: वरिष्ठ पत्रकार यश गोयल के व्यंग्य संग्रह भ्रष्टाचार डॉट कॉम की समीक्षा :यश गोयल का यह व्यंग्य- संग्रह सभी दृष्टियों से बेजोड़ है। यशजी जिस सामर्थ्य के व्यंग्यकार हैं, इस बात का परिचय उनके व्यंग्य-संग्रह से सहज ही मिल जाता है। विभिन्न विषयों पर लिखे गए व्यंग्यों को इस संकलन में समाहित किया गया है। प्रायः सभी रचनाओं में आज की जीवन शैली, व्यवस्था व यथार्थ से उत्पन्न विसंगतियां विद्रूपताएं देखने को मिलती है जिन पर वे बार-बार लेखनी से प्रहार करते चले जाते हैं। लेखक ने केवल पारंपरिक व्यंग्य ही नहीं लिखे, वरन लीक से हटकर कार्य करने का जज्बा भी दिखाया है। उनके व्यंग्य में कुछ हटकर करने की चाहत साफ दिखाई देती है।
वे केवल सामान्य व्यंग्य तक सीमित नहीं रहे हैं। उन्होंने व्यंग्य को कथा रूप में बड़ी ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। और तो और वे व्यंग्य को काव्य
के द्वारा प्रस्तुत करने से भी नहीं चूके हैं। यश के व्यंग्यों को पुरातन परंपरा का प्रतीक भी नहीं कहा जा सकता। वे नवीनता के समर्थक हैं एवं उनकी व्यंग्य रचना आम व्यंग्यों से सर्वथा अलग हटकर हैं।
हिंदी व्यंग्य के इस संसार में इस व्यंग्यकार की रचनाएं अपार संभावनाऐं जगाती हैं। नियमित लेखन से यश गोयल की रचनाशीलता में निरंतर प्रौढ़ता के दर्शन होते चले जा रहे हैं। उनकी शैली प्रभावशाली और उत्कृष्ट कोटि की हैं। कुल मिलाकर यश गोयल का यह व्यंग्य संग्रह व्यंग्य के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा।
व्यंग्य में नामालूम-से लोगों पर राजनीति के असर से उपजी पीड़ा को व्यंग्य बनाया गया है। कटाक्ष और कभी-कभी सपाट टिप्पणियाँ लेखक की विशेषताएँ हैं, पर सबसे बड़ी विशेषता जो है वह यह है कि जो कुछ यह लेखक कहता है, पात्र या स्थितियां कहती है। आम शहरी और ग्रामीण आदमी से अरमान और आकांक्षा तथा उसके छले जाने के एहसास का लेखन है।
लेखक शरद उपाध्याय लेखन कार्य से जुड़े हुए हैं.

