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इस फैसले को ‘अवसर’ का रूप दें

इस आलेख को शुरू करने से पहले यह स्पष्टीकरण देना जरूरी है कि लेखक की देश के न्याय प्रणाली में पूर्ण आस्था है. यह आलेख कहीं से भी न्यायिक व्यवस्था और उस के किसी फैसले पर सीधी टिप्पणी करने के लिए नहीं लिखा जा रहा है. फिर भी यह कहना समीचीन होगा कि एक स्वस्थ एवं सबल लोकतंत्र की सफलता इस बात में ही सन्निहित है कि वहां न्यायिक उपचार के बिना अधिकाँश ‘जन’ का काम चल जाय. बिना कोर्ट कचहरी गए हुए जितने नागरिक अपना काम-काज सुचारू चला पा रहे हों समझिए लोकतंत्र उसी अनुपात में कामयाब है. निश्चय ही समाज में न्याय व्यवस्था की अपनी जगह है, लेकिन वह अंतिम उपाय के रूप में ही काम आये यही सबल समाज की निशानी होनी चाहिए. अगर प्राथमिक उपचार प्रदान करना न्यायिक मजबूरी हो जाय, जैसे अनाज सड़ने के मामले में हुआ तो समझ लीजिए लोकतंत्र में कुछ सड़न जैसा पैदा हो रहा है. बाद में डॉ. मनमोहन सिंह जितना खुन्नस निकालें लेकिन कहा जायेगा कि मर्ज़ चौथे स्टेज में पहुच गया है. बहरहाल.

इस आलेख को शुरू करने से पहले यह स्पष्टीकरण देना जरूरी है कि लेखक की देश के न्याय प्रणाली में पूर्ण आस्था है. यह आलेख कहीं से भी न्यायिक व्यवस्था और उस के किसी फैसले पर सीधी टिप्पणी करने के लिए नहीं लिखा जा रहा है. फिर भी यह कहना समीचीन होगा कि एक स्वस्थ एवं सबल लोकतंत्र की सफलता इस बात में ही सन्निहित है कि वहां न्यायिक उपचार के बिना अधिकाँश ‘जन’ का काम चल जाय. बिना कोर्ट कचहरी गए हुए जितने नागरिक अपना काम-काज सुचारू चला पा रहे हों समझिए लोकतंत्र उसी अनुपात में कामयाब है. निश्चय ही समाज में न्याय व्यवस्था की अपनी जगह है, लेकिन वह अंतिम उपाय के रूप में ही काम आये यही सबल समाज की निशानी होनी चाहिए. अगर प्राथमिक उपचार प्रदान करना न्यायिक मजबूरी हो जाय, जैसे अनाज सड़ने के मामले में हुआ तो समझ लीजिए लोकतंत्र में कुछ सड़न जैसा पैदा हो रहा है. बाद में डॉ. मनमोहन सिंह जितना खुन्नस निकालें लेकिन कहा जायेगा कि मर्ज़ चौथे स्टेज में पहुच गया है. बहरहाल.

जब तक आप यह आलेख पढ़ रहे होंगे तब-तक चाहे तो अयोध्या मामले पर कोर्ट का फैसला आ जाना था या कुछ घंटे का इंतज़ार ही शेष रह जाता. अठारह साल के लंबे इंतज़ार के बाद अपेक्षित इस फैसले के लिए हर पक्ष द्वारा तैयारी पूरी कर ली गयी थी, लोगों ने अपना दिल भी थाम लिया था. लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले ने फिर मियाद बढ़ा दी. इस फैसले पर किसी भी तरह की टिप्पणी ना करते हुए समग्र रूप से यह कहना होगा कि हर व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं. जहां ‘सौ और निन्यानबे में कौन ज्यादा’ यह तय करना हो तो कोर्ट सीधे तौर पर कह सकता है कि सौ ज्यादा है. लेकिन अगर यही फैसला लोकतंत्र को लेना हो तो वह कहेगा कि सौ तो ज्यादे है ही लेकिन निन्यानबे भी कम नहीं. यह दोनों व्यवस्थाओं में मूलभूत अंतर है. हालांकि दोनों की अपनी सीमाएं और उपादेयता भी है.

