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मीडिया मंथन

अपने हक के लिए नहीं लड़ सकते मीडिया वाले?

: आप वहां नौकरी करना चाहते हैं तो अपने अधिकारों की बात भी मत कीजिए : मीडिया हर एक पीडि़त, शोषित और अन्याय के लिए भटक रहे लोगों की आवाज उठाता है, पूरी कोशिश करता है कि उसको इंसाफ मिले और मिलता भी है। अगर इस बात को हम दूसरे तरीके से सोचें यानी कितने प्रतिशत मीडिया कर्मी अपने हक के लिए आवाज उठाते या लड़ते हैं, तो शायद हमारे दिमाग में कुछ गिने चुने नामों के अलावा कोई नाम न आए। काफी दिनों से ये सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा है कि इसका क्या हल होना चाहिए? इस सवाल को अब मैं आप के बीच छोड़ रहा हूं अगर मुमकिन हो तो जवाब जरूर दें। मीडिया में अपने तीन साल के अनुभव में मैंने जितना देखा उससे तो एक फीसदी भी नहीं लगता कि कोई मीडियाकर्मी अपने अधिकारों के लिए लडऩे के बारे में सोचता भी होगा। आखिर ऐसा क्यों? क्या उसे अपने अधिकारों से ज्यादा अपनी नौकरी की परवाह है? क्या वह इस काबिल भी नहीं कि उस संस्थान में नौकरी कर सके जहां कम से कम उसके अधिकारों पर डाका न डाला जाता हो।

: आप वहां नौकरी करना चाहते हैं तो अपने अधिकारों की बात भी मत कीजिए : मीडिया हर एक पीडि़त, शोषित और अन्याय के लिए भटक रहे लोगों की आवाज उठाता है, पूरी कोशिश करता है कि उसको इंसाफ मिले और मिलता भी है। अगर इस बात को हम दूसरे तरीके से सोचें यानी कितने प्रतिशत मीडिया कर्मी अपने हक के लिए आवाज उठाते या लड़ते हैं, तो शायद हमारे दिमाग में कुछ गिने चुने नामों के अलावा कोई नाम न आए। काफी दिनों से ये सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा है कि इसका क्या हल होना चाहिए? इस सवाल को अब मैं आप के बीच छोड़ रहा हूं अगर मुमकिन हो तो जवाब जरूर दें। मीडिया में अपने तीन साल के अनुभव में मैंने जितना देखा उससे तो एक फीसदी भी नहीं लगता कि कोई मीडियाकर्मी अपने अधिकारों के लिए लडऩे के बारे में सोचता भी होगा। आखिर ऐसा क्यों? क्या उसे अपने अधिकारों से ज्यादा अपनी नौकरी की परवाह है? क्या वह इस काबिल भी नहीं कि उस संस्थान में नौकरी कर सके जहां कम से कम उसके अधिकारों पर डाका न डाला जाता हो।

यह सोच कर मैं बहुत हैरान होता हूं कि कोई व्यक्ति दूसरे के अधिकारों के लिए क्या लड़ेगा, जो अपने अधिकारों की बात ही नहीं कर सकता। इसका साफ-साफ मतलब यही निकलता है कि वह जनता के, पीडि़तों के या शोषितों के अधिकारों की बात सिर्फ इसलिए कर रहा है, क्योंकि उसका काम ही यही है। जहां तक मैं पत्रकारिता के बारे में सोचता था और सोचता हूं कि कोई भी व्यक्ति इस फिल्ड में तभी आता है, अगर उसमें दूसरों के मसलों को उठाने या उनके लिए लडऩे का माद्दा होता है। लगभग ये मसला अब खत्म होता जा रहा है और आजकल मीडिया से जुड़कर आदमी या तो अपने निजी मसले हल करवाना चाहता है या अपने आप को वीआईपी दिखाना चाहता है।

