शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने कहा था कि क्रांति की स्पीरिट से इंसानियत की रूह में हरकत पैदा होती है। आजादी के 64 साल बाद जब हम भूत से लेकर वर्तमान तक पर नजर डालते हैं तो लोकतंत्र में आम जन संगठित रूप से शोषित हुआ है। आज सत्ता की मलाई चाट रहे दरबारी जनता की हित के बजाए अपने आकाओं की बांसुरी पर ताता थैया कर रहे हैं। सरकार की प्रवृति शोषक और भ्रष्ट हो चुकी है। छत्तीसगढ़ से झारखण्ड तक आदिवासी, उत्तर प्रदेश से आंध्र प्रदेश तक में किसान जल-जंगल-जमीन-खनिजों की कारपोरेट लूट के खिलाफ लड़ रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत और कश्मीर में आम लोग सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए लड़ रहे हैं। दिल्ली से लेकर छोटे शहरों के कॉलेजों तक में छात्र और नवयुवक रोजगार और शिक्षा के लिए लड़ रहे हैं।
अन्ना के आंदोलन में भी उसी स्पीरिट की झलक दिख रही थी। अन्ना के आंदोलन ने बता दिया कि मध्यवर्ग भी शांत नहीं है। वह रोजमर्रा की जिन्दगी से उपर उठकर सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाने को तैयार है। अन्यायी सत्ता के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज, हर आंदोलन को कथित लोकतांत्रिक सरकार दबाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। चाहे यूपी सरकार, पूंजीपतियों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लूटी जा रही किसानों की जमीन के विरुद्ध आंदोलन हो या अन्ना का भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन। सत्ताधारियों ने इन आंदोलनों को दबाने के लिए हर हथकंडे अपनाए। हाल के दिनों पर नजर डालें तो केंद्र सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस के नेताओं ने फिर अन्ना की टीम पर छींटाकशी शुरू कर दी है। आंदोलन ने जब सरकार और नेताओं के मोतियाबिंद का ऑपरेशन कर दिया तब इनकी आंखें खुली। अब ये लोग अपनी तीसरी आंख से अन्ना की टीम को डराने की कोशिश में जुटे हुए हैं। ये आलम कोई एक सरकार या किसी विशेष दल द्वारा नहीं किया जा रहा है। कुछ दिनों पहले ही यूपी सरकार ने ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल से लेकर आगरा तक जो कोहराम मचाया, वह किसी से छिपा नहीं है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पुलिसवालों ने सात महिलाओं के साथ रेप किया था। गांवों में आगजनी, लूट से भी मन नहीं भरा तो सत्ता के मद में चूर दमनकारियों ने किसानों की हत्या तक करा दी।
केंद्र सरकार ने कल, छल और बल सबका प्रयोग हाल के दिनों में हर आंदोलन के लिए किया है। छल, प्रपंच और दमन तो सत्ताधारियों के हाथ पांव हो गए हैं। बाबा रामदेव ने लूट के धन की वापसी की मांग क्या उठाई, सरकार दमन पर उतारू हो गई। पहले बाबा रामदेव का, सारे प्रोटोकॉल को तोड़कर, सरकार के वरिष्ठ मंत्री एयरपोर्ट पर स्वागत करते हैं। फिर जब बात बनती नहीं दिखी तो आधी रात को बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों तक की पिटाई करा दी। दिल्ली से रातों रात हरिद्वार फेंकवा दिया। दिल्ली में घुसने तक पर रोक लगा दी गई। इसके बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हो गईं। तरह-तरह की जांच की जाने लगीं। अब सवाल यह है कि सारी