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इन्हें माफ करना शनिदेव

शनिदेव के तीर्थ में गुंडों का राज

इसे कलियुग में सतयुग की वापसी की आहट मानिये या फिर धर्म के बाजार की गरमी का असर।[caption id="attachment_2154" align="alignright"]विकास मिश्रविकास मिश्र[/caption] लब्बेलुआब ये है कि हम बड़े धार्मिक हो गए हैं। मेरे घर में भी धर्मोदय हो गया है। इसी धर्मोदय में कार्यक्रम बना शिरडी का।

विकास मिश्र

शनिदेव के तीर्थ में गुंडों का राज

इसे कलियुग में सतयुग की वापसी की आहट मानिये या फिर धर्म के बाजार की गरमी का असर।विकास मिश्र लब्बेलुआब ये है कि हम बड़े धार्मिक हो गए हैं। मेरे घर में भी धर्मोदय हो गया है। इसी धर्मोदय में कार्यक्रम बना शिरडी का।

जिस दिन शिरडी पहुंचे वो शनिवार था। तय ये हुआ कि शनि शिंगणापुर के शनिदेव का दर्शन आज ही कर लिया जाए। शनिवार के दिन शनिदेव के दर्शन। शिरडी में टैक्सी वाले चिल्ला रहे थे शनि शिंगणापुर.. शिंगणापुर..। हर टैक्सी का किराया अलग। 85 रुपये से लेकर 150 रुपये तक। जो ग्राहक जितने में फंस जाए। ये आने जाने का किराया था। खैर, 85 रुपये सवारी पर बात तय हुई।

आखिरकार हम पहुंच गए शनि शिंगणापुर। मंदिर निकल गया..। 100 मीटर दूर टैक्सी मुड़ी और बदबूदार रास्ते से होकर एक जगह रुकी। बताया गया टैक्सी स्टैंड है। लेकिन वहां मजमा लगा था। किनारे किनारे धर्म की सजी हुई दुकानें। टैक्सी रुकी और हम लोग जैसे ही बाहर निकले। दुकान के बाहर खड़े लोगों ने पीताम्बर पकड़ा दिया। बताया कि जो वस्त्र हम लोग पहनकर आए हैं, उनमें दर्शन नहीं कर सकते। महिलाएं शनिदेव का दूर से दर्शन करेंगी और जो पुरुष हैं पहले अपने सारे कपड़े निकालेंगे, पीताम्बर पहनेंगे। बगल में टंकी के पानी से नहाएंगे और भीगे बदन जाएंगे मंदिर में। धर्म के उन ठेकेदारों ने ये भी बताया कि बगैर पीताम्बर के आप मंदिर में घुस भी नहीं सकते। पीताम्बर बिल्कुल मुफ्त है। पहनिए और पहले जाइए नहाइए। फिर आइए प्रसाद लीजिए और मंदिर में जाकर पुण्य कमाइए।

एक टंकी में टोटियां लगी थीं, उसी में नहाना था। आस पास भयानक बदबू। खैर नहाया और गीले बदन वापस वहीं पहुंचा, जहां टैक्सी खड़ी थी। धर्म का ठेकेदार खुश हो गया। बोला- अब प्रसाद ले लो। अगर पहली बार आए हो तो तीन सौ रुपये का प्रसाद लो। पहले आ चुके हो तो डेढ़ सौ रुपये का प्रसाद।

प्रसाद में क्या था, बस गिनती के चार पांच फूल, एक पैकेट लाई एक रुपये वाली, दो अगरबत्ती, छोटा सा काला कपड़ा वगैरह। कुल लागत पांच रुपये से ज्यादा नहीं। दाल में काला नहीं था, दाल ही काली थी, मुझे दिख गया। मैं अड़ गया प्रसाद लेने से इनकार कर दिया। धर्माधिकारी मेरे पीछे पड़ गए। पहली बार आए हो, शनिदेव को खुश करके जाओ..।

इसी बीच एक मोटा-तगड़ा आदमी बाहर निकला। काला बदन। पूरा डील डौल बॉलीवुड के विलेन रामी रेड्डी जैसा। उसने कहा-प्रसाद नहीं लेना तो इस गमछे के 100 रुपये दो। यहां ज्यादा गुंडागर्दी दिखाने का नहीं।

टैक्सी के बाकी साथी इस बीच गमछे में आ चुके थे। प्रसाद ले चुके थे। उनकी तरफ उसने इशारा करते हुए कहा-तुम अकेले होशियार हो, देखो इन्हें ये तो बहस नहीं कर रहे। चलो खिटपिट छोड़ो डेढ़ सौ का प्रसाद ले लो। नहीं तो मंदिर के भीतर नहीं घुस पाओगे।

