। किसी ने दौड़ कर छीपी टोला स्थित उसके निवास पर उसकी शहादत की सूचना दी।
बदहवास मां-बाप और रोते बिलखते परिजन भी घटनास्थल पर आ गए। उसकी मां के करूण क्रन्दन से मौजूद लोगों के हृदय फट गए थे। सुबह उत्साह में न्निनई (बिना कुछ खाए पीए) ही घर से चल दिया था परशुराम। आज परशुराम के बलिदान का 69वां साल था। लेकिन अफसोस पूरे देश के साथ साथ आगरा भी उसकी याद में नावास्ता रह गया। जब देश जश्ने आजादी की 64वीं सालगिरह के आमोद में व्यस्त था तब भी इस जाबांज की चिता पर मेले नहीं लगे और आज भी नहीं लेंगे। जश्ने आजादी के जलसों के गीत, कविता, ड्रामें, कव्वालियां और जाने क्या क्या…..शुमार था। पर उनमें परशुराम की यादें नहीं थी।
सभी अपने को एक दूसरे से बड़ा साबित करने की जुगाड़ में जीजान से जुटे थे। कल भी परशुराम की जिंदाबाद को कोई हाथ नहीं उठा।……तो हमेशा की तरह आज 10 अगस्त को भी आजादी के विशाल मंदिर की बुनियाद में नीचे गडे़ परशुराम ने राजनय-विद्रूपता अपनी निरन्तर उपेक्षा एवं अपमान पर जोर जोर से हंसते हुए कहा ही होगा–बौने जब से मेरी बस्ती में आ कर रहने लगे है। रोज कददोकदावत के झगडे़ होने लगे है। मुझे सोने दो, मत जगाओं वरना, हस्ती के हिसाब होने लगे हैं।
लेखक शशांक चंद्रशेखर उपाध्याय उत्तराखंड सरकार में मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी हैं.

