महान सिकंदर जब भारत आया तब उसने यहाँ की प्रकृति, समाज और जीवन शैली देख कर अपने सेनापति से कहा, “ सचमुच सेल्युकश..क्या विचित्र है यह देश…! इस बात को हजारों साल बीत गए, मगर वही आश्चर्य आज भी हमारे-आपके सामने है. हम भारतीयों को हर समय एक अवतार की आवश्यकता पड़ती है. क्योंकि दिमाग में घुसी हुई है गीता की वाणी,” यदा-यदा ही धर्मस्य.“ हाल के दिनों की घटनाएं उसी सत्य का बयान करती हैं. हमने माननीय अन्ना हजारे, बाबा रामदेव या श्री श्री रविशंकर में अवतरित सत्ता की खोज शुरू कर दी है. देश में महामारी की तरह फैले भ्रष्टाचार और काले धन के रक्त बीज को ये नव अवतार समाप्त करेंगे और हम दर्शक दीर्घा में बैठ कर सिर्फ ताली पीटने का ही काम करेंगे?
खुद की भूमिका क्या होगी, इस पर पूरा देश सोचने से क्यों कतरा रहा है? जो सबसे महत्वपूर्ण विषय है वही खांचे पर है..! दो राय नहीं कि देश का प्रत्येक अंग भ्रष्टाचार के उस घावदार कुत्ते की तरह हो चुका है जिसने उसके मस्तिष्क और सोचने की प्रक्रिया तक को संक्रमित कर दिया. मगर अफ़सोस! हम न तो स्वयं सोचने को तैयार हैं और न ही समग्र परिवर्तन के लिए उठे हाथों में अपना हाथ देने को. शायद हम यह मान चुके हैं कि भगत सिंह पैदा तो हों मगर दूसरे के घर. मेरी अपनी औलाद शहीद न बने, अपना बच्चा तो चिरंजीवी हो. बाबा अनशन करें, अन्ना अनशन करें और हम तमाशबीन बन कर टेलीविजन पर सिर्फ देखें और बहुत हुआ तो धूपबत्ती दिखा दें या मोमबत्ती हाथ में थामे.
यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि सात दशक से ज्यादा जी चुके अन्ना के जीवन के चंद साल ही बचे हैं और भ्रष्टाचार मुक्त भारत को भोगने के पहले वह शायद नश्वर शरीर छोड़ चुके होंगे. उधर बाबा उदासीन हैं भौतिक दुनिया से, उनके सरोकार भी कम हैं पर ये महानुभाव जिनके लिए रणक्षेत्र में उतरे हैं, जिनकी खातिर वे भ्रष्टाचार, काला धन और व्यवस्था के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं, उनकी भूमिका क्या होनी चाहिए? याद रखिये कोई भी जंग सिर्फ सेनापतियों से नहीं जीती जा सकती. जीतने के लिए सेना की जरूरत पड़ती है. हम-आप इस निर्णायक युद्ध में कहां हैं, हमारी भूमिका क्या है और क्या होनी चाहिए, इस सवाल पर हम सभी को स्पष्ट निर्णय लेना होगा. तय करना होगा कि देश सर्वोपरि है, राजनीतिक दल और उनके नेता दोयम हैं. भ्रष्टाचार सिर्फ नेता ही नहीं करते. अफसरतंत्र, बाबूतंत्र यहाँ तक कि गांव का एक छोटा सा शाहूकार भी उसी सड़ांध का एक हिस्सा है. ऐसा नहीं कि विदेश में ही नेताओं, नौकरशाहों, सत्ता के दलालों और भ्रष्ट उद्योगपतियों का काला धन जमा है. बल्कि स्वदेश में भी, चाहे शिक्षा के बाबू हों या पीडब्लूडी के. पाप की गगरी सभी की काख में दबी नज़र आ रही है. हल्ला बोल तो असल में इस ”पनघट यात्रा“ पर होना चाहिए. ऊपर से लेकर नीचे तक एक सुर में मटके के भंडाफोड़ का समय आ गया है. और यह विशाल कर्मकांड न तो अन्ना कर सकते हैं और न ही बाबा.
