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अन्‍ना ने देश जगाया मगर बनारस के बुद्धिजीवी सो रहे हैं

गांधी, जेपी के बाद अब अन्ना हजारे ने देश को पूरी तरह झकझोर कर जगा दिया है। अन्ना द्वारा छेड़ी गयी भ्रष्टाचार की लड़ाई में हर तबका साथ है। हम किसी भी शहर का सर्वेक्षण करें तो वहां की सत्तर से लेकर नब्बे प्रतिशत तक जनता भावनात्मक रुप से अन्ना हजारे के साथ जुड़ी जुकी है। बनारस भी अन्ना के साथ पूरी तरह आन्दोलनरत हो चुका है। हांलाकि आन्दोलन से जुड़ने वालों में नब्बे प्रतिशत नौजवान हैं बावजूद इसके कतिपय राजनीतिक दलों को छोड़कर प्रायः सभी समाजसेवी व स्वयंसेवी संगठन जनलोकपाल व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना का साथ देने के लिए पूरी सिद्दत के साथ जुड़े हैं।

गांधी, जेपी के बाद अब अन्ना हजारे ने देश को पूरी तरह झकझोर कर जगा दिया है। अन्ना द्वारा छेड़ी गयी भ्रष्टाचार की लड़ाई में हर तबका साथ है। हम किसी भी शहर का सर्वेक्षण करें तो वहां की सत्तर से लेकर नब्बे प्रतिशत तक जनता भावनात्मक रुप से अन्ना हजारे के साथ जुड़ी जुकी है। बनारस भी अन्ना के साथ पूरी तरह आन्दोलनरत हो चुका है। हांलाकि आन्दोलन से जुड़ने वालों में नब्बे प्रतिशत नौजवान हैं बावजूद इसके कतिपय राजनीतिक दलों को छोड़कर प्रायः सभी समाजसेवी व स्वयंसेवी संगठन जनलोकपाल व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना का साथ देने के लिए पूरी सिद्दत के साथ जुड़े हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जहां के छात्र छात्रसंघ भंग होने के बाद से ही मुर्दे की तरह पड़े थे, वे अब अन्ना की संजीवनी बूटी पा कर फिर से सक्रिय हो गये। इसकी मिसाल इक्कीस अगस्त की शाम पूरी बनारस शहर ने देखा, जब कई हजार छात्र- छात्राएं विश्वविद्यालय के सिंहद्वार स्थित मालवीय प्रतिमा के पास एकत्रित हुए और मशाल जुलूस की शक्ल में पूरे शहर का चक्रमण किया। यह सजीव दृश्य कुछ वैसा ही था जैसा दिल्ली में इंडिया गेट से लेकर रामलीला मैदान तक का था। जहां सिर्फ नरमुंड ही दिखाई दे रहे थे। ठीक वैसे ही बनारस में जब छात्रों का मशाल जुलूस का पहला हिस्सा अस्सी चौराहे पर था तब अंतिम हिस्सा मालवीय प्रतिमा के पास ही रहा। जुलूस शहर में बढ़ता रहा और बड़े- बूढ़ों के मुंह से लगातार निकता रहा ‘जिया रजा अन्ना जिया तू त मुर्दन के भी जगा देहलऽ’.। दूसरी तरफ यह शहर जो बुद्धजीवियों के शहर के रुप में भी जाना जाता है उसमें बुद्धजीवियों की अलोचना तगड़ी होती रही।

लोगों का कहना था कि इन बुद्धजीवियों को लगता है कि न तो जनलोकपाल से मतलब है न भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हुई इस आजादी की दूसरी लड़ाई से मतलब है। लाख सवा लाख रुपए प्रतिमाह वेतन पाने वाले प्रोफेसरों की भी समाज के प्रति, देश के प्रति कोई जिम्मेदारी बनती है कि नहीं, यह जानने की उनको इच्छा भी नहीं लगती। भानू जी जैसे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर का जहां मानना है कि अन्ना का आन्दोलन फ्लाप हो जायेगा तो वहीं दूसरे संवेदनशील बीएचयू के प्रोफेसर डा.  देवव्रत चौबे कन्धे पर झोला लटकाये अन्ना समर्थकों के बीच जगह-जगह हौसला आफजाई कर रहे हैं। आन्दोलन को चलाने के लिए रणनीति भी बना रहे हैं। दूसरी ओर मुहल्ला अस्सी वाले काशी (डा. काशीनाथ सिंह) किस मांद में हैं पता नहीं। उनके लोगों का कहना है कि वे अभी फिल्म मुहल्ला अस्सी के रिलीज होने का इन्तजार कर रहे हैं। कमोवेश ऐसे ही हालत शहर के तमाम बुद्धजीवियों का है,  जिनको प्रत्यक्ष रुप में अन्ना के आन्दोलन से कोई वास्ता फिलवक्त नजर नहीं आता। जयनारायन मिश्र जैसे जुझारु पत्रकारों ने अस्सी चौराहे पर आन्दोलन की अलख जरुर जगाया है। जयनारायन गुरु ने 21 अगस्त की शाम अन्ना के आन्दोलन के समर्थन में अस्सी चौराहे पर कविसम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें उपस्थित कवियों ने अन्ना के आन्दोलन के प्रति अपनी काव्याजलियां दी।

पार्टी लाइन से हटकर कुछ भाजपा नेता भी आन्दोलन में शिरकत कर रहे हैं,  उन में रविन्द्र जयसवाल, प्रो. कौशल किशोर मिश्र, भाजपा प्रवक्ता अशोक पाण्डेय जैसे लोग प्रमुख हैं। यह लोग शहर में एक ही दिन में अन्ना के समर्थन में कई-कई आयोजनों में शिरकत कर रहे हैं, अन्ना का आन्दोलन लगातार मजबूत हो रहा है, किन्तु आम लोगों के शब्दों में इस शहर के बुद्धजीवी शहर पर ही नहीं देश पर बोझ बने हैं, ऐसा हीं कहना है, शहर की जाग उठी तरुणाई का। बामपंथी विचारधारा के जेएनयू प्रोडक्ट फिलवक्त काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर रामाज्ञा राय तक ने स्वीकार किया कि नौजवानों की सक्रियता अब इस बात का एहसास करा रही है कि तख्त बदल दो, ताज बदल दो बेईमानों का राज बदल दो। कुल ले देकर पूरा बनारस शहर पिछले एक सप्ताह से अन्नामय हो गया है और दिन – प्रतिदिन लोग इससे जुड़ते जा रहे हैं, इस संकल्प के साथ की परिवर्तन होकर रहेगा।

लेखक अजय कृष्‍ण त्रिपाठी वाराणसी के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं.

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