: सबकी रखवाली करने वाले की रखवाली कर रहे हैं इंसान : अक्टूबर 1991 में जब मैं अपनी शादी से पहले अयोध्या गयी थी तो स्वाभाविक रूप से राम-जन्मभूमि भी गयी थी, जिसके बारे में आम मान्यता रही कि राम जन्म स्थान यहां था. अयोध्या में कई लोगों से पूछने के बाद एक पतली गली से होते हुए हम लोग वहां पहुंच पाए थे जहां हमारे परिवार वालों के अलावा एक-दो परिवार वाले रहे होंगे. देख कर ऐसा कतई नहीं लग रहा था कि यह जगह कभी कितने भयानक विवाद का विषय हो सकती है और जिस विषय को ले कर पूरे देश के मन-मष्तिस्क में विष-रोपण किया जा सकता है. इसी के लगभग एक साल बाद जब कार सेवा और फिर मंदिर वहीं बनायेंगे के नारों के साथ अडवाणी की रथ यात्रा ने अंत में बाबरी मस्जिद और साथ लगे मंदिर को एक साथ ध्वस्त कर दिया और पूरे देश में साम्प्रदायिक अशांति फैला दी, तो मेरा मन इस बात को मानने को तैयार नहीं हो रहा था कि इस मंदिर में पचास लोग भी नहीं थे, उस जगह को इस प्रकार से मुद्दा बना कर देश के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ कैसे कर दिया जा सकता है.
अब जा कर यह बात मेरी समझ में आ सकी है कि अयोध्या मामला हम मीडियावालों और कुछ नेताओं की बनायी हुई एक घृणित दास्तान के सिवाय और कुछ नहीं है. जिस तरह से आज तेईस तारीख को सुबह से ही मीडिया अयोध्या को सर पर लिए घूम रहा था, उससे समझ आ जाता हैं कि उन लोगों की अंदरूनी मंशा क्या है. साथ ही जिस प्रकार से पिछले कुछ दिनों से इस मामले को ले तूल दिया जा रहा है, उसकी जितनी निंदा की जाए वह कम है. बार-बार शान्ति भंग की आशंका और सुरक्षा को ले कर जिस तरह से शोर मचाया गया, उससे साफ़ जाहिर होता है कि जो इस मुद्दे को ले कर निष्पक्ष रहना चाहते हैं, वह भी इस बात को मानने लगे कि इस बात को ले कर अशांति फ़ैल सकती है.
“शेर आया शेर आया की तर्ज़ पर” कई बार कुछ ना होते हुए भी कोई बात इतनी बार दुहरा दी जाती है कि वह सच सा दिखने लगता है. अयोध्या के पूरे मामले में भी कुछ वैसा ही प्रतीत होता है. आखिर पहले भी तो मंदिर-मस्जिद को ले कर वहां विवाद बना रहा था, लेकिन जब तक इन नेताओं का काला साया इस पूरे प्रकरण पर नहीं पड़ा था, तब तक वहां और पूरे देश में इस मामले को ले कर लड़ाई-झगडे का कोई विषाक्त माहौल नहीं बना था. अपनी-अपनी आस्था के अनुसार लोग वहां आते-जाते भी थे. वैसे आते-जाते तो अब भी हैं, लेकिन इन लोगों की मेहरबानी से यह सब संगीनों के साए में हो गया है.
मैं तो अपने पति के इंटेलिजेंस विभाग में नौकरी के दौरान कई महीने अयोध्या में रही हूँ और हम लोग उसी इलाके में रहते थे, जहां को ले कर हाय-तौबा मचाई जा रही है. जितनी बार भी मैं वहां से गुजरती थी मुझे देख कर ये हैरानी होती थी कि एक तम्बू की रखवाली के लिए इलाके भर में ना जाने कितने सारे पुलिसिया तम्बू लगा दिए गए हैं. कई बार तो पुलिस वाले भी ये नहीं समझ पाते थे कि आखिर वे सुरक्षा कर किसकी रहे हैं. मैं उनसे जब इस विषय पर उनकी राय पूछती तो लगभग एक सा ही जवाब मिलता- “क्या करें हमारे नेता लोग जो ना कराएं वो कम है. भगवान को तो मंदिर से निकाल कर तम्बू में बैठा दिया और अब सब की रक्षा करने वाले इश्वर की रक्षा करने की जिम्मेदारी हम लोगों को दे दी गयी है.” वास्तव में ये हास्यास्पद स्थिति थी.
