Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य जगत

अपने आचार्य को खरीदने वाले शासक का ही विनाश कर दिया

सौवीरएक क्रूर और आततायी शासक ने वयोवृद्ध आचार्य का मूल्‍य तीन करोड़ लगा कर उन्‍हें खरीद तो लिया, लेकिन इसके बस कुछ ही बरस बाद वह समझ ही नहीं पाया कि आचार्य के उस तरूण शिष्‍य को वह किस भाव खरीदे, जिसकी मसें भले ही तब तक न भींग पायीं थीं, लेकिन कीर्ति-पताका सर्वोच्‍च थी। यह शिष्‍य भी इतना दिव्‍य निकला, कि महज 21 साल की उम्र में ही उसने उस आततायी शासक का निर्मूल विनाश कर दिया और पूरे आर्यावर्त में भारतीयता की एक बेमिसाल इमारत खड़ी कर दी। इसके बाद का समय देश में उस स्‍वर्ण-काल के रूप में कई दशकों तक ऊंचाइयों की बुलंदियों पर लगातार चढ़ता ही रहा जिसे देश-विदेश के इतिहासकार आज भी निर्विवाद तौर पर गुप्‍त-काल के तौर पर चिन्हित करते हैं।

सौवीर

सौवीरएक क्रूर और आततायी शासक ने वयोवृद्ध आचार्य का मूल्‍य तीन करोड़ लगा कर उन्‍हें खरीद तो लिया, लेकिन इसके बस कुछ ही बरस बाद वह समझ ही नहीं पाया कि आचार्य के उस तरूण शिष्‍य को वह किस भाव खरीदे, जिसकी मसें भले ही तब तक न भींग पायीं थीं, लेकिन कीर्ति-पताका सर्वोच्‍च थी। यह शिष्‍य भी इतना दिव्‍य निकला, कि महज 21 साल की उम्र में ही उसने उस आततायी शासक का निर्मूल विनाश कर दिया और पूरे आर्यावर्त में भारतीयता की एक बेमिसाल इमारत खड़ी कर दी। इसके बाद का समय देश में उस स्‍वर्ण-काल के रूप में कई दशकों तक ऊंचाइयों की बुलंदियों पर लगातार चढ़ता ही रहा जिसे देश-विदेश के इतिहासकार आज भी निर्विवाद तौर पर गुप्‍त-काल के तौर पर चिन्हित करते हैं।

यह था नागार्जुन। न नाम का पता और न उसकी कृतियों का कोई मूल प्रमाण। लेकिन इतिहास का यह अमर सेनानी आज भी चीन के इतिहास में अमर है। यह दीगर बात है कि नागार्जुन के दो हजार साल बाद भी किसी भी भारतीय में इतना दम नहीं रहा कि वे नागार्जुन उन ग्रंथों को पुन: अनुवादित कर सके, जिसे चीनी विद्वानों ने तीन सौ बरसों तक अपनी भाषा बोली में अनुवादित कर अपनी ज्ञान-संपदा को बेहिसाब समृद्ध किया। वह भी तब, जबकि नागार्जुन का योगदान राजनीतिक रूप से बेमिसाल रहा ही, बौद्ध-जगत में भी उसने वह कर दिखाया, जो भगवान बुद्ध के बाद के सात सौ बरसों में भी किसी नहीं किया। बौद्ध समाज के सर्वोच्‍च पद तक पहुंच जाने के बाद भी नागार्जुन ने किसी पर अपना धर्म थोपा नहीं, बल्कि सभी पंथों-समुदायों पर समान रूप से सम्‍मान देता रहा। और तो और, अनीश्‍वरवादी होते हुए भी उसने शिव ही नहीं, नंदी तक को सर्वोच्‍च राजकीय सम्‍मान दिलवा दिया।

नागार्जुन के बारे में केवल इतना पता है कि वे विदर्भ के किसी क्षेत्र में जन्‍मे। यह 78 ईस्‍वी की बात है। परिवार था प्रतिष्ठित ब्राह्मण। किशोरावस्‍था तक अध्‍ययन में पारंगत हो चुके थे। इसके बाद तो साहित्‍य-धर्म की राजधानी के तौर पर सर्वमान्‍य मगध की राजधानी पाटलिपुत्र ही बची थी। सो, नागार्जुन पाटलिपुत्र चले आये और वहां भर्तहरि वंश के शासकों के महाअमात्‍य अश्‍वघोष को अपना गुरू बना लिया जिन्‍होंने उसे 18 वर्ष की आयु में बौद्ध धर्म की दीक्षा दे दी। अश्‍वघोष तब बौद्ध समाज के महास्‍थविर नामक सर्वोच्‍च पद पर थे। खैर, गंगा के किनारे कुटिया बनी और वेद-पाठी परिवार का यह युवक बौद्ध-ज्ञान के प्रचार-प्रसार में जुट गया।

तब तक दिल्‍ली से लेकर दक्षिण तक सातवाहनों का एकक्षत्र साम्राज्‍य था और पाटलिपुत्र उन्‍हीं के ही अधीन था। उधर पश्चिम-उत्‍तरी क्षेत्र यानी के आज के पेशावर में आततायी कुषाणों का शासन था। वहां का शासक कनिष्‍क मगध की बौद्धिक और आर्थिक संपदा पर ललचा गया और अचानक उसने मगध पर हमला कर जीत लिया। रिहाई की शर्त रखी गयी छह करोड़ रुपये। मगध के पास इतनी संपदा नहीं थी। तय हुआ कि तीन करोड़ के रूप में भगवान बुद्ध का भिक्षापात्र और बाकी के बदले महास्‍थविर अश्‍वघोष को उनके हवाले कर दी जाए। और इस तरह अश्‍वघोष बंदी के रूप में पेशावर चले गये। यह पूरे बौद्ध समाज के लिए शर्मनाक था, लेकिन अपमान का बदला लेने के लिए कमर कस ली युवा नागार्जुन ने।