यह कैसा दुर्भाग्य कि अन्ना और रामदेव उन्ही बीमारी बांटने वालों से इलाज मांग रहे हैं जिन कालियाओं ने देश के हृदय में प्रवाहित प्रेम यमुना को मृत्यु स्वरूपा बना दिया है. ठीक है, शांति और सद्भावना के चलते लोग यूपीए सरकार से वफ़ा की उम्मीद कर रहे हैं. लेकिन यह भी समझना जरूरी है – ”क्यों करते हो उनसे वफ़ा की उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है”. इस सरकार के अंग प्रत्यंग में सुखराम, कलमाड़ी, शीला, राजा, मारन, पवार, चव्हाण, देशमुख जैसे किसिम-किसिम के गैंगरीन हैं. ये लोग गज़ब गालिबी के शौक़ीन हैं- ” कितने शीरीं हैं लब तेरे ऐ रक़ीब, गलियां खा के भी बेमजा न हुआ.” ऐसी स्थिति में फैले इस हैजे में सबको अलग-अलग कालरा का इंजेक्शन लगना चाहिए. घूस चाहे पांच रुपये की हो या पांच हज़ार करोड़ की, अपराध तो एक जैसा है तो निंदा और सजा भी एक जैसी होनी चाहिए. सौ रुपये की घूस लेने वाला पुलिस का कांस्टेबल उस पैसे से जब ढाबे में भोजन करता है तो चपड़-चपड़, सुरुड़-सुरुड़ जैसी भांति-भांति की शरीफों को अखरने वाली आवाज सुनाई पड़ती है. मिडिल क्लास का बाबू जब पांच हजार टेबल के नीचे से लेता है तब वो भी रेस्तरां में खाने से ज्यादा आवाज़ प्लेट में चम्मच टकरा कर करता है.. लेकिन वहीं जब बड़े घड़ियाल अरबों-खरबों गड़पते और पंच सितारा होटलों में माल उड़ाते हैं तब न प्लेट से आवाज़ होती है और न मुंह से, बल्कि होठ तक नहीं हिलते.
हमारी लड़ाई राशन कार्ड बनाने वाली छोटी गंदी मछली से लेकर मंत्रियों, वरिष्ठ अफसरों जैसे मगरमच्छों तक सब के खिलाफ है. हमें देश के मानसरोवर में इस पाप का अंत चाहिए. रामदेव या अन्ना चंडी बन कर भी इन रक्तबीजों का समूल नाश नहीं कर सकते और न ही भैया बाबू कर के महिषासुर का ह्रदय परिवर्तन कर सकते हैं. आप कुछ न करें, सिर्फ अपने बच्चों को यह सिखाएं कि प्रतिदिन खाना खाने के पहले वे दो बार पूछें — पापा.. इस रोटी की चिकनाहट आपकी गाढी कमाई की ही हैं न ..? विश्वास कीजिये, जिस समाज में रत्नाकर के परिजन प्रश्न करना छोड़ देते हैं, उस समाज में वाल्मीकि पैदा नहीं होते. मुझे विश्वास है कि थोड़ी ही सही, शुचिता अब भी बची है और हर कोई प्रदूषित नहीं हुआ है. जिनमे अब भी सत्य रक्त बचा है, उन्हें मुल्क को खून चढ़ाने के लिए आगे आना ही होगा. देश डायलिसिस पर है. देश को बचाना है तो रक्त दान कीजिये. कुछ ब्लड बैंक सामने हैं. जब तक कि आप खुद ब्लड बैंक नहीं बन जाते, तब तक अपना अंशदान रक्तदान के रूप में अन्ना-बाबा या उनके जैसे लोगों के पास पहुंचाएं. अन्यथा कहीं बहुत देर न हो जाए.
लेखक पदमपति शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनकी गिनती देश के जाने-माने हिंदी खेल पत्रकारों में होती है.

