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अयोध्‍या की तस्‍वीर का कंट्रास्‍ट

उत्‍कर्ष दो दशक बीत चुके हैं अयोध्या के खूनी इतिहास के। और इस समय काल में दो पूरी पीढि़यां बाल्यावस्था से जवानी की दहलीज पर आ गयी हैं। इन सभी के लिए अयोध्या का मतलब हिन्दू-मुस्लिम झगड़े की वजह या फिर भावनात्मक हिन्दूवाद या भावनात्मक इस्लामवाद ही है। पर भावना से अलग अयोध्या का इतिहास क्या है, यह विचारने की न किसी ने हालिया दिनों में कोशिश की और न ही किसी ने अपनी पूरी नई पीढ़ी को अयोध्या की तस्वीर का कन्ट्रास्ट दिखाया। अयोध्या की तस्वीर में अब भी देखने वालों को या तो भगवा रंग दिखाई देता है या फिर हरा। पर अयोध्या की यह एक रंगी तस्वीर सच नहीं है। वास्तव में अयोध्या की ऐतिहासिक तस्वीर इन्द्रधनुषी है पर आज के दौर के सियासी दुकानदारों के लिए इस इन्द्रधनुष को छुपाना बहुत ही आवश्यक है और वे यही कर भी रहे हैं।

उत्‍कर्ष दो दशक बीत चुके हैं अयोध्या के खूनी इतिहास के। और इस समय काल में दो पूरी पीढि़यां बाल्यावस्था से जवानी की दहलीज पर आ गयी हैं। इन सभी के लिए अयोध्या का मतलब हिन्दू-मुस्लिम झगड़े की वजह या फिर भावनात्मक हिन्दूवाद या भावनात्मक इस्लामवाद ही है। पर भावना से अलग अयोध्या का इतिहास क्या है, यह विचारने की न किसी ने हालिया दिनों में कोशिश की और न ही किसी ने अपनी पूरी नई पीढ़ी को अयोध्या की तस्वीर का कन्ट्रास्ट दिखाया। अयोध्या की तस्वीर में अब भी देखने वालों को या तो भगवा रंग दिखाई देता है या फिर हरा। पर अयोध्या की यह एक रंगी तस्वीर सच नहीं है। वास्तव में अयोध्या की ऐतिहासिक तस्वीर इन्द्रधनुषी है पर आज के दौर के सियासी दुकानदारों के लिए इस इन्द्रधनुष को छुपाना बहुत ही आवश्यक है और वे यही कर भी रहे हैं।

पर दरहकीकत अयोध्या राजा रामचन्द्र के शासन के बाद भी लगभग सभी धर्मों का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। अयोध्या इस्लाम, हिन्दू तथा अन्य धर्मों एवं संस्कृतियों के मेल के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह गैर हिन्दुओं के एक बड़े तबके के लिए भी पवित्र स्थल है। यहां अनेक मुस्लिम, जैन एवं सिख तीर्थस्थल हैं। इतिहासकारों के अनुसार यहां पहले बौद्ध स्थल भी थे। इतिहासकार प्रो. रामशरण शर्मा के अनुसार -‘‘मध्यकाल में अयोध्या एक धार्मिक तीर्थस्थल के रूप में उभरा है। यद्यपि विष्णु स्मृति के अध्याय 85 में कस्बे, झील, नदियां, पर्वत सहित लगभग 52 तीर्थों की सूची है पर इसमें अयोध्या नहीं है। शर्मा तो यहां तक लिखते हैं कि तुलसी की रामचरित मानस (1575 ई0) में अयोध्या का तीर्थस्थल के रूप में वर्णन नहीं है जबकि प्रयाग को तीर्थराज कहा गया है।

इतिहास के स्त्रोतों से यह भी पता चलता है कि हिन्दुओं के तीर्थस्थल के रूप में स्थापित होने से पहले अयोध्या एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल था, इस समय राजा शुद्धोधन के राज्य में यह कौशल या साकेत के नाम से जाना जाता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार उसकी यात्रा के समय अयोध्या में करीब तीन हजार बौद्ध भिक्षु थे और 100 बौद्ध विहारों के साथ 10 बड़े मन्दिर भी। प्रो. शर्मा फाह्यान का जिक्र भी करते हैं, जिन्होंने पांचवी शताब्दी में भारत की यात्रा की थी और उसने अयोध्या में बुद्ध की दातुन का उल्लेख किया है, जो 7 क्यूबिट लम्बी हो गयी थी और ब्राहमणों के नष्ट करने के बाद भी नष्ट नहीं हुई। स्थानीय निवासियों के अनुसार अयोध्या में एक बुद्ध कुण्ड है जिसे वर्तमान में ‘‘दातुन कुण्ड’’ के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर बुद्ध ने 16 वर्षो तक तपस्या और ज्ञान प्राप्त किया यह विवरण एक संकेत देता है कि अयोध्या एक बौद्ध प्रभाव का शहर रहा है और बौद्ध धर्म के प्रभाव के पतन के बाद यह हिन्दू स्थल बन गया।