मैं हथियार डाल चुका था। खैर प्रसाद लिया। आगे बढ़ा एक और इम्तिहान बाकी था। यहां तेल का खेल था। पन्नियों में तेलनुमा चीज थी। सौ ग्राम के आसपास दाम 60 रुपये। दो सौ ग्राम के आसपास की थैली के 110 रुपये। बोला पहली बार आए हो तो बड़ा वाला लो। खैर मैंने छोटी वाली थैली ली। आगे बढ़ा। मंदिर में प्रसाद की लाई बाहर ही रखवा ली गई। जिस गार्ड ने उसे रखा, वो खीझकर बोला- ये कहां पीताम्बर के चक्कर में पड़ गए? पूरे कपड़ों में आना चाहिए था।

मंदिर के अहाते में एक कमरे में अफसर के नाम पर सिक्योरिटी अफसर था। मैंने उससे पूरा हाल सुनाया और सवाल भी पूछा कि क्या बिना पीताम्बर पहने कोई मंदिर में नहीं घुस सकता। उसने बिना लाग लपेट बता दिया कि ऐसा नहीं है। बाहर बेवकूफ बनाते हैं। मैंने कहा कि अगर बेवकूफ बनाते हैं तो आप लोग यहां क्यों बैठे हैं। दूर दराज से आए लोग ठगे जा रहे हैं। खैर., उसने मेरे साथ एक सिक्योरिटी गार्ड भेज दिया। मैंने पूछा कि ये क्या करेगा। वो बोला-जो आप कहोगे वो करेगा।

मैं गार्ड के साथ पूरे जोश से वापस मौका ए वारदात पर पहुंचा। गार्ड को देखते ही वहां थोड़ी खलबली मची। मोटा तगड़ा आदमी फिर सामने था। गार्ड से उसकी बात हुई। मोटे ने पूछा- तुझे कितना देना है, ये बता।

मैं- एक तो बातचीत का लहजा ठीक करो। मेरा एतराज प्रसाद की कीमत पर नहीं, उससे पहले ठगी के इस खेल पर है।

मोटा- ठीक है तू सौ रुपये ही दे।

गार्ड ने सिर हिलाया। मैंने सौ रुपये दे दिये। गार्ड अचानक गायब हो गया। मोटे के नथुने गुस्से से फूले हुए थे।

मोटा- तू गार्ड को लेकर यहां क्यों आया? तेरे को मालूम..। ये महाराष्ट्रा है महाराष्ट्रा। तेरा यूपी दिल्ली नहीं है। यहां गुंडागर्दी करने आया है।

मैं- गुंडागर्दी कौन कर रहा है भाई।

शनि देव यात्रामोटा- तेरे को बताऊं मैं..। अबी तेरे को शिरडी जाने का है कि नईं। बीवी बच्चों के साथ आया है, लौटके शिरडी नहीं जा पाएगा।

मैं- क्या करोगे तुम।

मोटा- तू बहुत खिटपिट करता है। नेता है तू? गुंडा है तू? तेरा दिमाग ठिकाने लगा देगा? समझा क्या? तूने बहुत बड़ी गलती कर दी है। ऐसी गलती करने का नईं। चल निकाल सौ रुपये।

मैं- ये बात गार्ड के सामने क्यों नहीं बोले।

मोटा- वो तो चला गया। क्या कर लिया। उसे 50 रुपये देने पड़े। जब भी यहां गार्ड आता है, 50 का नोट ले जाता है। गार्ड तो चला गया। अब बता क्या कर लेगा तू। सौ रुपये दे और कपड़े पहन। गाड़ी में बैठ लेने का। चुपचाप निकल जाने का।

इसी बीच मेरी पत्नी बोली- तुम लोग को लूटना ही है तो बंदूक लेकर क्यों नहीं लूटते। धर्म के नाम पर धोखाधड़ी क्यों कर रहे हो।

मोटा बोला- तू गाड़ी में बैठ। चुप रह। अबी तेरे आदमी से बात हो रही है। हां चल तू सौ रुपये निकाल। 

मेरा मन घिन से भर गया। गुस्सा भी था, तो परिवार के नाते थोड़ा डर भी लगा। एक बात और थी कि आठ साल का मेरा बेटा भी मेरे साथ था। उसकी नजर में पापा हीरो हैं और विलेन ने हीरो का बुरा हाल बना रखा था। खैर, मैंने सौ रुपये निकालकर उसे दे दिया। उसके चेहरे पर विजयश्री की चमक तो दिखी, लेकिन बुझ भी गई। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि मैं इतनी जल्दी सरेंडर कर जाऊंगा। मोटा चला गया।

मैंने कपड़े पहने। गुस्से से दिमाग फट रहा था। इस बीच दुकान से एक और आदमी निकला। वो लगा समझाने-देखो यहां खिटपिट नहीं करने का। ये महाराष्ट्रा है। यहां का आदमी डेंजर है। यहां पंगा नहीं लेने का। 

इस बीच मोटा लौट आया था। वो इतनी जल्दी क्लाइमेक्स के मूड में नहीं था।

मोटा- तूने बड़ी गलती की है। ऐसा गलती करने का नईं। अब दुबारा आएगा तो चुपचाप रहने का। पंगा लिया तो फंसेगा तू।