हालांकि इसके कुछ ही समय बाद कनिष्‍क ने नागार्जुन को अपने साथ लाने के लिए अश्‍वघोष के साथ गया तक की यात्रा की। नागार्जुन की फूस की कुटिया देखी, केवल एक लंगोटी और भिक्षापात्र में 19 साल का युवा लेखन में व्‍यस्‍त था। गुरु अश्‍वघोष को देखते हुए नागार्जुन ने प्रणाम किया और उधर कनिष्‍क की आंखों से आंसू बह चले। यह पश्‍चाताप के आंसू थे। लेकिन नागार्जुन उसे कैसे क्षमा कर देते जिसने भारत और धर्म के विरूद्ध अपराध किये थे। यह व्‍यक्तिगत मान-अपमान की बात थी ही नहीं। कनिष्‍क के हर प्रस्‍ताव को नागार्जुन ने पूरी साफगोई से ठुकरा दिया। नागार्जुन का कोई भी मूल्‍य कनिष्‍क नहीं लगा सका और वापस लौट गया। नागार्जुन ने अब क्षमा के बौद्ध-सिद्धांतों को दरकिनार कर राजनीतिक दायित्‍व सम्‍भाला। सातवाहनों को तैयार किया और सन 101 ईस्‍वी में कुषाण वंश को हराकर पेशावर पर सातवाहनों का झंडा फहरा दिया। यह गुरु, धर्म और समाज के अपमान का बदला था। भगवान बुद्ध का भिक्षापात्र तथा गुरु अश्‍वघोष वापस मगध आ गये और नागार्जुन पुन: धम्‍मं शरणं गच्‍छामि।

सातवीं सदी में भारत आये चीनी यात्री ह्वेनसांग ने तब तक के ज्ञात इतिहास में जिन चार महापुरूषों का जिक्र किया है, उनमें नागार्जुन भी हैं। यह सम्‍मान उन्‍हें यूं ही नहीं मिल गया। उनकी सभी कृतियां भारत से भले ही समाप्‍त हो चुकी हों, लेकिन उनका अनुवाद कर चीनियों और तिब्‍बतियों ने अपनी समृद्धि को बेमिसाल वैभवशाली बना लिया। इनमें सुहृल्‍लेख जैसी कृति भी शामिल है। इतना ही नहीं, 150 ईस्‍वी में उन्‍हें बौद्धसंघ का महास्‍थविर पद भी मिल गया। शक-हूण अब तक बौद्ध-दीक्षित होने के बावजूद हेय ही माने जाते थे, लेकिन सांस्‍कृतिक एकता के लिए नागार्जुन ने देशी राजाओं के लिए इनमें विवाह की व्‍यवस्‍था दी और कुछ ही समय बाद तो शक-हूण राष्‍ट्रीय साले यानी भारतीय राजाओं का साला के तौर पर पहचाने जाने लगे। अब तक बौद्ध चेतना में खासा ह्रास हो चुका था, इसलिए बौद्धनियमों से इतर नागार्जुन ने विद्रोही चेतना स्‍वीकारते हुए कई युगांतरकारी परिवर्तन कर दिये, जैसे धम्‍म को न दान दो न धम्‍म दान ले, बुद्ध को दान देना निष्‍फल है क्‍योंकि न बुद्ध है और न उसके उपदेश। उन्‍होंने तो धम्‍म में खास कारणों के चलते मैथुन तक की इजाजत दे दी।

बोले: बुद्ध की उपासना नहीं, बुद्ध को जीना चाहिए। जरा तब के इतिहास पर गौर कीजिए तो पता चलेगा कि बौद्धों की तब की हालत के मद्देनजर यह व्‍यवस्‍थाएं कितनी क्रांतिकारी रही होंगी। और केवल इतना ही क्‍यों, नागार्जुन ने सिक्‍कों तक पर शिवलिंग और नंदी तक की प्रतिमाएं उकेरीं, माहेश्‍वर लिखवाया। यह उसके सर्वधर्म सम्‍भाव का ही तो प्रतीक है, जहां ज्‍यादती और आडम्‍बर के बजाय सभी को बराबर का सम्‍मान देने के साथ ही अपनी सांस्‍कृतिक जमीन को और भी पुष्पित-पल्‍लवित करने के नैष्ठिक व उद्दाम समर्पण का ही तो प्रतीक है। बहरहाल, आजीवन केवल लंगोट में जिया यह महाभिक्षु 102 वर्ष तक जिया और 180 ईस्‍वी को महानिर्वाण पा गया। अब यह बात दीगर है कि बाद के बरसों में बौद्धों ने नागार्जुन के प्रतिपादित संशोधनों का भी मनमाना दुरुपयोग कर डाला, लेकिन गुप्‍तवंश के अगले छह पांच सौ बरसों के स्‍वर्णकाल में नागार्जुन के योगदान को कैसे भुलाया जा सकता है। याद तो नागार्जुन आज भी किये जाते हैं और रहेंगे भी।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...