: हिन्दी दिवस पर विशेष : हमारे आईएएस एवं आईपीएस संवर्ग के अधिकारियों के दिमाग में अंग्रेजी जिस बुरी तरह घुसी हुई है, उसका अनुभव प्रायः होता रहता है। यहां तक कि पीसीएस अधिकारी भी प्रायः इससे अछूते नहीं मिलते। हाल में मैं एक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी मित्र के यहां मिलने गया तो देखा कि उनके आवास के बाहर नामपट अंग्रेजी में लगा हुआ था। चूंकि वह मेरे घनिष्ठ मित्र हैं और उन्हें मैं हिन्दी-प्रेमी समझता रहा हूं, इसलिए मैंने उन्हें सुझाव दिया कि वह अपना नामपट राष्ट्रभाषा हिन्दी में करा लें। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, जब उन्होंने बलपूर्वक कहा कि वह अपना नामपट अंग्रेजी में ही रखेंगे।
आईपीएस अधिकारियों के यहां तो अंग्रेजी का और भी बोलबाला रहता है। राजधानी लखनऊ में ही पुलिस विभाग के जो बड़े-बड़े कार्यालय हैं, उनके मुखियाओं के कक्ष में उनके पूर्ववर्ती अधिकारियों के नामपट अंग्रेजी में लगे हुए हैं। जब महेश चन्द्र द्विवेदी प्रदेश के पुलिस महानिदेशक हुए थे तो मैंने उनसे अनेक बार लिखित व मौखिक रूप में अनुरोध किया कि वे प्रदेश भर में यह निर्देश जारी कर दें कि सभी पुलिस अधिकारियों के कमरे में लगे नामपट व उनकी गाड़ियों पर लगी हुई पदसूचक तख्तियां हिन्दी में कर दी जाएं। चूंकि महेश चन्द्र द्विवेदी व उनकी पत्नी हिन्दी के अच्छे रचनाकार हैं, इसलिए मुझे विश्वास था कि मैं उनके कार्यकाल में हिन्दी को पुलिस विभाग में भली-भांति प्रतिष्ठित करा दूंगा। किन्तु महेशचन्द्र द्विवेदी ने मेरा यह आग्रह पूरा नहीं किया।
एक बार पुलिस विभाग में एक संगोष्ठी का आयोजन था, जिसका संचालन घोर अंग्रेजी प्रेमी आईपीएस अधिकारी अरुण कुमार गुप्त कर रहे थे। संगोष्ठी में सारे हिन्दीवाले अधिकारी मौजूद थे, किन्तु सभी वक्ताओं के व्याख्यान अंग्रेजी में हो रहे थे तथा संचालन भी अंग्रेजी में हो रहा था। उस संगोष्ठी में महेश चन्द्र द्विवेदी ने भी अंग्रेजी में व्याख्यान दिया। किन्तु मुझे उस समय बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ, जब वहां मौजूद वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी गणेश्वर झा ने उस घोर अंग्रेजीवाले माहौल में भी अपना व्याख्यान हिन्दी में दिया। मैंने उनके उस साहस पर वहां बधाई दी तथा बाद में प्रशंसापत्र भी भेजा। मैंने प्रदेश भर में तमाम उच्चाधिकारियों के कार्यालयों में अनुरोध कर-करके हिन्दी को प्रतिष्ठित कराया तथा उनके कार्यालयों व आवासों में लगे नामपटों को हिन्दी में परिवर्तित कराया।
लखनऊ में मंडलायुक्त के कार्यालय-कक्ष में लगे हुए बोर्ड पर पूर्ववर्ती मंडलायुक्तों के नामों की सूची अंग्रेजी में लिखी हुई थी। मैं पिछले लगभग तीन दशक से सभी मन्डलायुक्तों से अनुरोध करता आया था कि वे उक्त नामपट हिन्दी में करा लें। किन्तु सभी मन्डलायुक्तों ने मेरे सुझाव की प्रशंसा तो की, पर नामपट हिन्दी में नहीं कराया। जब धर्मचन्द्र लाखा लखनऊ में मंडलायुक्त हुए तो उनसे भी मैंने अनुरोध किया। किन्तु मुझे आशा नहीं थी कि वह मेरा अनुरोध पूरा करेंगे। उनके बाद आए नए मंडलायुक्त राकेश कुमार