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अमेरिका, चांद और तस्वीर में कैद क्लिंटन की शर्म

दयाशंकर शुक्‍ल सागर: मेरी विदेश डायरी- 8 : चांद पर झंडे के लहराने की गुत्थी अमेरिका आज तक नहीं सुलझा पाया है : मेड इन चाइना का ठप्पा एशियाई देशों में अपनी विश्वसीयता खो चुका है : वाशिंगटन का बाजार आश्चर्यजनक रूप से चीन और भारत में निर्मित वस्तुओं से पटा हुआ है : अजनबी शहरों में घूमने का एक अलग सुख होता है। तमाम बिखरे हुए चित्र स्मृतियों के कैमरे में अपने आप कैद होते जाते हैं। वाशिंगटन की सड़क पर घूमते हुए महसूस किया कि यह शहर अपने आप में इतिहास का एलबम है। अमरिकयों के पास 500 साल से ज्यादा पुराना इतिहास नहीं। इसलिए अमेरिकी हर बड़ी घटना को ऐतिहासिक बनाते हुए वह उसे अमरत्व प्रदान करने की कला में माहिर हैं। 23 स्ट्रीट पर नेशनल प्रेस क्लब की बहुमंजिला इमारत के पांचवे तल की आर्ट गैलरी में पत्रकारिता के लिए दिए गए तमाम पुरस्कार और मेडल सजे हुए हैं।

दयाशंकर शुक्‍ल सागर: मेरी विदेश डायरी- 8 : चांद पर झंडे के लहराने की गुत्थी अमेरिका आज तक नहीं सुलझा पाया है : मेड इन चाइना का ठप्पा एशियाई देशों में अपनी विश्वसीयता खो चुका है : वाशिंगटन का बाजार आश्चर्यजनक रूप से चीन और भारत में निर्मित वस्तुओं से पटा हुआ है : अजनबी शहरों में घूमने का एक अलग सुख होता है। तमाम बिखरे हुए चित्र स्मृतियों के कैमरे में अपने आप कैद होते जाते हैं। वाशिंगटन की सड़क पर घूमते हुए महसूस किया कि यह शहर अपने आप में इतिहास का एलबम है। अमरिकयों के पास 500 साल से ज्यादा पुराना इतिहास नहीं। इसलिए अमेरिकी हर बड़ी घटना को ऐतिहासिक बनाते हुए वह उसे अमरत्व प्रदान करने की कला में माहिर हैं। 23 स्ट्रीट पर नेशनल प्रेस क्लब की बहुमंजिला इमारत के पांचवे तल की आर्ट गैलरी में पत्रकारिता के लिए दिए गए तमाम पुरस्कार और मेडल सजे हुए हैं।

दीवार पर पहली तस्वीर व्हाइट हाउस के रोज गार्डन के एक सफेद पिलर से सट कर खड़े सिर झुकाए बिल क्लिंटन की है। क्लिंटन ने पहली दफा मोनिका लेविस्की सेक्स स्कैड़ल के लिए देश से माफी मांगी थी। एसोसिएट प्रेस के फोटोग्राफर स्टाट एपिलवाइट की इस तस्वीर को 1996 में पुल्तिजर अवार्ड मिला था। अमेरिका ने इसे इतिहास का हिस्सा बना दिया।

नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम में अमेरिका ने अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी घटनाओं को सहेज कर रखा है। 1969 में इंसान ने पहली बार चाँद पर कदम रखा। चाँद पर पहुँचने वाला पहला शटल अपोलो-1 को म्यूजियम में रखा गया है। पूरे यान को लैमिनेट कर के रखा गया है ताकि लोग यान को स्पर्श कर देख सकें। म्यूजिम में दाखिल होते ही पूरे दीवार पर नील आर्मस्ट्रांग की भव्य तस्वीर लगी है। उसके हाथ में अमेरिका का झंडा लहरा रहा है। यह अलग बात है कि चाँद पर हवा नहीं। चांद पर झंडे के लहराने की गुत्थी अमेरिका आज तक नहीं सुलझा पाया है।
हमारे साथ दूसरे मुल्कों से आए मित्र शापिंग करना चाहते हैं। हम शापिंग माल की तरफ बढ़ जाते हैं। अमेरिका में वाल मार्ट, द गैलरी, बेस्ट बाई जैसे तमाम भव्य शापिंग मॉल हैं।

बाजार आश्चर्यजनक रूप से चीन और भारत में निर्मित वस्तुओं से पटा हुआ है। सूई से लेकर कंप्यूटर तक पर ‘मेड इन चाइना’ लिखा हुआ है। पेसिंल, अगरबत्ती, इत्र जैसी चीजें मेड इन इंडिया हैं। हालांकि गुणवत्ता के लिहाज से मेड इन चाइना का माल भारत में बिकने वाले चाइनीज माल से हजार गुना बेहतर है। लेकिन मेड इन चाइना का ठप्पा एशियाई देशों में अपनी विश्वसीयता खो चुका है।
अमेरिकी मित्र स्टीव बताते हैं कि ‘हम एयर क्राफ्ट बनाते हैं। अत्याधुनिक चिकित्सा परीक्षण उपकरण बनाते हैं। साबुन सोडा बनाने में हम अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करते।’ सच तो यह है कि एयरक्राफ्ट और अन्य अत्याधुनिक उपकरणों के निर्माण के पीछे भी भारत और दक्षिण कोरिया जैसे मुल्कों के लोगों का दिमाग है।

मसलन एमआरआई मशीन बनाने वाली एक बड़ी कंपनी ने जान हॉपकिंस यूनिवर्सिटी को करोड़ों डालर एक प्रोजेक्ट दिया है। कंपनी का मकसद अपडेटड एमआरआई मशीन बनाना है। हापकिंग्स यूनीवर्सिटी ने विज्ञापन निकाल कर दुनिया भर के एमआरआई विशेषज्ञों, शोधार्थियों और इंजीनियरों को अपने यहां मोटी सेलरी पर बुला लिया है। सब मिलकर एमआरआई मशीन को और अधिक अत्याधुनिक बनाने में जुटे हैं। भारतीय मूल के डा. निर्भय सिंह भी इसी टीम का हिस्सा हैं। उन्हें आस्ट्रेलिया से बुलाया गया है। डा. निर्भय कहते हैं कि ‘अमेरिका हमारे दिमाग पर राज करता है। वह हमे खरीद लेता है मुंहमांगे दाम पर। अब निजी कंपनी इस मशीन पर मेड इन यूएसए का ठप्पा लगाकर पुरी दुनिया को मुंहमाँगी कीमत पर बेचेगी।’

अमेरिका में पेड़ पौधों की पत्तियों का हरा रंग आकर्षित कर रहा है। गहरा हरा रंग। शायद ये वसंत का असर है। चमकती धूप में भी हवा में एक खास तरह का भारी पन है। दूर जैसे कहीं तेज बारिश हो रही हो। शायद हिन्दुस्तान में। नहीं। वहां की बरसाती हवाओं में मिट्टी की एक सौंधी महक होती है। वह महक यहाँ नहीं क्योंकि अमरिकयों ने शहरों को कंकरीट का जंगल बना कर अपनी मिट्टी को लकड़ी के चिप्स और बुरादे से छुपा दिया है।

दयाशंकर शुक्ल सागर ‘दैनिक हिंदुस्तान’ लखनऊ में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. सागर को अमेरिका की जोन्स हापकिंस यूनिवर्सिटी ने फैलोशिप-2010 के लिए चयनित किया है. इन दिनों वे अमेरिका की यात्रा पर हैं.

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