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राजनीति-सरकार

अश्‍लील बयान देना ही अब राजनीति है

भोपाल :  राजनीति में बयानों का स्तर गिरता जा रहा हैं। राजनीतिज्ञों की भाषा भारत के सबसे गरीब तबके के व्यक्ति के समकक्ष भी नहीं ठहर रही हैं। इन बयानों की शुरुआत करने का श्रेय पुनः देश को आजादी और संस्कार देने का दावा करने वाली कांग्रेस को ही जाता हैं। कांग्रेस के विद्वान मंत्रियों और पदाधिकारियों ने उस शब्दकोश को खोल दिया हैं, जिसमें अश्‍लीलता और वैचारिक दिवालियापन का स्पष्ट दर्शन होता हैं, फिर भाजपा क्यों पीछे रहती। उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर कई बड़े नेताओं ने भी उसी स्तर पर जाकर कांग्रेस का प्रतिकार करना उचित समझा, जहां कभी राष्ट्रीय कहलाया जाने वाला दल खड़ा हुआ था। दिग्विजय सिंह अपने बयानों में अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, मुरारी बापू,  श्री श्री रविशंकर को न सिर्फ संदेह के घेरे में खड़ा करते हैं, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें ठग साम्प्रदायिकता बढ़ाने वाला और राष्ट्र विरोधी तत्व कहने में भी संकोच नहीं करते।

भोपाल :  राजनीति में बयानों का स्तर गिरता जा रहा हैं। राजनीतिज्ञों की भाषा भारत के सबसे गरीब तबके के व्यक्ति के समकक्ष भी नहीं ठहर रही हैं। इन बयानों की शुरुआत करने का श्रेय पुनः देश को आजादी और संस्कार देने का दावा करने वाली कांग्रेस को ही जाता हैं। कांग्रेस के विद्वान मंत्रियों और पदाधिकारियों ने उस शब्दकोश को खोल दिया हैं, जिसमें अश्‍लीलता और वैचारिक दिवालियापन का स्पष्ट दर्शन होता हैं, फिर भाजपा क्यों पीछे रहती। उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर कई बड़े नेताओं ने भी उसी स्तर पर जाकर कांग्रेस का प्रतिकार करना उचित समझा, जहां कभी राष्ट्रीय कहलाया जाने वाला दल खड़ा हुआ था। दिग्विजय सिंह अपने बयानों में अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, मुरारी बापू,  श्री श्री रविशंकर को न सिर्फ संदेह के घेरे में खड़ा करते हैं, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें ठग साम्प्रदायिकता बढ़ाने वाला और राष्ट्र विरोधी तत्व कहने में भी संकोच नहीं करते।

दिग्विजय मुस्कुराते हुए कांग्रेस के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने की अपनी प्रक्रिया को जारी रखते हैं, जिसे कांग्रेस हाईकमान के करीब बैठे हुए चाटुकार हाईकमान के सामने विरोधियों का करारा जबाव बताते हैं। हाईकमान हिन्दी जानता नहीं, राष्ट्र की समस्याओं से उसका कोई सरोकार नहीं। उसका एक मात्र लक्ष्य प्रधानमंत्री नामक मुख्य कार्यपालन अधिकारी से अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति कराना मात्र हैं। इसके अतिरिक्त यदि हाईकमान को कुछ समझने आता हैं, तो केवल अपने बेटे की ताजपोशी। दिग्विजय सिंह के बाद कपिल सिब्बल सहित कांग्रेस के कई दिग्गज कहे जाने वाले अविवेकशील नेताओं ने बाजारी भाषा में विपक्ष और जन आंदोलनों के विरूद्ध मोर्चा संभाल लिया। बयानों का एक घटिया सिलसिला प्रांरभ हो गया, जो आम भारतीय की भावनाओं को लगातार आहत करता चला गया। इसके बाद बारी आई संघ और भाजपा की। संघ के पूर्व पदाधिकारी के सुदर्शन ने सोनिया गांधी की उत्पत्ति से संबंधित कई सवालों को खड़ा किया। यह संभवतः भारत के इतिहास में पहली बार हुआ कि राष्ट्रीय परिदृश्‍य में किस महिला का संघ द्वारा इस स्तर पर जाकर अपमान किया जाये। संघ भारतीय परम्पराओं का स्वयं को प्रतीक बताता हैं। नारी को सर्वोच्च स्थान देने वाली भारतीय परम्परा ने संघ के पूर्व पदाधिकारी का यह बयान कुछ अविश्‍वसनीय लगा परंतु कांग्रेसियों के अनर्गल और अवांछनीय आरोपों से तिलमिलाया संघ सोनिया गांधी से ही शुरुआत करके कांग्रेस को उसकी औकात दिखाना चाहता था।

संघ के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी की बारी थी, गड़करी ने भी अपने बयानों के स्तर को पैमाने के निम्नतम स्तर पर पहुंचा दिया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बैठे हुए व्यक्ति के पास शब्दों का इतना जबर्दस्त अकाल था कि कांग्रेस की अश्‍लील शब्दावली की काठ के लिए उन्हें बयानों के निम्नतम स्तर का सहारा लेना पड़ा। आज राजनीति में कोई भी बड़ा बनने के लिए तैयार नहीं हैं। किसी जमाने में मायावती और शिवसेना के बयानों को अनर्गल शब्दों में सीमित बताने वाले राजनैतिक दल आज स्वयं विचारों के अभाव में उसी जगह पर आ खड़े हुए हैं, जहां से सड़क की भाषा में गाली गलौच की शुरुआत होती हैं। भारतीय राजनीति की दुर्दशा पर रोने वाला अब कोई नहीं बचा। कांग्रेस संभवतः यह भूल चुकी हैं कि विपक्ष के पास ऐसे कई हथियार हैं, जो उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर केन्द्रीय पदाधिकारियों तक निम्नतम स्तर का कीचड़ उछाल सकते हैं। गड़करी के बयानों के बाद अचानक दिग्विजय सिंह के बयानों में परिवर्तन आया दिखता हैं। ”जैसे को तैसा”  जबाव मिलने की इसे एक प्रक्रिया माना जा सकता हैं। भारतीय राजनीति में अमर सिंह के बयानों को सबसे घटिया और निम्न स्तर का माना जाता था। उनके सामने मायावती, ममता और शिवसेना पानी भरती नजर आती थी। राजनीति में अमर सिंह की कमी को कांग्रेस के नेता पूरा करने में लगे हुए थे, परंतु भाजपा के निम्न स्तरीय होने के बाद अचानक कांग्रेस के बयानों में स्तर कायम करने की कोशिश की जाने लगी हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह कमजोर पड़ चुकी कांग्रेस इन दिनों एक छत की तलाश कर रही हैं, जहां से वह राजनीति में पुनः मोलभाव कर सके। वैचारिक राजनीति की समाप्ति के बाद दलाल संस्कृति की पर्याय बनी नई राजनीति में मोलभाव के साथ बयानों के स्तर का गिरना एक अशुभ संकेत हैं। वर्तमान नेताओं को यह ज्ञात होना चाहिए कि नई पीढ़ी उनसे अच्छी और अभद्र गालिया देने में माहिर हैं। परंतु भारतीय समाज अश्‍लील शब्दावली के दुर्गुणों को भलीभांति पहचानता हैं और सार्वजनिक मंच से उन्हें स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं हैं, भले ही उसके लिए उसे अपने नेताओं की एक समूची पीढ़ी का बलिदान क्यों न करना पड़े।

लेखक सुधीर पाण्‍डे पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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