मित्तल से जब मैं मिलने गया तो मुझे आश्चर्य हुआ कि उक्त बोर्डे हिन्दी में कर दिया गया है। पहले तो मैंने समझा कि कदाचित राकेश कुमार मित्तल ने आते ही यह कदम उठाया है, क्योंकि वह साधु प्रकृति के, योग्य एवं हिन्दीप्रेमी आईएएस अधिकारी माने जाते रहे हैं। किन्तु उनसे विदित हुआ कि नामपट का यह हिन्दीकरण उनके पूर्ववर्ती मंडलायुक्त धर्मचन्द्र लाखा कर गए हैं। मैंने तुरन्त धर्मचन्द्र लाखा को धन्यवाद का पत्र लिखा।
बहुत वर्ष पहले की बात है। इलाहाबाद में प्रदेश की तत्कालीन मन्त्री श्रीमती राजेन्द्रकुमारी वाजपेयी के यहां शादी थी, जिसमें प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी भी आई थीं। इन्दिरा गांधी के आगमन से पूर्व वहां मौजूद अनेक आईएएस अफसर परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। चूंकि सभी मेरे मित्र थे, इसलिए मैं भी उनके साथ खड़ा बाते कर रहा था। उन आईएएस अधिकारियों में इलाहाबाद नगर महापालिका के तत्कालीन प्रशासक वीरेन्द्र सिंह कटारा भी थे। बात राष्ट्रभाषा हिन्दी की चलने लगी। मैं वीरेन्द्र सिंह कटारा की एक टिप्पणी सुनकर सकते में आ गया, जिसे अब तक नहीं भूल सका हूं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण हिन्दी है। मैं उनकी बात का कड़ा उत्तर देने वाला था कि तभी इन्दिरा गांधी के आगमन की हलचल मच गई थी। किन्तु बाद में एक दिन जब वीरेन्द्र सिंह कटारा मेरे आवास पर मिलने आए तो मैंने उनके हर कथन का जोरदार उत्तर दिया था।
ऐसी बात नहीं कि आईएएस व आईपीएस संवर्ग में सभी अधिकारी अंग्रेजी की गुलामी से ग्रस्त हैं। इन दोनों संवर्गों में अनेक अधिकारी हिन्दी-प्रेमी तो हुए ही हैं, हिन्दी के अच्छे रचनाकार भी हुए। प्रसिद्ध वरिष्ठ आईसीएस अधिकारी एवं प्रकांड विद्वान डॉ. जनार्दन दत्त शुक्ल उस जमाने में भी सदैव हिन्दी में भाषण करते थे। अभी भी काफी संख्या में ऐसे अधिकारी हैं। लगभग साढ़े चार दशक पूर्व आईपीएस अधिकारी रमेश चन्द्र दीक्षित इलाहाबाद में सहायक पुलिस अधीक्षक थे। मैं उस समय इलाहाबाद के दैनिक ‘भारत’ में मुख्य संवाददाता एवं स्थानीय समाचार सम्पादक था। रमेश चन्द्र दीक्षित जिले के थानों का निरीक्षण करने जब जाते थे तो प्रायः मुझे भी साथ ले लेते थे। अंग्रेजी के उस जमाने में श्री दीक्षित अपनी निरीक्षण-रिपोर्ट हिन्दी में लिखा करते थे।
उसी दौर की एक अन्य घटना है। इलाहाबाद में बहादुरगंज नाका में एक बड़ा जबरदस्त प्रभारी दरोगा था, जिसका नाम उमाशंकर सिंह यादव था। वह बड़े-बड़े बदमाशों को दौड़ते हुए दबोच लिया करता था। उसके नाम से बदमाश कांपते थे। इलाहाबाद जनपद उस समय कानपुर परिक्षेत्र के अन्तर्गत था। कानपुर परिक्षेत्र के तत्कालीन पुलिस उपमहानिरीक्षक नरेश कुमार वर्मा मेरे मित्र थे। मैं कानपुर में जब उनसे मिला तो मैंने उमाशंकर सिंह यादव की बहादुरी की चर्चा करते हुए उसे किसी थाने का प्रभारी उपनिरीक्षक बना देने के लिए कहा। उन्होंने तुरन्त उसकी फाइल निकलवाई, किन्तु फाइल पढ़कर माथा पकड़ लिया और बोले कि ऐसा नहीं हो सकता। मैंने कारण पूछा तो उन्होंने बताया उमाशंकर सिंह यादव सिपाही से पदोन्नति पाकर दरोगा बना है, इसलिए उसे अंग्रेजी नहीं आती। उस दौर में अंग्रेजी न जानने वाला थाने का प्रभारी नहीं हो सकता था।
