मीडिया जगत के एक दोस्त के साथ मैं बीते दिनों फिल्म ‘दिल्ली-6’ देखने गया। बेटे ईशान ने बता रखा था कि ”मसकअली” वाला गाना इसी फिल्म में है। गाना पुराना लखनउवा होने के नाते और कबूतरों का शौक पहले से होने के चलते, मैं चला गया फिल्म इंज्वाय करने। फिल्म में अभिषेक ने वाकई अच्छा काम किया है। पर मैं यहां जो बात कहना चाहता हूं उसे साफ-साफ कहना शुरू करता हूं। फिल्म में एक काले बंदर का जिक्र है जिसने दिल्ली में आतंक मचा रखा है। एक सीन में अचानक स्क्रीन पर आईबीएन 7 दिखा और एक काले बंदर का जिक्र।
सारी फिल्म काले बंदर के आगे-पीछे। काला बंदर दिल्ली में आतंक मचा रहा था। आखिर में, जैसा फिल्मों में होता है, वही हुआ। नायक काले बंदर का लबादा पहनकर नायिका को जकड़ता है और फिर लबादा हटाता है। उधर पुरानी दिल्ली में काले बंदर को लेकर दंगा मचा है। कोई उसे हिंदू तो कोई मुस्लिम करार दे रहा है। अंत में फिल्मकार राकेश मेहरा फिल्म के जरिए संदेश देते हैं कि अपने अंदर के काले बंदर को पहचानो। मीडिया ने बनाया काले बंदर को। आज जब हमसे कहा जा रहा है कि अपने अंदर के काले बंदर को पहचानो तो गिरेबान में झांकना पड़ रहा है।
प्रिंट के हम पत्रकार बड़ी आसानी से कह देते हैं कि ये टीवी वाले ही बंदर और भूत का नाटक फैलाते हैं। पर अगर हम खुद के बारे में सोचें तो बंदर खुद के अंदर भी दिखेगा। कभी बाईलाइन के दबाव में, कभी संपादक के जोर पर, जाने कितनी बार हम लोग खुद को काला बंदर बनते-बनाते हैं। टीवी तो आसमान से नहीं टपका है। वहां भी बड़े निर्णायक पदों पर वही लोग हैं जो हमारे बीच से गए हैं। हम प्रिंट मीडिया के लोग सबसे बड़े काले बंदर हैं जो समाज में खौफ पैदा करते हैं फिर उसका इलाज सुझाते हैं। मैं एक अनुभव बताना चाहूंगा।
उन दिनों मैं देश के एक बड़े अखबार में संवाददाता था। वहां जाने के बाद जो मेरी पहली खबर छपी वो पहले पन्ने पर आल एडिशन प्रकाशित हुई। खबर के लिए मैं काला बंदर बना और काले बंदर को बनाया भी। खुलकर नहीं बता पा रहा हूं क्योकि अभी 40 का हूं और कई साल चाकरी करनी है। पर संक्षेप में बस इतना कि एक बकवास सी खबर आज भी मेरे नाम पर हर सर्च इंजन पर सबसे ज्यादा हिट के तौर पर मिलेगी। बड़ा खुश था मैं, देखो, देश विदेश के कितने लोग फोन कर रहे हैं खबर के बारे में। लंदन के एक चैनल ने तो इंटरव्यू तक ले डाला हमारा। मगर आज हम शर्मिंदा हैं कि काला बंदर जिंदा है। कल ही मेरे बगल में एक बड़ी प्रेस वार्ता में मध्य प्रदेश के एक बड़े अखबार के साथी संवाददाता बैठे थे। एक सनसनी की बात बताने लगे। अचानक उनका गोरा सुंदर चेहरा मुझे काला लगने लगा। थोड़ी देर में वही काला चेहरा बंदर की शक्ल में बदल गया। मैं उठा, जाकर अपने मित्र अंबरीश को फोन किया। बात किसी और विषय पर की। मकसद था किसी भी तरह काले बंदर से छुटकारा पाना।
अब तो हालत यह है कि जहां भी जा रहा हूं, हर कोई काला बंदर दिख रहा है। हद तो तब हो गयी जब कल शेव बनाते समय खुद की शक्ल जो भगवान की दया से सांवली सी है, काली दिखने लगी और मुझे अपने अंदर ही एक काला बंदर दिखने लगा। डर के मारे आंख बंद कर सिर्फ अंदाज से ही शेव बना डाली। लगता है, काला बंदर हर जगह है। लगता है वो नहीं जाने वाला है इस दुनिया से। मेरी गुजारिश है दोस्तों, खोजो काले बंदर को, मिटाओ मत, बस उसको पिंजरें में बंद कर डालो। पुरानी कहावत है न, आग का डर बना रहे इसलिए पानी का रहना जरूरी है। अपने अंदर के काले बंदर को अगर हमने न भगाया तो कल जब यह राज हमारे बच्चों के सामने खुलेगा तो वे ही हम लोगों से घृणा करने लगेंगे।
लेखक सिद्धार्थ कलहंस लखनऊ के पत्रकार हैं। इन दिनों बिजनेस स्टैंडर्ड, लखनऊ के प्रिंसिपल करेस्पांडेंट हैं। उनसे संपर्क करने के लिए [email protected] पर मेल कर सकते हैं या फिर 09336154024 पर फोन कर सकते हैं