जांच उस समय क्यों शुरू की जाती हैं, जब विरोध की आवाज उठती है। आज आजादी की दूसरी लड़ाई के रूप में मशहूर हो चुके अन्ना के आंदोलन को दबाने की भी कम कोशिश नहीं की गई। अनशन शुरू होने से पहले ही अन्ना को जेल में डाल दिया गया। लेकिन बढ़ते जनदबाव से डरकर सरकार ने घुटने टेक दिए। यहां तक की बगैर जमानत मांगे ही न ही केवल रिहा किया गया। बल्कि अनशन के लिए जगह भी उपलब्ध कराई गई। क्या हमने इसी लोकतंत्र की अपेक्षा की थी? जनतंत्र के बगैर यह कैसा लोकतंत्र? जहां हम सत्ता का विरोध ही नहीं कर सकते हैं, हमारी आवाज को अंग्रेजी हुकूमत में भी दबाया जाता था, और आज भी उसी तरह दबाया जा रहा है। अन्ना की टीम को कभी संसद के विशेषाधिकार नोटिस थमा दिया जाता है तो कभी सदस्यों के सामने भांति-भांति की समस्याएं खड़ी की जा रही हैं।
अब लोग बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। देश में लाखों लोग छोटे-मोटे आंदोलन कर रहे हैं, वे अन्ना के जैसे खुशनसीब नहीं है। पूर्वोत्तर के राज्य, पं. बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, केरल से लेकर कश्मीर तक के सीने पर जितनी गोलियां अंग्रेजों ने नहीं चलाई उससे ज्यादा तो हमारी लोकतांत्रिक सरकारों ने बरसा दी है। कहीं नक्सल के नाम पर तो कहीं उग्रवाद के नाम पर लोगों पर गोलियां बरसायी गयीं हैं। वर्तमान में तो आलम यह है कि सत्ता द्वारा किसानों और छात्रों के सीनों को भी छलनी किया जा रहा है। बंगाल के सिंगूर, उत्तर प्रदेश के भट्टा परसौल और महाराष्ट्र के किसानों की मौत की खबर मीडिया द्वारा बाहर आ रही हैं तो सभी लोगों को पता चल रहा है। जबकि देश के हर कोने में छात्रों, मजदूरों और किसानों पर दमनकारी सत्ता द्वारा गोलियां चलायी जा रही हैं।
हर जगह आम लोग सरकार का विरोध नहीं कर रहे हैं, अब आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए हो रहा है। यह विरोध शोषण की प्रवृति को बदलने का है। ये सारी बातें छोटे-छोटे आंदोलनकारी और अन्ना की टीम भी कह रही है। अब सवाल यह है कि क्या ये आंदोलन काफी हैं? क्या महज आंदोलन से क्रांतिकारी परिवर्तन संभव है? इतिहास तो यह नहीं बताता कि सर्वस्व न्यौछावर किए बगैर कभी व्यवस्था परिवर्तन हुआ हो। पदभ्रष्ट और शोषक बन चुकी इस नारकीय व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए यह आंदोलन महज शुरुआत है। युवाओं को कड़ी परीक्षा देनी होगी। जो हमें आधी अधूरी मिली आजादी, वह आज एक ऐसी व्यवस्था को जन्म दे चुकी है जो आम का शोषण कर के खास तक पहुंचाती है। इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए युवाओं को सड़क से संसद तक पहुंचना होगा। संसद तक पहुंचने के लिए यदि क्रांति की राह चुननी पड़े तो उसे सहर्ष अपनाना होगा। अपना सर्वस्य न्यौछावर करते हुए बहरों तक अपनी आवाज पहुंचानी होगी। दमनकारियों की आंखों पर सत्ता का मोतियाबिंद छाया हुआ है, इसका ऑपरेशन बहुत जरूरी है। पूरे देश में हो रहे छोटे-छोटे आंदोलन को संगठित करते हुए युवाओं को आगे बढ़ सड़क से संसद तक जयनाद करना होगा। सत्ता को शोषक के बजाए सेवक बनाने के लिए क्रांति की राह चुननी ही होगी। सच ही कहते हैं बिनु भय होत न प्रीत।
लेखक प्रकाश नारायण सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

