आज की अंग्रेजी पत्रकारिता में पी साईनाथ का बड़ा नाम है, वह भी एक ऐसे बीट पर काम करने के कारण जिसकी जड़ें गांव की वादियों में रची बसी समस्याएं हैं. एक अंग्रेजी पत्रकार का गांव-गांव भटककर खबर खोजने की इस कवायद ने कुछ तात्कालिक परिणाम भी पैदा किये हैं, लेकिन मीडिया में आये चंद सुर्ख़ियों से न तो गाँवों की तकदीर बदलनेवाली और न ही तस्वीर. पी साईनाथ को इस वजह से बड़ा नाम मिला है और कई अंग्रेजी पत्रकार उनकी ही तरह मशहूर ग्रामीण पत्रकार बनने का सपना संजोते हैं. यह सच्चाई का सिर्फ एक पहलू है. सच्चाई का दूसरा पहलू गाँव की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना है, जिसमें जब तक स्थाई परिवर्तन नहीं लाया जाता तब तक हजारों पी साईनाथ मिलकर भी गाँव में व्याप्त शोषण, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, ऊंच-नीच, पिछड़ापन को दूर नहीं कर सकते. साईनाथ की पत्रकारिता से शहर के लोगों को सिर्फ गाँव की रत्ती भर जानकारी मिलती है. उनकी पत्रकारिता में गाँव के लोगों के व्यापक सामाजिक स्थिति का चित्र नहीं मिलता, जिसके स्थाईत्व से गाँव की समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है.
उदाहरण के लिए हम बिहार के कैमूर जिले के सबसे बड़े गाँव अखलासपुर को लें. इस गाँव में ग्रामीण ही ग्रामीण को नकली खाद बीज बेचते हैं. ग्रामीण दलाल ही ग्रामीण बैंक के मैनेजर से मिलकर गरीब किसानों के क्रेडिट कार्ड बनवाने में कई रोड़े अटकाते हैं और अमीर किसान क्रेडिट कार्ड हासिल कर उस पैसे को या तो पचा जाते हैं या उसका कहीं और निवेश कर और पैसा बनाते हैं. इन गरीबों के हित की लड़ाई लड़ने के लिए एक गरीब नेता उठा भी तो वो विधायक बनने के बाद नेतागिरी में लगकर अमीरों के संग हो चला. यहाँ के पास के क्षेत्र से पहले जगजीवन राम और अब उनकी सुपुत्री मीरा कुमार सांसद के रूप में जीतती रही हैं और बिहार में सिचाई मंत्री रहे धाकड़ नेता जगदानंद सिंह भी यहीं आस-पास से विधायक के रूप में बिहार विधानसभा में जाते रहे हैं. लेकिन इस क्षेत्र की एक नहर परियोजना वर्षों से अधूरी पडी है और किसानों को सिंचाई के लिए सही से बिजली तक नहीं मिलती. यहाँ के सभी किसान इन समस्याओं से परिचित हैं, सभी दोषियों को जानते हैं, फिर भी झेल रहे हैं और समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई है. यहाँ शोध कर रहे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एक छात्र और उसी गांव के निवासी ने आवाज़ उठाई तो उसके खिलाफ ऐसी राजनीति हुई कि उसे अपना गांव ही छोड़ देना पड़ा.
इतनी कथा सुनाने का मकसद ये है कि पी साईनाथ जैसे पत्रकारों और उनके अनुगामी भक्त पत्रकारों से मेरा अनुरोध है कि वे ग्रामीण पत्रकारिता करते हैं तो सिर्फ ऊपर ऊपर दिखने वाली समस्या न लिखें, बल्कि वहाँ ज्यादा दिन तक रहके उस ग्रामीण समाज व्यवस्था को पिछड़ा बनाये रखने वाली शक्तियों की गहरी खोज करें. और अगर हो सके तो उनको बदल कर दिखाने का ज़ज्बा दिखाएँ. सिर्फ बुर्जुआ और सर्वहारा की चश्में से भारत के ग्रामीण समाज को विश्लेषित नहीं किया जा सकता और न ही चंद शब्दों के भावुक रिपोर्ट से गाँव की विषमता कि बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. हाँ, लोकप्रियता जरूर पायी जा सकती है और ऐसी पत्रकारिता को अर्बन हिपोक्रेसी का नाम ही दिया जा सकता है.
लेखक राजीव सिंह युवा पत्रकार हैं. फिलहाल पत्रकारिता के अंदर-बाहर की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

