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अल्पज्ञान का मंडराता खतरा!

एसएनएक पुरानी मान्यता है कि अज्ञानी से कहीं अधिक खतरनाक अल्पज्ञानी होते हैं। क्योंकि होते तो हैं वे अल्पज्ञानी, किन्तु स्वांग भरते हैं पूर्ण ज्ञानी होने का। फिर क्या आश्चर्य कि प्रधानमंत्री सहित कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा भारत के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत राहुल गांधी आज चौतरफा प्रहार झेल रहे हैं। अगर राहुल को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया होता तो संभवत: इतना बवाल नहीं मचता। चाटुकारिता के कंधों पर रखी वंशवाद की सीढ़ी चढ़ देश के नेता बने राहुल गांधी अपनी रणनीति की विफलता के बावजूद गलतियों को दोहराते रहने का परिणाम भुगत रहे हैं। एक अल्पज्ञानी ही ऐसी दुर्घटना का शिकार हो सकता है। सलाह चाहे दिग्विजय सिंह ने दी हो या किसी अन्य ने, अल्पसंख्यक कार्ड का ‘राहुल प्रयोग’ अबतक विफल ही नहीं, प्रति-उत्पादक भी सिद्ध होता रहा है। सन् 2007 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान करोड़ों खर्च कर राहुल के लिए ‘रोड शो’ अर्थात् ‘सड़क तमाशे’ आयोजित किये गए थे। तमाशे के लिए जगह-जगह भीड़ भी जुटाए गए थे। क्या यह बताने की जरूरत है कि ऐसी भीड़ में अज्ञानियों व अल्पज्ञानियों की ही बहुतायत होती है!

एसएनएक पुरानी मान्यता है कि अज्ञानी से कहीं अधिक खतरनाक अल्पज्ञानी होते हैं। क्योंकि होते तो हैं वे अल्पज्ञानी, किन्तु स्वांग भरते हैं पूर्ण ज्ञानी होने का। फिर क्या आश्चर्य कि प्रधानमंत्री सहित कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा भारत के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत राहुल गांधी आज चौतरफा प्रहार झेल रहे हैं। अगर राहुल को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया होता तो संभवत: इतना बवाल नहीं मचता। चाटुकारिता के कंधों पर रखी वंशवाद की सीढ़ी चढ़ देश के नेता बने राहुल गांधी अपनी रणनीति की विफलता के बावजूद गलतियों को दोहराते रहने का परिणाम भुगत रहे हैं। एक अल्पज्ञानी ही ऐसी दुर्घटना का शिकार हो सकता है। सलाह चाहे दिग्विजय सिंह ने दी हो या किसी अन्य ने, अल्पसंख्यक कार्ड का ‘राहुल प्रयोग’ अबतक विफल ही नहीं, प्रति-उत्पादक भी सिद्ध होता रहा है। सन् 2007 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान करोड़ों खर्च कर राहुल के लिए ‘रोड शो’ अर्थात् ‘सड़क तमाशे’ आयोजित किये गए थे। तमाशे के लिए जगह-जगह भीड़ भी जुटाए गए थे। क्या यह बताने की जरूरत है कि ऐसी भीड़ में अज्ञानियों व अल्पज्ञानियों की ही बहुतायत होती है!

ऐसी ही भीड़ों को तब संबोधित करते हुए राहुल गांधीने अपने ‘ज्ञान’ का बखान करते हुए कह डाला था कि अगर 1992 में नेहरू परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जि़द का विध्वंस नहीं होता। उन्हीं सड़क तमाशों के बीच एक बार राहुल यह भी कह गए थे कि बांग्लादेश उदय का श्रेय उनकी दादी इंदिरा गांधी को जाता है। इस मुकाम पर उनके ‘ज्ञान’ पर स्वयं कांग्रेसी हतप्रभ रह गए थे। पहले मामले में जहां राहुल अल्पसंख्यक समुदाय की सहानुभूति बटोरना चाहते थे वहीं दूसरे मामले में अल्पसंख्यक समुदाय को आहत कर डाला। राहुल को ज्ञान देने वाले इस कठोर सत्य को बताना भूल गए थे कि अल्पसंख्यक समुदाय पूर्वी पाकिस्तान की जगह बांग्लादेश के निर्माण को आजतक पचा नहीं पाया है। नतीजतन, राहुल के तमाम तामझाम और कांग्रेस के दावों के बावजूद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में हवा बनाने के लिए राहुल के सलाहकारों ने फिर अल्पसंख्यंक कार्ड खेला।

