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अयोध्‍या : अभी फैसला टला है संकट नहीं!

भारत सभी धर्मों से मिलकर एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश बना है, जिसकी मिसाले पूरे दुनिया में दी तो जाती है, लेकिन उसके स्वरूप को बरकरार रखने के लिये कोई ठोस पहल नही की जा रही है। देश के साम्प्रदायिक सौहार्द को जैसे किसी की नजर लगती जा रही है। बार-बार देश के अंदर एक ऐसा संकट कुछ राजनैतिक दलों द्वारा खड़ा किया जाता रहा है, जो हमारे समाज में एक दहशत भरा माहौल पैदा कर देता है। अब यह साजिशकर्ता देश की सर्वोच्च अदालत में कानून की आड़ लेकर अपना उल्लू सीधा करने में जुट गये हैं। हम न्यायपालिका के सम्मान की बात तो करते हैं लेकिन उसे इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते।

भारत सभी धर्मों से मिलकर एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश बना है, जिसकी मिसाले पूरे दुनिया में दी तो जाती है, लेकिन उसके स्वरूप को बरकरार रखने के लिये कोई ठोस पहल नही की जा रही है। देश के साम्प्रदायिक सौहार्द को जैसे किसी की नजर लगती जा रही है। बार-बार देश के अंदर एक ऐसा संकट कुछ राजनैतिक दलों द्वारा खड़ा किया जाता रहा है, जो हमारे समाज में एक दहशत भरा माहौल पैदा कर देता है। अब यह साजिशकर्ता देश की सर्वोच्च अदालत में कानून की आड़ लेकर अपना उल्लू सीधा करने में जुट गये हैं। हम न्यायपालिका के सम्मान की बात तो करते हैं लेकिन उसे इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते।

न्यायपालिका की आड़ लेकर हम कुछ समय के लिये कामयाब तो हो सकते हैं, लेकिन असल समस्या इस तरह के दांव-पेंच से शायद ही दूर हो- ऐसा मेरा मानना है। देश में बार-बार धर्म के स्वरूप को पेश करके, भावना की बात करके हम इस समाज में अपने आपको शक्तिशाली बनाने की बात तो करते हैं, लेकिन असल में हम अंदर से काफी खोखले हो चुके हैं। देश की आजादी तो हमे बुजुर्ग दिलवा गये लेकिन आजादी के बाद लिये गये कुछ ऐसे निर्णय देश के स्वरूप को नष्ट करने में लगे हुये हैं, जिसे अब समझने की बहुत जरूरत है। बार-बार जिस तरह जिन्न की बोतल से अयोध्या विवाद को लाकर इस देश में नफरत पैदा की जाती है, वह काफी गंभीर मसला है। इस तरह के निर्णय से देश की एकता और अखण्डता भी मुझे टूटती दिखाई दे रही है।

पूरे विश्व में अयोध्या बाबरी मस्जिद विवाद एक ऐसा विवाद बन कर अब खड़ा हो गया है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं कि आखिर इस मामले में भारत की न्यायपालिका का क्या निर्णय होगा। अयोध्या में 800 वर्ग फुट की जमीन की मिल्कियत का विवाद पिछले 60 सालों से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में चल रहा है। इन 60 वर्षो में कानूनी दांव-पेंच में उलझा यह विवाद 24 सितम्बर को एक तस्वीर के रूप में सामने आने वाला था कि आखिर इसमें क्या सच है, क्या झूठ है? लेकिन इस पर भी साजिशकर्ताओं की नजर लग चुकी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना अतिंम फैसला 24 सितम्बर को सुनाने जा रही थी। पूरे देश में इस फैसले को लेकर सभी की निगाहें लगी थी। तभी एक याचिका ने इस पूरी मेहनत को साजिश का शिकार बनाकर एक और संकट खड़ा कर दिया है। कल के निर्णय के बाद क्या संकट खड़ा होगा, उस पर राज्य की मायावती सरकार पूरी तरह से सतर्क हो गयी थी। करोड़ों रूपये खर्च करके कानून-व्‍यवस्था का इंतजाम किया गया था। पुलिस के जवान मुस्तैद कर दिये गये थे। एक अजीब सी खामोशी पूरे देश में छा चुकी थी। तभी हमारे देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसी याचिका को सुन कर एक प्रतिशत सुलह की गुंजाइश बताकर आने वाले निर्णय पर 28 सितम्बर तक रोक लगा दी।

