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आजाद भारत में भी आजादी के लिए कक्‍का ने खाई लाठियां

: 112 साल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डोंगर सिंह की दास्‍तान : अभी भी महापुरुषों की प्रतिमाओं की करते हैं देखभाल : जिन आंखों ने राजा-महाराजाओं की शान-ओ शौकत और प्रजा की दयनीयता देखी हो, अंग्रेजों का शोषण-उत्पीड़न और स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का पहला आरोहरण देखा हो। देखा ही नही हो अपितु इस क्रांतिकारी परिवर्तन में एक योद्धा की तरह भागीदार भी रहा हो, जो सीधे सामंतों की आंखों की किरकिरी रहा हो। जिसने राष्ट्र पिता महात्मा गांधी का प्रत्यक्ष सानिध्य पाया हो। ग्वालियर के विकास लिए समर्पण जिनके दिल-ओ-दिमाग में कूट-कूट कर भरा हो, ऐसे ही व्याक्ति से मिलना किसी को भी रोमांचित कर देगा। ऐसी ही शख्सियत हैं भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर के 112 वर्ष के कक्का डोंगर सिंह, जो अपने कर्म और जीवन शैली के कारण हर दिल में राज करते है।

: 112 साल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डोंगर सिंह की दास्‍तान : अभी भी महापुरुषों की प्रतिमाओं की करते हैं देखभाल : जिन आंखों ने राजा-महाराजाओं की शान-ओ शौकत और प्रजा की दयनीयता देखी हो, अंग्रेजों का शोषण-उत्पीड़न और स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का पहला आरोहरण देखा हो। देखा ही नही हो अपितु इस क्रांतिकारी परिवर्तन में एक योद्धा की तरह भागीदार भी रहा हो, जो सीधे सामंतों की आंखों की किरकिरी रहा हो। जिसने राष्ट्र पिता महात्मा गांधी का प्रत्यक्ष सानिध्य पाया हो। ग्वालियर के विकास लिए समर्पण जिनके दिल-ओ-दिमाग में कूट-कूट कर भरा हो, ऐसे ही व्याक्ति से मिलना किसी को भी रोमांचित कर देगा। ऐसी ही शख्सियत हैं भारत के हृदयस्थल मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर के 112 वर्ष के कक्का डोंगर सिंह, जो अपने कर्म और जीवन शैली के कारण हर दिल में राज करते है।

मेरी मुलाकत उनसे ग्वालियर के वरिष्‍ठ पत्रकार और मेरे आदरणीय देवश्रीमाली जी ने करवाई थी। मैं उनके पास गया तो था सिर्फ़ अपने चैनल के स्टोरी के लिये, लेकिन मुझे कक्का डोंगर सिंह से वो सब बातें पता चलीं, जो मैंने अभी तक किसी से नही सुनी थी, और बहुत ही कम लोग है जिनको यह सब बातें मालूम होंगी! उनकी एक बात ने मेरे रोम-रोम को खड़ा कर दिया। इस बात का मलाल कक्का डोंगर सिंह को ता-जिंदगी तक सताता रहेगा, और यह बात अगर कोई भी भारतीय नागरिक सुनेगा तो शायद उसका भी यही हाल होगा।

एक तरफ़ जहा पूरा देश 15 अगस्त 1947 को आजादी का जश्न मना रहा था, वहीं उस दिन भी ग्वालियर, गुलामी की जंजीरों मे जकड़ा हुआ था। ये जंजीरें थी राजशाही की। देश आजाद तो हुआ लेकिन कई रियासतों ने खुद को आजाद भारत का एक हिस्सा मानने से इनकार कर दिया। ग्वालियर रियासत भी उसमें से एक थी। पूरा देश आजादी की खुशियां मनाता रहा, वहीं ग्वालियर में आजादी के परवाने तिरंगा थामे आजाद भारत में भी आजादी के लिये लाठी डंडे खाते रहे। कक्का डोंगर सिंह की दाई आंख की रोशनी इसी संघर्ष मे चली गयी। बाद में स्वतन्त्रता सेनानियों ने मिलकर ग्वालियर में 24 जनवरी 1948 को तिरंगा सामूहिक रूप से फहराया। क्योंकि ग्वालियर के सांमतवादी ( यानी इस स्टेट के राजा) चाहते थे तिरंगे की जगह उनकी स्टेट का झंडा फ़हराया जाए। इन बातों को लेकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सांमतवादियों में एक जंग छिड़ गयी।

कक्का डोंगर सिंह ने आजादी कैसे हासिल की गई, इसे अपनी बूढ़ी हो चुकी आंखों से देखा है। इसी वजह से उन्‍होंने महात्मा गाँधी, डाक्टर भीम राव अंबेडकर, लालबहादुर शास्त्री, रानी लक्ष्मीबाई जैसी कई लोगों की प्रतिमाओं को अपने आसपास लगाया और उनको संवारने-सहेजने का जिम्मा ख़ुद ही उठाया हुआ है। कक्का डोंगर सिंह गांधी जी की मूर्ति को देखते है तो ऐसा लगता है कि जिस आदमी ने लोकतंत्र पैदा किया, उसके ही लोकतंत्र की हत्या कर दी गई हो, इससे बड़ा दुर्भाग्य इस भारत के नागरिक के लिए क्या हो सकता है।

कक्का डोंगर सिंह अपने एक सहायक के साथ हर रोज़ स्कूटर पर सवार होकर निकल पड़ते हैं, महापुरुषों की प्रतिमाओं की साफ-सफाई और धुलाई के लिए। प्रतिमाओं के सामने नतमस्तक होने में उन्हें एक अलग ही खुशी होती है। कक्का डोंगर सिंह महात्मा गांधी के साथ वर्धा और अन्य स्थानों पर स्वतन्त्रता आन्दोलन की लड़ाई में साथ दे चुके हैं। उन पर लिखी गई किताब महासमर के योद्धा में इन सब चीजों का विधिवत जिक्र है।

लेखक नासिर गौरी टीवी पत्रकार हैं.

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