हमारे देश में जहां आम लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस बल की भारी कमी है. पांच लाख की आबादी पर जहां हज़ार पुलिस वाले भी नहीं मिल पाते वहां एक राम-जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद की सुरक्षा पर हज़ारों की संख्या में पुलिस, अर्ध-सैनिक बल के जवान और उनके बड़े-बड़े अधिकारी लगा देने का क्या तुक था, ये बात मेरी समझ में नहीं आ पाती थी. जहां ज़िंदा लोगों की सुरक्षा उसी भगवान के भरोसे छोड़ा गया हो, वहीं उसी भगवान की सुरक्षा इन्सानों की भारी-भरकम फौज से करने का ये खेल मुझे बिलकुल ही बेतुका दिखता था.
उस समय अयोध्या का विवाद लखनऊ हाई कोर्ट में चल ही रहा था और फैसला आने की कोई संभावना नहीं दिख पड़ती थी. इसीलिए कोई विशेष सरगर्मी भी नहीं थी. लेकिन तब मैं जो बातें नहीं समझ पाती थी, वह अब जब फैसला आने की घडी पास आ रही है, तो मेरी समझ में कुछ-कुछ आने लगी है. क्योंकि यदि अयोध्या का नेताओं के बाद कोई दूसरा गुनाहगार है तो वह मीडिया है, जिसके हम और आप सभी अंग हैं. अनावश्यक रूप से फैसले के आने की बात को इस तरह से प्रचारित करना और उसे देश के प्रमुख घटना-क्रम का हिस्सा बना देना, क्या हमारी इस भावना का परिचायक नहीं है कि हम सब लोगों के मन में मंदिर और मस्जिद के नाम पर ऐसा माहौल बना देना चाहते हैं, जिसमे इतनी सरगर्मी आ जाए जिससे थोड़ी सी चिंगारी पाते ही लोग भड़क उठे और फिर हम बैठ कर खबरें बनाते रहें.
कल जब मैं दो प्रतिष्ठित टीवी चैनल के साथी पत्रकारों से मिली तो दोनों ही इस पूरे प्रकरण के कवेरेज को ले कर हैरान-परेशान से थे. दिल्ली से आने वाले अपने चैनेल के बड़े पत्रकारों की कैसे और कहां व्यवस्था करनी है, समाचार के लाइव प्रसारण हेतु कहां कमरा लेना है, और उन सबसे बढ़ कर उन लोगों को पूरे प्रकरण की किस प्रकार से जानकारी देनी है, इसी बात को ले कर वे तनावग्रस्त से दिख रहे थे. बता रहे थे उस दिन सुबह से ही पूरे देश में लखनऊ और अयोध्या से ही खबरें उठेंगी और दिन भर ख़बरों का विश्लेषण चलता रहेगा. इस तरह के नेताओं की खोज भी शुरू हो गयी थी, जो इस प्रकरण पर अपना ज्ञान बघारेंगे. यानी कुल मिला कर पूरे देश को अयोध्या के इस विवादित रंग में ही रंगने का एक भयानक षड्यंत्र. यह सब तब तक चलता रहेगा, जब तक लोग उस मानसिक स्थिति में नहीं पहुंच जाएं जहां व्यक्ति अच्छे-बुरे का ज्ञान खो देता है.क्या यही हमारी पत्रकारिता का उद्देश्य है और क्या यही वे लक्ष्य हैं जिनके लिए पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा खम्भा जैसी सम्मानित उपाधि दी गयी है.
क्या हम सबों के लिए विकास के मुद्दे, भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दे, देश के आम आदमी की समस्याओं से जुड़े मुद्दे को भी इतनी ही शिद्दत से उठा पाने का हौसला है, समय है, इच्छा है? या फिर हम लोगों के लिए सिर्फ अयोध्या जैसे खिलौने ही हैं, जिन के साथ खेल कर हम अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ाते रहें ? अरे एक कोर्ट का फैसला ही तो है, आने दीजिये. वहां से सहमति नहीं बनी तो लोग सुप्रीम कोर्ट जायेंगे. आप तो बीच में पूरा दम-ख़म ले कर मत कूद जाईये.
लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित ‘पीपल्स फोरम’ की एडिटर हैं.

