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आजादी जिंदाबाद

हम आजाद हैं। पूरी तरह आजाद। कुछ भी करने के लिए आजाद। कुछ भी कहने के लिए आजाद। काम करने के लिए और काम न करने के लिए भी। भद्र भाषा के इस्तेमाल के लिए और अभद्रभाषा के प्रयोग के लिए भी। रिश्वत खिलाने के लिए और रिश्वत खाने के लिए भी। हमने जब से आजादी पायी है, उसके भरपूर दोहन में लगे हैं। जो कुछ भी किया आजादी से। भ्रष्टाचार हो या अनाचार या दुराचार, हम हर मामले में आजाद हैं। हमारी जितनी समस्याएं हैं, हमें पता है, वे सभी हमारी आजादी का सुफल है। कई बार हम इसीलिए अंग्रेजों को याद करते हैं और कहते हैं कि इससे तो अच्छे वो दिन थे। एक रुपये में एक किलो घी मिलता था। पांच रुपये में घर-गृहस्थी का महीने भर का सामान आ जाता था। जिन्हें महीने के दो सौ रुपये की तनख्वाह मिलती थी, वे ठाट से जिंदगी गुजारते थे।

हम आजाद हैं। पूरी तरह आजाद। कुछ भी करने के लिए आजाद। कुछ भी कहने के लिए आजाद। काम करने के लिए और काम न करने के लिए भी। भद्र भाषा के इस्तेमाल के लिए और अभद्रभाषा के प्रयोग के लिए भी। रिश्वत खिलाने के लिए और रिश्वत खाने के लिए भी। हमने जब से आजादी पायी है, उसके भरपूर दोहन में लगे हैं। जो कुछ भी किया आजादी से। भ्रष्टाचार हो या अनाचार या दुराचार, हम हर मामले में आजाद हैं। हमारी जितनी समस्याएं हैं, हमें पता है, वे सभी हमारी आजादी का सुफल है। कई बार हम इसीलिए अंग्रेजों को याद करते हैं और कहते हैं कि इससे तो अच्छे वो दिन थे। एक रुपये में एक किलो घी मिलता था। पांच रुपये में घर-गृहस्थी का महीने भर का सामान आ जाता था। जिन्हें महीने के दो सौ रुपये की तनख्वाह मिलती थी, वे ठाट से जिंदगी गुजारते थे।

दरअसल हम आजाद होकर भी गुलाम रह गये। हम आजाद होने लायक थे ही नहीं। पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे, अब अंग्रेजी के गुलाम हैं। पहले हम दूसरों के गुलाम थे, अब अपनों के गुलाम है। गुलामी को हमने जन्मसिद्ध अधिकार मान रखा है। आजकल भ्रष्टाचार की बहुत चर्चा है। कुछ लोग उसे मिटा देने पर आमादा हैं। सबको आजादी है। भ्रष्टाचार की आजादी का हमने खूब उपयोग किया। जनता की सुविधाओं के लिए दिये गये पैसे अपनी जेबों में भर लिये। पुल बनाना था, अपना मकान बना लिया, पुल ढह जाय तो ढह जाय। सड़कें बनानी थीं, उसके पैसे से अपने लिए फार्म हाउस खरीद लिये, अब सड़क उखड़ती है तो उखड़ती रहे। अस्पताल बनवाना था, गरीब मरीजों के लिए दवाएं उपलब्ध करवानी थी, तो उस पैसे से अपने निजी कालेजों की बिल्डिंगें बनवा लीं, कोई इलाज के बगैर मरे तो मरता रहे।

