सरकारों के भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और प्रभावी कार्रवाई के लिए शक्तिशाली लोकपाल आवश्यक है। आज अन्ना के आंदोलन पर बुद्धिजीवी वर्ग पिल पड़ा है। एक सवाल ये है कि वे अन्ना के आंदोलन से पहले क्या कर रहे थे? क्या अन्ना का इंतजार कर रहे थे. तुम आओगे तब हम विमर्श का तिरंगा खड़ा करेंगे। सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति राय जनलोकपाल से सहमत नहीं हैं। अन्ना के जनलोकपाल विधेयक को अति शक्तिशाली बताते हुए कई और लोग भी वैचारिक स्तर पर खिलाफत कर रहे हैं। जनता के इस आंदोलन से बुद्धिजीवियों का एक वर्ग चिढ़ा है। यह वर्ग क्यों चिढ़ा है? इसके चिढ़ने के कारण क्या हैं। क्योंकि चीजें बहुत सरलीकृत तरीके से सामने नहीं आतीं। अरुंधति राय देश दुनिया की बड़ी हस्ती हैं लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि अन्ना के आंदोलन को इतना समर्थन क्यों मिला?
इस आंदोलन से वाम राजनीतिक विचारधारा वालों को भी सबक सीखना चाहिए। वैचारिक स्तर पर नहीं व्यवहारिक स्तर पर लड़ाई अधिक कारगर होती है। देश के बारे में दूर तक सोचने वाले लोग जनता से संवाद कायम करने में असफल रहे हैं। वे कबीर की तरह क्यों बात नहीं करते। वे मास की बात करते हैं लेकिन मास को समझ में नहीं आता। ऐसे में अन्ना ही काम आते हैं। अन्ना के लोकपाल और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा सकते हैं और हैं भी सवाल? लेकिन उन सबसे बड़ा सवाल ये होता है कि अन्ना से पहले बाकी लोग क्या कर रहे थे। मजाक तो यही हो सकता है कि अन्ना का देश के बुद्धिजीवी इंतजार कर रहे थे।
देश की जनता वैचारिकता से नहीं वैचारिकता की व्यवहारिकता से आंदोलन में सामने आती हैं। दूसरी बात जनता तभी सड़कों पर आती है जब उसका सब्र टूटने लगता है। अन्ना का आंदोलन जनता के गुस्से की अभिव्यक्ति है, जिसने अपनी समस्याओं के लिए शक्तिशाली प्रावधानों वाले जनलोकपाल कानून बनाने की मांग की है। शक्तिशाली जनलोकपाल ही सरकारों से सीधा सामना कर सकेगा। असीमित अधिकार लेकर बैठी सरकारों के भ्रष्टाचार को नियंत्रण और प्रभावी कार्यवाही के लिए लोकपाल के लिए शक्तियां बेहद आवश्यक होंगी। अरुंधति राय का यह डर काल्पनिक है कि लोकपाल अनियंत्रित हो जाएगा। सजग नागरिक समाज, प्रेस, राजनीतिक पार्टियां, न्यायपालिका, संसद ये सब लोकपाल को नियंत्रण और संतुलन प्रदान करेंगे। देश में चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों का उपयोग कर चुनावी धांधलियों को प्रभावी तरीके से रोका है। शक्तिशाली लोकपाल ही जनता को आर्थिक अनियमितताओं और आपराधिक लापरवाहियों से मुक्ति दिला पाएगा।
लोकपाल के दूसरे पक्ष पर विचार करें तो हमें मिलता है एक काल्पनिक डर। यानि किसी चीज के जन्म लेने से पहले ही डरना और उसे जन्म न लेने देना। लोकतांत्रिक सत्ता के बीच इन डरों का कोई मायना नहीं है। फिर भी विचार तो किया जा सकता है ताकि एक मजबूत लोकपाल बन सके। ये डर हो सकते हैं कि किसी व्यक्ति के हाथ में असीमित शक्तियां होने पर दुरुपयोग की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। राजनीतिक और गैरराजनीतिक लोगों द्वारा शक्तिशाली लोकपाल पर चिंता करना जायज है। ऐसा सोचने वाले लोगों को डर है कि शक्तिशाली लोकपाल लोकतांत्रिक और नागरिक अधिकारों के प्रति खुले समाज में गलत परंपरा का उदाहरण बन सकता है। वह नागरिक अधिकारों का दमन कर सकता है। असीमित अधिकार अन्याय को जन्म देते हैं। जन लोकपाल के समर्थन में आई जनता वैचारिक स्तर पर सुदृढ़ नहीं है। अधिकांश लोग भावनात्मक प्रवाह में लोकपाल के समर्थन में उतरे थे।
यह भी आरोप है कि रियलिटी शो की तरह लोग आंदोलन में आए थे। जनता लोकपाल कानून के प्रावधानों के बारे में नहीं जानती। टीवी और इंटरनेट ने इस आंदोलन को जो स्वरूप दिया उसमें प्रबुद्ध लोगों की उपस्थिति नहीं हो सकती। अन्ना हजारे का आंदोलन और शक्तिशाली जनलोकपाल संसद के अधिकारों का दमन करने वाला है। जनलोकपाल के असीमित अधिकारों पर विमर्श की गुंजाइश बाकी है। हर कांतिकारी कदम वैचारिक परंपराओं का अतिक्रमण करता है। वह आलोचनाओं को आमंत्रित करता है। अन्ना का आंदोलन इसका अपवाद नहीं है। जनलोकपाल एक क्रांतिकारी मांग है। शक्तियां और अधिकार अपने आप में गलत नहीं होते। उनका गलत होना उनके उपयोग निर्भर होता है। शक्तिशाली लोकपाल के बाद नागरिकों को नियंत्रण और संतुलन के लिए सजगता दिखाना होगी क्योंकि कानून बनने के बाद सभी पक्षों की जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं।
लेखक रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति मध्य प्रदेश के निवासी हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