हमारे अधिकारी अंग्रेजी-मोह से इतना अधिक ग्रस्त हैं कि वे जब भी कोई नामकरण करते हैं तो सरल हिन्दी के बजाय कठिन अंग्रेजी उन्हें अधिक रास आती है। एक बार महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाओं से निपटने के लिए बनाए गए पुलिस-दस्ते का नाम अंग्रेजी में ‘हेल्पलाइन फॉर विमेन’ रखा गया। मैंने उसका विरोध करते हुए सुझाव दिया कि उक्त नामकरण सरल हिन्दी में ‘महिला मदद दस्ता’, या ‘सहेली दस्ता’ या ‘सहेली पुलिस दस्ता’ या ‘महिला सहायक दस्ता’ रखा जाना चाहिए। पुलिस विभाग में जब भी कोई नामकरण किया जाता है तो वह अंग्रेजी में ही किया जाता है। लखनऊ में प्रशासन द्वारा आसान शब्द ‘गोमती पार’ के बजाय कठिन अंग्रेजी शब्द ‘ट्रांस गोमती’ इस्तेमाल किया जा रहा है। नगर निगम में पशुओं को पकड़ने का जो दस्ता है, उसका नाम हिन्दी में ‘पशु दस्ता’ या ‘आवारा पशु दस्ता’ रखने के बजाय अंग्रेजी में ‘कैटिल कैचिंग स्क्वैड’ रखा गया है। नगर निगम में ही कूड़े का निस्तारण करने के लिए जो विभाग है, उसका नाम अंग्रेजी में ‘रबिश रिमूवल डिपार्टमेन्ट’ रखा गया है, जबकि आसान हिन्दी में उसका नाम ‘कूड़ा विभाग’ रखा जा सकता है। अंग्रेजी के इन शब्दों का मैं अनेक बार विरोध कर चुका हूं। आजकल हिन्दी के सरल शब्दों के बजाय अंग्रेजी के कठिन शब्दों का प्रयोग करने की भयंकर बीमारी फैली हुई है, जिसके शिकार अब हमारे हिन्दी के समाचार-पत्र भी हो गए हैं।
राजधानी ही नहीं, पूरे प्रदेश में अधिकांश पुलिस अधिकारियों के कार्यालयों में उनके पूर्व-अधिकारियों की सूची अंग्रेजी में लगी हुई है। मेरे बार-बार अनुरोध के बावजूद उसका हिन्दीकरण अब तक नहीं किया गया है। प्रदेश के पूर्व महानिदेशक विक्रम सिंह प्रबल हिन्दी-प्रेमी हैं तथा बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं। उनसे भी मैंने अनुरोध किया कि वह पूरे पुलिस विभाग को हिन्दीमय कर दें, किन्तु उन्होंने भी ऐसा नहीं किया।
आईएएस व आईपीएस अधिकारियों की हिन्दी के प्रति विमुखता का प्रमुख कारण यह है कि हमारा शासक वर्ग स्वयं हिन्दी के प्रति समर्पित नहीं है। यदि शासक वर्ग कड़ाई से चाह ले तो यही आईएएस व आईपीएस संवर्ग हिन्दी का सबसे बड़ा हितैषी एवं उन्नायक बन जाएगा। काफी पहले बसन्त कुमार गोस्वामी कई वर्ष आस्ट्रेलिया में रहकर जब लौटे थे तो इलाहाबाद के जिलाधिकारी बनाए गए थे। उस समय इलाहाबाद प्रदेश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण जिला माना जाता था। बसन्त कुमार गोस्वामी को हिन्दी में काम करते देखकर जब मैंने उनसे पूछा कि इतने वर्ष आस्ट्रेलिया में रहने पर उनकी हिन्दी में काम करने की आदत छूट गई होगी तो उन्होंने यह चिरस्मणीय उत्तर दिया था- ‘‘हम आईएएस वालों की कोई आदत-वादत नहीं होती। कल आदेश मिल जाय कि सारा कामकाज संस्कृत में होगा तो हम बड़ी आसानी से संस्कृत में काम करने लगेंगे।’’
लेखक श्याम कुमार वरिष्ठ पत्रकार और समाचारवार्ता के संपादक है. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