जैनियों के लिए भी अयोध्या का एक विशिष्ट स्थान है। कहा जाता है कि पांच जैन तीर्थकरों – ऋषभ देव, अजीत नाथ, अभिनन्दन नाथ, शुक्ल नाथ और अनन्त नाथ का जन्म यहीं हुआ था। जैनियों के दो पुराने मन्दिर इस समुदाय के लिए अयोध्या का महत्व बताते हैं। इसी तरह सिखों के लिए भी अयोध्या महत्वपूर्ण है। सरयू के किनारे गुरूद्वारा ब्रहमकुण्ड साहिब है। यह इसलिए विशिष्ट है कि तीन सिख गुरूओं ने यहां उपदेश दिए हैं। 1557 में हरिद्वार से पुरी की यात्रा के बीच गुरू नानक यहां आए। 1725 सम्वत में गुरू तेग बहादुर का आगमन हुआ और वे दो दिन तक यहां ध्यान मग्न रहे। 1729 में जब गुरू गोविन्द सिंह यहां आए तो वे सिर्फ 10 वर्ष के थे।

इतिहासकारों ने इन सभी धर्मो पर तो विस्तार से लिखा है पर मुसलमानों के लिए इसके महत्व पर अपेक्षाकृत कम प्रकाश डाला गया है। अयोध्या सिर्फ मीर बाकी की बनाई बाबरी मस्जिद की वजह से अपने इस्लामिक महत्व को नहीं दर्शाता। यह तो विजय और उसके दम्भ का प्रतिबिम्ब है। दरअसल अयोध्या में बहुत से विशिष्ट मुस्लिमों की दरगाहें या कब्र है। इनमें हजरत शीश की दरगाह भी शामिल है जो हजरत आदम के बेटे थे। इसके अलावा अयोध्या में बहुत से सूफी सन्तों की भी दरगाहे हैं जो हिन्दु और मुसलमान दोनों के लिए एक समान श्रद्धा का विषय हैं। यह ऐतिहासिक सच है कि सूफी स्थलों में ही मिली जुली गंगा जमुनी तहजीब का सर्वाधिक विस्तार हुआ है और भक्तिकाल के कवियों में सूफी संस्कृति का सर्वाधिक प्रभाव देखने को मिलता है।

सूफी मत के कई रूप है जिनमें कुछ रूढ़िवादी तो कुछ खुले विचारों वाले हैं। अयोध्या में ‘‘वुजुदी’’ सूफियों का अधिक प्रभाव है। स्पेन से शुरू हुए इस ‘‘वुजुदी’’ सूफी सम्प्रदाय की प्रसिद्धि व्यापक दृष्टिकोण और जातिवाद का विरोध करने के कारण हुई। इन सूफी स्थलों में ज्यादातर लोग मन्नत मांगने आते हैं। यहां हिन्दू, मुस्लिम, सिख सभी आते हैं और एक साथ इबादत करते हैं। अयोध्या के अधिकतर सूफी स्थलों के अवशेष सोलहवीं सदी में निर्मित बाबरी मस्जिद के पहले के हैं। आज अयोध्या के बहुत से सूफी ‘‘स्वनका’’ जीर्ण शीर्ण हालत में हैं।

अयोध्या की असली तस्वीर यही है आज मजहबी जुनून और सियासत की पहचान बना अयोध्या दरअसल प्रेम बांटने वाले गुरूओं, दार्शनिकों और सूफियों की भूमि रहा है। यहां का आवाम और यहां की संस्कृति सदियों से यहां आने वाले विभिन्न धर्मों के लोगों से निकली है, परन्तु आज इस तरह के किसी भी एकता प्रयास पर राजनीति का साया पड़ जाता है। अयोध्या को सिर्फ एक ही रंग देने की कोशिशें लगातार हो रही हैं, जबकि इन्द्रधनुष के बाकी रंग कहीं सिकुड़ से गए हैं। पर अयोध्या के आम आदमी के श्रद्धा की पहचान के लिए शेख शम्सुद्दीन फरियाद रास की दरगाह पर माथा टेकने आई दलित महिला राम रती के ये उद्गार ही काफी हैं -‘‘मुझे राम की तरह बाबा पर भी पूरा विश्वास है। हमारी सारी मन्नतें पूरी होती हैं। हम यहां दुआ करते हैं तो सब ठीक हो जाता है।’’ यही अयोध्या की तस्वीर का कन्ट्रास्ट है।

लेखक उत्कर्ष सिन्हा फितरत से यायावर हैं तो मिजाज से समाजकर्मी. वर्तमान में दैनिक लोकमत, लखनऊ के प्रमुख संवाददाता हैं. किसान आन्दोलन सहित लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए चल रहे जन आन्दोलनों में शिरकत करते रहते हैं. एमिटी यूनिवर्सिटी में अतिथि प्रोफ़ेसर के तौर पर छात्रों को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाते हैं.

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