भ्रष्टाचार की आजादी से देश का कितना विकास हुआ, कोई बताने वाली बात नहीं है। जो सरकारी विभागों में इंजीनियर बन गये, उनका तो कायाकल्प ही हो गया। आलीशान घर, मोटर गाड़ियां, सुख-सुविधा के हर साधन। कुछ ही सालों में सूरत बदल गयी। कई लोगों के तो रंग भी बदल गये। पहले काले थे, अब गोरे हो गये। पिताजी ने साबुन नहीं देखा था, पर पुत्तर ब्यूटी-पार्लर जाने लगे, फेसियल कराने लगे। जो अटके-भटके शिक्षा या बिजली विभाग में बाबू बन गये, उनके चलने का ढंग ही बदल गया। प्यादे से फर्जी भयो टेढो-टेढो जाय। और जिनके घरों में कोई अफसर या मंत्री बन गया, उसके तो समझो दिन ही बहुर गये। लक्ष्मी बरस पड़ीं। किसी ने पहाड़ खोद कर बेच दिया, तो किसी ने जंगल ही ठेके पर दे दिया। कागजों पर विकास होते रहे, सड़कें चमकती रहीं, स्कूल बनते रहे, हैंडपंप लगते रहे, गरीबों को राशन मिलता रहा और सारा रुपया मंत्री और अफसर के बेनामी खातों में जमा होता रहा। जो पहुंचा पाये, वे अपना माल स्विटजरलैंड भी पहुंचाते रहे। किसी को खेल कराने का काम मिला तो वह बड़ा खिलाड़ी साबित हुआ, किसी को फोन बांटने का काम मिला तो उसने सारा सरकारी पैसा अपने और अपने दोस्तों के काम में लगा दिया।

हम अदने भ्रष्ट नहीं हैं। छोटे-मोटे कामों में बेईमानी नहीं करते, बड़ा हाथ मारते हैं। पचास, सौ, हजार रुपये तो सिपाहियों के नाम छोड़ दिया हैं। जो जितने बड़े ओहदे पर है, उसकी कीमत भी उतनी ही बड़ी है। बहती गंगा में जो चाहे, हाथ धो ले। कौन रोकता है। बड़ा काम है तो खतरे भी उठाने होंगे। कभी कोई रंगे हाथ धर लिया तो क्या जाता है। रुपये तो ठिकाने लग चुके हैं, ज्यादा से ज्यादा कुछ महीने की सजा हो जायेगी। जब भ्रष्टाचार से प्यार किया तो डरना क्या। जैसे हमें भ्रष्टाचार की आजादी है, वैसे ही कोई मुंगेरीलाल चाहे तो इसे मिटाने की आजादी का भी इस्तेमाल कर सकता है। अब किसी को दिवास्वप्न देखने से कैसे रोका जा सकता है। इस देश में गरीबी, भुखमरी  मिटाने वाले आये, चले गये, गरीबी अपनी जगह कायम है। इस देश में मंहगाई के खिलाफ सरकारें, वादे पर वादे करती रहीं, सरकारें आती-जाती रहीं पर आटे-दाल का भाव बढ़ता रहा। हमारी परंपरा है कि हम जिसे बढ़ाना चाहते हैं, उसे मिटाने की बात करते हैं। चलो अब कुछ लोग भ्रष्टाचार मिटाने के लिए सड़क पर उतरे हैं, यह भ्रष्टाचारियों का भाग्य ही है।

भ्रष्टाचारियों की आजादी का उन्हें मिटाने वालों की आजादी से न कोई राग है, न द्वेष। सभी आजाद हैं, अपनी मनमानी करने के लिए। जब इस देश में ईंट-पत्थर चलाने की आजादी है, सरकारी इमारतें फूंकने की आजादी है, रेल की पटरियां उखाड़ने की आजादी है, तो अहिंसक तरीके से जनता को लूटने की आजादी पर इतना शोर मचाने की क्या जरूरत है। जब जनता चुप है, अपने काम में लगी है, रिश्वत देकर काम हो जाने की गारंटी से प्रसन्न है तो फिर किसी और को मिर्च क्यों लग रही है। जब देश आजाद है तो किसी की आजादी को बाधित करने वाला क्यों न अपराधी माना जाये। बेहतर हो वह भी अपनी कोई दुकान सजा ले, बिचौलियों की भी तो चांदी है। दूसरों को कुछ  नेक काम करने से रोकने की जगह अपना थैला भरने का उपाय खोजे। इसी में सबका भला है। आजादी जिंदाबाद।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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