मेरे मन में दौड़ती भागती ट्रेन की तरह कई ख्याल आ रहे थे, जा रहे थे। उस मोटे का खून कर देने का ख्याल भी आ रहा था। गांधीगीरी का भी ख्याल आया। बाबा भारती और खड़क सिंह का किस्सा भी याद आया।

मैं- तुम्हें ये कैसे लग रहा है कि मैं दुबारा यहां आऊंगा। दिल्ली में बड़ा नाम सुना था शिंगणापुर का। शनिदेव का। लेकिन यहां आकर तसल्ली हो गई। एक बात तो तय है कि चाहे जो हो जाए मैं दुबारा यहां नहीं आऊंगा। अगर मेरा बेटा मर रहा हो, बीवी मर रही हो और खुद शनिदेव भी आकर कह दें कि शिंगणापुर में दर्शन कर लो तो मैं बीवी और बच्चे को मरने दूंगा। यहां नहीं आऊंगा।

मोटा अवाक खड़ा था। मैंने देखा कि वार सही पड़ा है तो बात आगे बढ़ाई- लोग कहते हैं कि शनिशिंगणापुर में घरों में ताले नहीं पड़ते। दरवाजा तक नहीं होता। आखिर क्यों होगा? सारे लुटेरे तो मंदिर के आस पास बैठे हैं। हजारों लोग रोज आते हैं, ऐसे ही लुटकर जाते हैं। तो चोर लुटेरों को बाहर जाने की क्या जरूरत है? खैर, मेरी तो शनिदेव से तसल्ली हो गई। अब लौटकर शिरडी के साईं बाबा को भी देखना है, उनके भी दर्शन करने हैं। अगर वहां भी ऐसा ही धोखाधड़ी का धंधा मिला तो ये मेरी पहली ही नहीं आखिरी यात्रा भी होगी। शिरडी भी कभी नहीं आऊंगा।

मोटा- ऐसा नहीं कहने का, बात को समझने का। आपको पंगा नहीं लेना मांगता था। आपके मन को बहुत तकलीफ हो रहा है।

मोटा आप पर उतर आया था। मैंने कहा- तकलीफ नहीं, मुझे घिन आ रही है। ड्राइवर बड़ी मेहरबानी होगी अगर यहां से तुरत चले चलो।

मोटा- नहीं गुस्सा होकर यहां से नहीं जाने का। शनिदेव के धाम में लोग खुश होकर जाता।

मोटा और करीब आया और उसने सौ रुपये का नोट पकड़ाना चाहा। मैंने मना कर दिया। उसने जबरन सौ रुपये मेरी जेब में डाल दिया। बोला-खुशी से पैसा रख लेने का। क्या करें यहां करना पड़ता है। पैसे के लिए। मंदिर वाला भी यहां दुकान लगाने का पैसा लेता है। टैक्सी वाले का भी कमीशन है। सिक्योरिटी वाले को भी कमीशन जाता है। वैसे तो आपकी तरह पंगे वाला भक्त यहां कम ही आता है, फिर भी किसी ने पंगा किया और सिक्योरिटी गार्ड लेकर आया तो गार्ड हर चक्कर के 50 रुपये लेता है। पुलिस को भी पैसा जाता है। देखो यहां कोई पुलिस वाला है। नहीं ना। आगे भी नहीं मिलेगा। टैक्सी भी इसीलिए थोड़ी सस्ती है कि बाकी वसूली यहां हो जाएगी। इसी नाते हम लोग चीटिंग करता है। बात को समझने का। पैसा रख लेने का। खुश होकर जाने का।

मैं- तुम लोग आखिर धोखाधड़ी क्यों करते हो। सीधे सीधे पैसे क्यों नहीं मांगते। टैक्सी का किराया और क्यों नहीं बढ़ा देते। क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी हरकतों से ये पावन तीर्थ बदनाम होगा।

मोटा- वैसे मांगने पर कहां कोई पैसे देता है। धर्म और प्रसाद के नाम पर खुशी खुशी दे देता है। पंगा नहीं करता। हम यहां पैसे कमाने के लिए ही है।

टैक्सी आगे बढ़ गई। हम लोग शिरडी आ गए। कहानी खत्म हो गई। एक लाइन ये भी कि शिरडी में ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब इसे आप कहानी समझें, रिपोर्ट समझें, खबर समझें या कुछ भी समझें। मेरा उद्देश्य आपको लाखों रुपये रोजाना के इस ठगी के धंधे को उजागर करना था।

अगर आपको शनि शिंगणापुर जाना हो तो पहले इस कहानी पर गौर कीजिएगा।


लेखक विकास मिश्र हिंदी न्यूज चैनल ‘न्यूज 24’ में सीनियर प्रोड्यूसर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क करने के लिए   [email protected] या 09873712444 का सहारा ले सकते हैं।

 

 

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