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अब घुंसू नहीं जा पायेगा स्‍कूल!

: विस्‍थापन से छिनने जा रहा है घुंसू जैसे कई बच्‍चों का मौलिक हक : मध्यप्रदेश के घुंसू को नहीं पता कि उसका भविष्य अंधकारमय होने जा रहा है। वह ही क्या, बांधवगढ़ नेशनल पार्क के बफर एरिया में बसे दो गांव के घुंसू जैसे सैकड़ों बच्चे इस बात से अनजान हैं। इन बच्चों को नहीं मालूम कि देश के नौनिहालों को शिक्षा पाने का अधिकार मिला हुआ है। इसके बावजूद मध्यप्रदेश सरकार उनका हक छीनने पर आमादा है। राज्य सरकार ने बाघों के संरक्षण के नाम पर दिवाली तक इन गांवों को खाली करने के निर्देश दिए हैं। ऐसा होता है तो बच्चों के घर छूटेंगे। साथ ही छूट जाएंगे उनके स्कूल। इसका सीधा असर पड़ेगा बच्चों के भविष्य पर। लेकिन राज्य सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।

: विस्‍थापन से छिनने जा रहा है घुंसू जैसे कई बच्‍चों का मौलिक हक : मध्यप्रदेश के घुंसू को नहीं पता कि उसका भविष्य अंधकारमय होने जा रहा है। वह ही क्या, बांधवगढ़ नेशनल पार्क के बफर एरिया में बसे दो गांव के घुंसू जैसे सैकड़ों बच्चे इस बात से अनजान हैं। इन बच्चों को नहीं मालूम कि देश के नौनिहालों को शिक्षा पाने का अधिकार मिला हुआ है। इसके बावजूद मध्यप्रदेश सरकार उनका हक छीनने पर आमादा है। राज्य सरकार ने बाघों के संरक्षण के नाम पर दिवाली तक इन गांवों को खाली करने के निर्देश दिए हैं। ऐसा होता है तो बच्चों के घर छूटेंगे। साथ ही छूट जाएंगे उनके स्कूल। इसका सीधा असर पड़ेगा बच्चों के भविष्य पर। लेकिन राज्य सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।

प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान खुद को किसान का बेटा कहते हैं और खुद को प्रदेश के बच्चों का मामा बताते हैं। लेकिन उन्हीं के प्रदेश में कुछ जगह पर किसानों के बच्चे बेघर होने को विवश हैं। वे बेटियों को स्कूल जाने के लिए बोलते हैं लेकिन उन्हीं के विभाग की तानाशाही रवैया के कारण बेटे-बेटियां जल्दी स्कूल छोड़ देंगे। इसके बावजूद सरकार कहती है कि उसमें उसका कोई दोष नहीं है। क्योंकि बाघों को बचाने के लिए इंसान को जंगल खाली करना ही पड़ेगा। लेकिन न तो सरकार के पास इस बात का जवाब है न उमरिया के स्थानीय प्रशासन और पार्क प्रशासन के पास कि जंगल छोड़ेंगे तो बच्चों के शिक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी। इस प्रश्‍न पर चारों तरफ सिर्फ खामोशी है और कुछ नहीं।

अपने शोध कार्य के लिए मध्य प्रदेश के नेशनल पार्कों में घूमने के दौरान नेशनल पार्क के विस्थापित होने वाले गांव या फिर बांध के कारण विस्थापित हुए लोगों के बीच जाना हुआ। इसमें पाया गया कि कहीं भी बच्चों के अधिकारों की कोई बात नहीं कर रहा है। कुछेक गैरसरकारी संगठन लगातार इस मुद्दे पर चिंता तो जाहिर कर रहे हैं लेकिन वे भी इसे मुद्दा नहीं बना पा रहे हैं। सरकार से लेकर बच्चों के अभिभावकों के लिए यह कोई मुद्दा नहीं है। इसका जवाब वे खुद ही देते हैं। उनकी माने तो जब विस्थापन होता है तो सबसे पहले सुरक्षित ठिकाने की तलाश की जाती है। स्कूल-अस्पताल तो बाद की बात है।

प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान कहते हैं कि इससे अधिक अफसोस की क्या बात होगी कि आजादी के साठ साल बाद भी विस्थापन के वक्त बच्चे और महिलाएं बहुत पीछे छूट जाते हैं। विकास संवाद केंद्र के सचिन जैन भी राकेश दीवान की बात से सहमत हैं। वे कहते हैं कि जब तक राजनीतिक और समाजिक स्तर पर बच्चों के मु्द्दे को गंभीर ढंग़ से नहीं समझा जाएगा, तब तक स्थिति यही रहेगी। हालांकि, राज्य सरकार के नुमाइंदे ऐसा नहीं मानते हैं। राज्य सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री से जब मैंने विस्थापन में बच्चों के विषय में बात की तो उनका कहना था कि बच्चों के मां-बाप को दस लाख रुपए दे रहे हैं, उससे अधिक और क्या देंगे। पूरी जिंदगी में वे उतना पैसा नहीं कमा पाएंगे।

लेखक आशीष विकास संवाद केंद्र के फैलो व युवा पत्रकार हैं.

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