अपनी पहली नौकरी, जो कि जालंधर से प्रकाशित होते पंजाब केसरी में थी, के अनुभव से मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर आप वहां नौकरी करना चाहते हैं तो अपने अधिकारों की बात भी मत कीजिए। वहां के बहुत से लोग अपने पीएफ का केस लड़ते-लड़ते या तो भगवान को प्यारे हो चुके हैं या उन्होंने उम्मीद ही छोड़ दी हैं। हां, एक बड़ा वर्ग वो भी है जो उनकी ‘हां’ में ‘हां’ मिलाता है तो उनके अधिकारों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती। अब जरा अधिकारों के बारे में भी सुन लें। अधिकार वे जो कंपनी खुद उन्हें देना चाहे, ना कि वे जो किसी भी कंपनी में काम करते हुए उन्हें खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। कई व्यक्तियों को तो एडिटर द्वारा यहां तक कहा जा चुका है कि ‘आप केस कर दीजिए, हमने बहुत से वकीलों को नौकरी पर रखा है,  इसी बहाने उनको भी काम मिल जाएगा। वहां किसी व्यक्ति के क्या अधिकार होंगे आप सोच सकते हैं।

दूसरी घटना, जिसे मैं भूला नहीं पा रहा हूं, वो घटना है दैनिक भास्कर लुधियाना की। भास्कर बड़ा ग्रुप है और इस बात में भी कोई शक नहीं है कि भास्कर ने अपने कर्मचारियों के लिए बहुत से नियम बनाए हैं, जो कंपनी एक्ट से भी बाहर हैं और वो सारे नियम उनकी वेबसाइट पर पड़े हैं, जिसे कोई भी कर्मचारी देख सकता है। पर जहां तक मैं जानता हूं, भास्कर लुधियाना के कर्मचारियों के अधिकारों के साथ भी दिन प्रतिदिन नया ड्रामा होता था। वहां के एचआर अधिकारी तो अपने ही नियम बनाएं बैठे थे और अगर कोई कानूनों की बात करे तो फिर वो भड़क जाते।

एक घटना मुझे याद है, जब एक लड़के ने भास्कर की ही वेबसाइट से कंपनी लॉ के प्रिंट निकालकर एचआर महाशय को दिखाए तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। उसके बाद से उसके कुछेक अधिकार उसे मिले भी। सोचने की बात यह है कि अगर कंपनी अपने कर्मचारियों को उनके हक दे रही है तो उनको अप्लाई करने में परेशानी क्यों है? एचआर हेड हो या कोई भी, आखिर कर वो भी तो नौकरी ही रहा है। जहां तक मेरा ख्याल है, ये मसला सीधा-सीधा ‘चाटुकारिता’ का ही है। वो महाशय अपने आप को कंपनी के सबसे ईमानदार व्यक्ति दिखाना चाहते हैं, पर अपने आप को धोखा दे रहे हैं।

ऐसे व्यक्ति जनता के हकों के रखवाले होने का ढोंग कर रहे हैं। जो अपने हक के लिए नहीं लड़ सकता वो जनता के लिए भी कुछ नहीं कर सकता। या वो अखबारों में बड़ी-बड़ी खबरें छापते वक्त सिर्फ यही सोचते होंगे कि अगर खबर पर कोई एक्शन लिया जाता है तो भी ठीक है, नहीं लिया जाता तो भी ठीक है। उनका काम तो सिर्फ खबर लगाना या दिखाना ही है। मेरे ख्याल से उन पत्रकारों को अपनी नौकरियों से तुरंत प्रभाव से इस्तीफा दे देना चाहिए, जो अपने हक के लिए लड़ ना पा रहे हों। बुजदिली से जीने से मौत अच्छी है। आखिर कब तक जनता के रहबर होने का बोझ ढोएंगे वो। एक दिन जब उनका दिल व दिमाग जवाब दे देगा, तब शायद उनके पास जिंदा रहने की भी ताकत ना बचे।

लेखक इमरान पत्रकार और ब्‍लागर हैं.

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