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अब बिहार में विकास बनाम विकास

आज के चुनावी माहौल में सभी एक मुद्दा विशेष रुप से उठा रहें हैं, वो है विकास। वैसे तो बिहार की राजनीति कई मामलों में चर्चा का विषय बनती रही है। जैसे जाति की राजनीति, दबंगों की राजनीति, लेकिन पहली बार इस राज्य में विकास का मुद्दा सबके सिर चढ़कर बोल रहा है। चाहे वो राजनीतिक पार्टी के नेता हों या फिर आम जनता। नेता को लें तो नीतीश कुमार अपने शासन काल में किये गये विकास कार्यों के लिए खुद मियां मिट्ठू बन रहे हैं और विकास कार्यों को आगे जारी रखने और इसका मेहनताना मांगने के तौर पर पांच साल और मांग रहे हैं, तो दूसरी तरफ राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद राज्य का विकास, अपने शासनकाल में किये रेलवे के विकास की तरह करने की बात करते हुए कहते हैं कि एक बार मौका दीजिए राज्य को रेल की तरह चमका देंगे। उनके इस दावे को राजद युवराज तेजस्वी भी सुर में सुर मिलाकर बोल रहे हैं। साथ ही इनके जोड़ीदार और दलितों के नेता कहे जाने वाले लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान का कहना है कि बिना दलितों के विकास के राज्य का विकास नहीं हो सकता है।

आज के चुनावी माहौल में सभी एक मुद्दा विशेष रुप से उठा रहें हैं, वो है विकास। वैसे तो बिहार की राजनीति कई मामलों में चर्चा का विषय बनती रही है। जैसे जाति की राजनीति, दबंगों की राजनीति, लेकिन पहली बार इस राज्य में विकास का मुद्दा सबके सिर चढ़कर बोल रहा है। चाहे वो राजनीतिक पार्टी के नेता हों या फिर आम जनता। नेता को लें तो नीतीश कुमार अपने शासन काल में किये गये विकास कार्यों के लिए खुद मियां मिट्ठू बन रहे हैं और विकास कार्यों को आगे जारी रखने और इसका मेहनताना मांगने के तौर पर पांच साल और मांग रहे हैं, तो दूसरी तरफ राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद राज्य का विकास, अपने शासनकाल में किये रेलवे के विकास की तरह करने की बात करते हुए कहते हैं कि एक बार मौका दीजिए राज्य को रेल की तरह चमका देंगे। उनके इस दावे को राजद युवराज तेजस्वी भी सुर में सुर मिलाकर बोल रहे हैं। साथ ही इनके जोड़ीदार और दलितों के नेता कहे जाने वाले लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान का कहना है कि बिना दलितों के विकास के राज्य का विकास नहीं हो सकता है।

इस वक्त मानों इन राजनैतिक पार्टियों के नेताओं के पास के मुद्दों की कमी हो गई है। राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार, जिसके लिए देश भर में बिहार चर्चा का विषय बनता रहा है। कभी राज्य की आर्थिक सशक्ति की कारण मानी जाने वाली यहां की 28 चीनी मिलें, जिनमें ज्‍यादातर, सरकारी अनदेखी के कारण बंद पड़ी है। जो 9 चीनी मिलें चालू हैं वे भी अभी आधारभूत समस्याओं से जूझ रही हैं। या फिर कोसी का महाप्रलय, जो पूरे सीमांचल को बरसात में लील जाता है। अशिक्षा है, बेरोजगारी है। आज विकास के आगे मानों गौण दिखता मालूम पड़ रहा है।

अगर कांग्रेस की बात ली जाए तो वह भी कहां पीछे रहने वाली थी। बिहार में अपनी साख बचाने के लिए कांग्रेस के कई दिग्गज नेता राज्य का चुनावी दौरा कर रहे हैं। और विकास के नाम को ठिकरा साबित कर रहे हैं। सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राहुल गांधी सहित सभी यही कहना है कि केन्द्र ने पहले के मुकाबले दुगुना पैसा दिया है। लेकिन राज्य सरकार ने उसका ठीक ढंग से उपयोग नहीं किया। जिसके कारण यहां के युवा पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। यहां का विकास केवल कागजी खेल है। कांग्रेस के हाथ में हाथ दीजिए तब देखिए देश के साथ बिहार भी विकास के राह पर अग्रसर होगा।

चौथे एलायंस की बात करें तो उनका कहना है कि बिना किसानों के विकास के बिहार में विकास की कल्पना करना असंभव है। हम राज्य में भूमि सुधार कानून को लागू कर विकास की नई बयार बहायेंगे। जहां तक आम जनता की बात है वो अब जाति की राजनीति से ऊब चुकी है। बिहार जनता अब जाग चुकी है, वो भी विकास चाहती है। इसका उदाहरण हैं प्रथम चरण का मतदान, हालांकि इसे लोकतंत्र के हित में सही नहीं माना जा सकता है, लोगों ने चुनाव का बहिष्‍कार किया। जिन इलाकों में विकास का काम नहीं हुआ है, वहां जनता वोटिंग बहिष्कार इसलिए किया कि विकास नहीं हुआ तो हम अपना वोट भी नहीं देंगे। यह तो लगभग तय है कि 15वीं बिहार विधानसभा चुनाव विकास बनाम विकास लड़ा जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विकास का मुद्दा किसको ताज देता है और किस पर गाज गिराता है।

लेखिका सविता कुमारी पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.

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