जहां तक अयोध्या मसले का सवाल है तो यह देखा गया है कि इस मामले में न्यायपालिका में भी मतैक्य नहीं रहा है. स्थापित न्याय व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें भी कोई फैसला बहुमत के आधार पर ही लेना होता है. तो आप गौर करें….तथ्य एक सामान, अधिवक्ताओं का विश्लेषण भी पीठ के सभी जजों के लिए एक जैसा, क़ानून भी सबों के लिए बराबर. फिर भी अगर न्यायाधीशों का मत अलग-अलग हो तो समझा जा सकता है ना कि हर चीज़ तर्क की कसौटी पर एक सामान कसा जाने लायक नहीं होता या जैसा कि आइन्स्टाइन ने कहा था ‘आस्था किसी तर्क का मुहताज नहीं होता.’

24 सितम्बर को इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन सदस्यीय लखनऊ पीठ को इस बहुप्रतीक्षित मामले पर फैसला देना था. एक याची रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने फैसला को रोकने के लिए याचिका दायर की. तो उस पीठ ने ना केवल याचिका खारिज की अपितु याची पर जुर्माना भी लगा दिया. खबर के अनुसार इस फैसले में भी तीन में से एक जज का मत अलग था. लेकिन फैसला बहुमत के आधार पर लिया गया. पुनः त्रिपाठी सुप्रीम कोर्ट पहुचे तो वहां ना केवल मामले को सुनवाई योग्य समझा गया बल्कि फिलहाल त्रिपाठी के पक्ष में फैसला दे कर हाई कोर्ट के आने वाले फैसले पर रोक भी लगा दी गयी. इस मामले में भी जो दो सदस्यीय पीठ सुनवाई कर रही थी, उनमें से एक का मत अलग था. सरकारी वकील के अनुसार माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था इसलिए दी ताकि बातचीत से मामले का हल निकालने की गुंजाइश एक बार और तलाशी जा सके.

तो याचिकाकर्ता त्रिपाठी की मंशा क्या है, वह किसका हित संवर्द्धन चाह रहे हैं यह अलग मामला है. लेकिन अब जब फैसले को कम से कम चार-पांच दिनों के लिए टाल ही दिया गया है तो सरकार या सम्बंधित पक्ष को चाहिए कि इसे एक अवसर के रूप में देख कर कोई समाधानमूलक रास्ता तलाशे. एक बार और बातचीत का उच्चस्तरीय प्रयास किया जाना चाहिए. ज़ाहिर है इलाहाबाद हाई कोर्ट के कल का फैसला भी अंतिम नहीं होना था. इसके बाद भी उच्चतम न्यायालय में जाने का विकल्प बचा ही है. फिर केंद्र की सरकार के पास तो शाहबानो मामले की तरह अवसरवादी फैसले लेकर वोटों की तिजारत का विकल्प बचा हुआ है. पिछले अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि किसी भी तरह का ‘खेल’ करने से कांग्रेस भविष्य में भी चूकने वाली नहीं है. अनाज मामले में न्यायालय को नसीहत पिला कर प्रधानमंत्री ने इस ओर इशारा तो कर ही दिया है.

तो अंततः अगर न्यायालय को भी फैसले लेने में बहुमत का ही सहारा लेना होता है. उन्हें भी लोकतांत्रिक ढंग से ही व्यवस्था देना होता है तो क्यू ना देश की आजादी के बाद के इस सबसे बड़े सांस्कृतिक मामले, आस्था के इस सबसे बड़े विषय पर सभी पक्ष मिल-जुल कर अपनी एक राय बना देश के गंगा-जमुनी संस्कृति को समृद्ध करें? आने वाले तीन-चार दिन काफी महत्वपूर्ण हैं. इस दौरान उठाये जाने वाले कदम ही देश के भविष्य का फैसला कर सकते हैं. अगर हम इस मामले में कुछ सकारात्मक कर पाएं तो निश्चय ही इतिहास में एक जिम्मेदार पीढ़ी के रूप में जाने जायेंगे. देश के समक्ष वैसे ही चुनौतियों का अंबार है. महंगाई बेरोजगारी के आलावा जलता कश्मीर, कराहता पूर्वोत्तर, गुलामी के खेल के नाम पर दांव पर लगा दिया गया देश का सम्मान, इससे सम्बंधित भ्रष्टाचार, फिर आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया माओवाद आदि ऐसे विषय हैं, जिनपर काम किया जाना ज्यादे आवश्यक है. उम्मीद है इस मामले में मतैक्य स्थापित कर सभी पक्ष एकमत बना बहुमत का सम्मान करेंगे. अगर हम ऐसा करने में सफल रहे तो वास्तव में उच्चतम न्यायालय का यह फैसला, अवसर में तब्दील हो सकता है.

लेखक पंकज कुमार झा रायपुर से प्रकाशित ‘दीप कमल’ के संपादक हैं.

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