मै इस निर्णय का विरोध नहीं कर रहा हूं, लेकिन इस निर्णय के आने के बाद यह अवश्य कह सकता हूं कि इस विवाद का फैसला कुछ दिनों के लिये टल अवश्य गया है, लेकिन यह संकट पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। हमारे देश का यह कैसा कानून है? जब हाईकोर्ट के 60 साल की कानूनी लड़ाई के दौरान हुयी बहस के के बाद भी कोई समझौता-सुलह दोनो पक्षों में नहीं हुआ तो अब इन पांच दिनों में कौन सा जादू हो जायेगा। दोना पक्ष कई बार चीख-चीख कर कह चुके हैं कि अब आम सहमति से इस विवाद का समझौता संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को हम इस नजरिये से देखते हैं कि इसमें कोई न कोई पीछे से अवश्य खड़ा है। और वह इस याचिका को दाखिल कराकर पूरे 60 वर्षो के कानूनी जिरह को चंद दिनों में साजिश का शिकार बनाना चाहता है। याचिकाकर्ता को आज अचानक दोनों पक्षों में सुलह की याद कैसे आ गयी? सुलह-बहस के दौरान होने वाली कई वर्षो की प्रक्रिया के बीच होनी चाहिये थी। लेकिन आज अचानक करोड़ों रूपये खर्च करके और (इन 60 सालों में देश की करोड़ों जनता ने हर पल दहशत में काटे हों) अचानक फैसले को टाल देने से कोई राहत मिल सकती है?

मेरा मानना है कि देश की आवाम को राहत तो आने वाले फैसले से मिलती। क्योकि जो निर्णय आना था वह आ जाता। और रोज-रोज दहशत के साये में मरने से अच्छा एक बार मर जाते वाली कहावत हो जाती। क्योकि निर्णय आना है और निर्णय किसी एक के पक्ष में होना है। देश के दोनों समुदाय को यह पता चल जाता कि कानूनी रूप से इस विवाद का फैसला क्या है। भले ही फैसला एक समुदाय के पक्ष में जाता। लेकिन तस्वीर पूरी तरह से लम्बी जद्दोजहद के बाद साफ हो जाती। फैसला टालने से इस विवाद का संकट खत्म नहीं हो गया है। संकट तो अब शुरू हुआ है। क्योकि जिस राजनैतिक दल को इस पूरे विवाद को बनाये रखकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकनी थी, उनकी रोटियां अब भी कई सालों तक फैसला टलने के कारण सिकती रहेगी। यह स्थित इस देश के लिये घातक है।

अच्छा होता कि फैसला आ जाता और इस विवाद का पटाक्षेप की पहली शुरूआत हो जाती। कुल मिलाकर मेरे नजरिये से अयोध्या जमीन विवाद का संकट अभी भी पूरी तरह से बरकरार है। सिर्फ कुछ घंटों या दिनों के लिये टाल दिया गया है। लेकिन इस रोक के पीछे एक और तस्वीर इस निर्णय से निकल कर सामने आ सकती है कि कहीं ऐसा न हो कि तीन सदस्यीय खण्डपीठ की पूरी मेहनत पर 28 सितम्बर को होने वाली सुनवाई के बाद फिर निर्णय को टाल कर सभी की मेहनत पर पानी फेर दिया जाये। अगर ऐसा होता है तो यह न तो न्यायपालिका की गरिमा के लिये ठीक होगा और न ही इस देश की आवाम के लिये। इससे आने वाले समय में दो समुदायों के बीच और कटुता बढ़ती जायेगी। कुल मिलाकर इस देश में अब साजिश कानून का सहारा लेकर होने लगी है। यह भी समाज के लिये काफी घातक है। इस प्रवृत्ति को भी रोकना होगा। अगर इसे नहीं रोका गया तो वह भी आने वाले समय में एक घातक रूप ले सकती है। मेंरा आशय न्यायालय पर सवाल उठाना नहीं बल्कि न्यायालय से समाज को मिलने वाले सही स्वरूप से है। सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेकर किसी भी मामले को टालना इस देश व समाज के लिये हितकर नहीं है। कोर्ट को याचिकाकर्ता की मंशा को पूरी तरह से समझना चाहिये कि आखिर उसके पीछे कौन खड़ा है?

लेखक प्रभात त्रिपाठी लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाजवाद का उदय के ब्‍यूरो चीफ हैं.

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