इसी पोर्टल पर पढ़ी एक कविता, जिसमें कहा गया कि “हमने तो नमाज़ें अदा की है गंगा तेरे पानी से वजू कर के” वास्तव में इस देश की हकीकत है, राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत इस देश का एक भी मुसलमान अब सियासी शतरंज की बिसात का मोहरा नहीं बनना चाहता, लेकिन ऐसे राजनीतिक दलों का क्या करें जो आतंकवाद पर नकेल कसने की बजाय उस के रंग ढूँढने में लगे है. 11 महीने की एक बच्ची भी अब जान गई है कि आतंकवाद को सिर्फ खून का लाल रंग दिखाई देता है भगवा या हरा नहीं.
शायद ही दुनिया का कोई ऐसा मुल्क हो जिसमे दोष सिद्ध हत्यारे आतंकवादी को सुरक्षा घेरों के अन्दर रख कर मनपसंद पकवान खिलाये जाते हों, लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा होता है और संविधान में बाकायदा सीमित कार्यों के वर्णित होने के बावजूद हमारे राष्ट्रपति के पास एक घंटे का समय नहीं है कि वे दो हत्यारों की फांसी माफ़ी क़ी अपील ठुकरा सकें. जब हत्यारे आम आदमी क़ी हत्या करते समय कोई ऊंच-नीच नहीं देखते तो फिर हत्यारों के साथ आम आदमी जैसा बर्ताव क्यों, क्यों उनकी पत्रावलियां साधारण नागरिक क़ी पत्रावली क़ी भांति इतनी सुस्त रफ़्तार से चल रही है. इस पूरे घटनाक्रम से कोई बात समझ में आये या न आये, किन्तु इतना स्पष्ट है कि दुनिया के किसी भी मुल्क की तुलना में एक हिन्दुस्तानी क़ी जान सबसे सस्ती है, जिसे कोई भी जहां जी चाहे मारे-काटे या अरब सागर में फ़ेंक दे, किसी के ऊपर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं. इनकी तन्द्रा तभी भंग होगी जब फिर से किसी मुफ्ती मोहम्मद सईद क़ी बेटी अगवा हो और उसकी रिहाई के लिए बाकायदा तश्तरी में सजाकर इंसानियत के बहशी दुश्मनों को रिहा कर दिया जायेगा.
दलित वोटों क़ी खातिर कलावती के दरवाजे जाकर खरखरी खटिया पर रात बिताने वाले एक सांसद, जो कि एसप़ीजी सुरक्षा के बावजूद गाहे-बगाहे बिना पूर्व सूचना के उत्तर प्रदेश की पिकनिक पर निकल पड़ते हैं, उनको इतना भी गवारा नहीं था क़ि दिन के उजाले में बहशियों के चलते दुनिया से विदा हो चुकी स्वस्तिका के दरवाजे जाकर दो शब्द सांत्वना के ही बोल देते. वे ही क्यों स्वयं को माता सरस्वती का मानस पुत्र समझने वाले वाराणसी के सांसद महोदय तक ने मौके पर जाना मुनासिब नहीं समझा, तो फिर काहे के जनप्रतिनिधि और काहे की संसद? छीन जानी चाहिए ऐसे संवेदना शून्य व्यक्तिओं से जनप्रतिनिधि की पदवी और उसके नाम पर मिलने वाली अलौकिक सुख-सुविधाएं.
किस-किस के बारे में लिखें और कितनी बार लिखें, अपशब्द कहे भी तो किस के लिए, यहाँ तो आतंकवादियों पर थूको तो वापस हमारे आस-पास खड़े लोगों पर ही आकर गिरता है, लेकिन फिर भी आतंकवादियों से ये वादा है क़ि तुमको तुम्हारी औकात तक पहुंचाने में इस देश का हर नागरिक, जो सिरफिरा नहीं है वो हमेशा मानव श्रृंखला बना कर माँ भारती के आँचल की रक्षा करेगा और जहां तक कश्मीर का सवाल है तो सुन लो- ” मानचित्र पर लाख तुम खींचा करो लकीर -जिसका हिंदुस्तान है उसका है कश्मीर.” स्वस्तिका को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि और वादा क़ि हम जिस स्तर पर हैं उस स्तर से तुम्हारे कातिलों को दंड दिलवाने के लिए संघर्ष करेंगे.
लेखक क्रांति किशोर मिश्र टीवी पत्रकार हैं और साधना न्यूज से जुड़े हुए हैं.