प्रदेश अध्यक्ष के पद पर अल्पसंख्यक व्यक्ति की नियुक्ति की गई। राहुल गांधी, सोनिया गांधी व स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिहार के तूफानी दौरे किये। अपने हर संबोधन में राहुल ने अल्पसंख्यक मतदाता को रिझाने की कोशिश की। एक बार तो यहां तक पूछ डाला कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए नीतीश सरकार ने अबतक जमीन आवंटन क्यों नहीं किया। संघ परिवार व भाजपा को निशाने पर लेते हुए राहुल चुनाव प्रचार के दौरान यह दोहराते रहे कि इन कट्टरपंथियों के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस को मतदाता समर्थन दें। आरएसएस को प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन सिमी के समकक्ष रख अपने ज्ञान का जलवा दिखाने वाले राहुल गांधी का सारा ध्यान केंद्रित था तो कथित हिंदू कट्टरवाद के मुकाबले अल्पसंख्यक वोट पर। जदयू-भाजपा सरकार को भ्रष्ट, निकृष्ट, अकर्मण्य निरूपित कर कांग्रेस की सफलता की भविष्यवाणी करने वाले राहुल गांधी को तब मुंह छुपाना पड़ा, जब बिहार के मतदाता ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। राहुल का अल्पसंख्यक कार्ड एक बार फिर बेजान साबित हुआ।

कथित कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को आतंकवाद का पर्याय बन चुके लश्कर-ए-तैयबा से अधिक खतरनाक बताने वाले राहुल गांधी की ‘नीयत’ अब कटघरे में है। आज रविवार को राहुल ने इस पर सफाई देने का संकेत दिया है। जाहिर है उनके सलाहकार लीपापोती का प्रयास करेंगे। आतंकवाद की व्यापकता को रेखांकित कर राहुल अपने उगले हुए शब्दों पर परदा डालने की कोशिश करेंगे। लेकिन भारत का परिपक्व लोकतंत्र, परिपक्व आबादी उनके झांसे में आएंगे, यह संदिग्ध है। राहुल के ‘ज्ञान’ से यह देश अब निर्देशित होने वाला नहीं। बिहार का चुनाव परिणाम पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य के सूचक के रूप में सामने आया है। जाति, धर्म और संप्रदाय के मुकाबले उसने विकास के पक्ष में फैसला सुनाया है। बेहतर हो राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी बिहार के सबक को स्वीकार कर लें। इस देश की परिपक्व युवा पीढ़ी इन सब व्याधियों से दूर रहना चाहती है। अपने प्रस्तावित संबोधन में राहुल सावधानी बरतें। शब्दों का मायाजाल अब नहीं चलेगा। वास्तविकता को पहचान विकास और सुशासन के पक्ष में ध्यान केंद्रित करें राहुल। वोट की राजनीति के लिए अल्पसंख्यक कार्ड खेलना तो बंद कर ही दें। देश की बहुसंख्यक आबादी इस खेल से उब चुकी है। देश के आंतरिक मामलों की चर्चा वे देश में देश के साथ करें। अमेरिका या किसी अन्य के साथ नहीं। अन्यथा, देश अपने उपर मंडराते अल्पज्ञान के खतरे से निजात पाने का अपना तरीका ढूंढ लेगा।

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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