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आशा निराशा के इसी चक्र से तो पार पाना है

दिमाग पर थोड़ा जोर दें तो आपको बचपन के वे दिन याद आ जायेंगे जब गुणा बाबा या गुदरिया बाबा को देखते ही आप मचल उठते थे। उससे भी पहले छुटपन में जब आप सोने में आना-कानी करते थे तो आपकी मां गुदरिया बाबा का नाम लेकर आपको डराया करती थी। सारंगी की तान छेड़ते ये घुम्मकड़ बाबा नाथ संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं। भले ही आज का बचपन इन्हें बिसरा रहा है, हर दरवाजे पर दस्तक देते नाथ-पंथियों की यात्रा बदस्तूर जारी है। कुछ सौ साल पहले देश में जब भक्ति मार्ग का चलन बढ़ा तो शैव आस्था से प्रभावित एक वर्ग ने नई राह पकड़ी। गोरखनाथ इनके अराध्य-पुरुष हुए। ये ब्राह्मण-धर्म की जटिलताओं को नहीं मानते और न ही भेद-भाव पर यकीन करते हैं। भक्ति के सहारे परम शक्ति से एकाकार हो जाना ही इनका मकसद है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में इस संप्रदाय के साठ हजार सदस्य हैं। गोरखपुर इनके लिए तीर्थ-स्थल जैसा ही है।

दिमाग पर थोड़ा जोर दें तो आपको बचपन के वे दिन याद आ जायेंगे जब गुणा बाबा या गुदरिया बाबा को देखते ही आप मचल उठते थे। उससे भी पहले छुटपन में जब आप सोने में आना-कानी करते थे तो आपकी मां गुदरिया बाबा का नाम लेकर आपको डराया करती थी। सारंगी की तान छेड़ते ये घुम्मकड़ बाबा नाथ संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं। भले ही आज का बचपन इन्हें बिसरा रहा है, हर दरवाजे पर दस्तक देते नाथ-पंथियों की यात्रा बदस्तूर जारी है। कुछ सौ साल पहले देश में जब भक्ति मार्ग का चलन बढ़ा तो शैव आस्था से प्रभावित एक वर्ग ने नई राह पकड़ी। गोरखनाथ इनके अराध्य-पुरुष हुए। ये ब्राह्मण-धर्म की जटिलताओं को नहीं मानते और न ही भेद-भाव पर यकीन करते हैं। भक्ति के सहारे परम शक्ति से एकाकार हो जाना ही इनका मकसद है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में इस संप्रदाय के साठ हजार सदस्य हैं। गोरखपुर इनके लिए तीर्थ-स्थल जैसा ही है।

पंद्रह सालों तक भिक्षाटन के बाद जब ये दीक्षित होते हैं तब जाकर इन्हें गोरखपुर में गद्दी नसीब होती है। इस दौरान उन्हें भिक्षा के जरिये चौरासी मन सामग्री जमा करनी होती है, जिसमें अकेले बारह मन कपड़े होने चाहिए। नाथपंथी इन कपड़ों को गुदरी कहते हैं। यही कारण है की गृहस्थ इन्हें गुदरिया बाबा कह-कर पुकारते हैं। साल में बस एक दिन यानी 14 जनवरी मकर-संक्रांति का दिन इनके लिए ख़ास होता है, जब इन्हें गोरखपुर आश्रम के दर्शन होते हैं। फिर लौट आते हैं वे उसी सांसारिक दुनिया में जिससे अलग होना उनका लक्ष्य है।

कहते हैं दैनिक जीवन की कठिनाइयों से जूझते हुए इंसान में जब निराशा का भाव घर कर लेता है तब वह संन्यास की ओर बढ़ता है। इस विरक्त भाव को नजर अंदाज भी कर दें तो भी जीवन की भंगिमाओं से मुक्त होने की लालसा कई लोगों को इस ओर खींचती है। पर मोह-भंग के बावजूद अपनों से दूर हो जाना क्या इतना आसान है?

गुदरिया बाबा को जब सारंगी की तान पर निर्गुण, सदगुण, गोपीचंद गाते गौर से सुनेंगे तो आपको विरह की यही वेदना महसूस होगी। समाज की बात छोड़ भी दें लेकिन मां से दूर होना इनके लिए कठिन परीक्षा होती है। मान्यता है कि इन्हें मां का भीख नसीब नहीं होता। मां भला अपने संतान को योगी कैसे बनने दे। मां से मुक्ति संभव नहीं, तभी तो परम सत्य से मिलन की आस रखने वाला गुदरिया बाबा छल-पूर्वक मां से भीख लेता है।

यही कारण है कि हर घर की देहरी पर ये माताओं के हाथों ही साड़ी लेने की जिद करते हैं। मिल गई तो ठीक और न मिले तो भी ठीक। आशा-निराशा के इसी चक्र से तो उन्हें पार पाना है। फिर चल पड़ते हैं अगली देहरी पर। जीवन भी कैसी यात्रा है।

लेखक पंकज मिश्र पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख ब्‍लाग अयाची से ayachee से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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