वह है या नहीं। क्या फर्क है इनमें। एक मृगतृष्णा की तरह वह दूर नज़र तो आती है पर ज्यों ही पास जाता हूँ, न जाने कहाँ खो जाती है। फ़िर मरुस्थल के भटकते राही की तरह प्यासा ही दम तोड़ देता हूँ। यहाँ दो तरह की अनुभूतियाँ विद्यमान है। हो सकता है की बात साहित्यिक कम और दार्शनिक ज्यादा लगे, परन्तु यथार्थ से शायद ही कोई इनकार करे। स्त्री विमर्श के संदर्भ में ऐसी ही ‘कनफ्यूज़्ड’ अनुभूतियों से समाज ग्रसित या आक्रांत है। एक औरत ( ज़ाहिर हैं खुबसूरत सी!) की मांग में सिन्दूर का होना या न होना- फर्क है। इस्लाम, सिख, क्रिस्चियन समुदाय में औरतों पर सिन्दूर और मंगल-सूत्र जैसे प्रतीक नहीं थोपे गये हैं। मांग भरी है तो ज़ाहिर है शादी- शुदा होगी। अगर मांग सूनी है तो भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समाज में प्रचलन के लिहाज से बात गंभीर हो जाती है, क्योकिं वह कुंवारी, विधवा या परित्यक्ता -इन तीनों में से कोई भी हो सकती है। यहाँ सिन्दूर का महत्व बड़ा ही ‘प्रतीकात्मक’ है। यही कारण है की युवतियाँ कुछ भी पहन लें, मंगलसूत्र नहीं पहनतीं और चेहरे पर कुछ भी लगायें, सिन्दूर तो भूले से भी नहीं लगाती।
पाँच हज़ार सालों के पुरूष प्रधान, वर्ण व्यवस्था पोषक, सामंती समाज में महिलाओं का जमकर शोषण हुआ, जो अब तक जारी है। महिला होना पैदाइशी संघर्ष का दूसरा नाम है और जो महिला होने के साथ दलित या पिछड़े जाति- वर्ग से आती हैं, उनकी पीड़ा तो अवर्णनीय ही है। जहाँ आज का सन्दर्भ है, नीतिगत तौर पर तो बड़े परिवर्तन आए हैं परन्तु नियति के तौर पर कोई ख़ास परिवर्तन हमारे समाज मे अभी तक नहीं आ पाया है। मर्द भी ‘फ्लर्ट’ होते जा रहे हैं, वहीँ महिलाओं ने भी कमसिन व हसीन दिखने की कोशिश में जहाँ एक ओर कृत्रिम सौंदर्य प्रसाधनों का लबादा ओढ़ा, ‘मिनी’ और ‘माइक्रो’ को भी प्रचलन में लाया। यों आजकल ‘फेमिनिज्म’ का विचार तेजी से प्रचलन में आया है, सो औरतों का सिगरेट या शराब पीना भी कोई बहस का मुद्दा नही रहा। ‘पेज थ्री’ पार्टियों के अख़बार और टेलीविज़न की सुर्खियों को देखकर तो ऐसा ही लगता है।
यहाँ महिलाओं को उनके पहनावे और चाल-चलन को लेकर कोई आपत्ति नहीं प्रकट की गई है, वैसे भी ये उनके निजी स्वतंत्रता का सवाल है। पर एक बात है कि परिवर्तन अगर स्वाभाविक हो और उसका आधार वैचारिक हो तो हमें किसी भी बदलाव का सम्मान करना चाहिए। इस तेज परिवर्तन वाले ‘ग्लोबलाइजेशन’ के दौर में जब पश्चिमी सभ्यता का अचानक प्रकोप बढ़ता जा रहा है, इस तरह का सांस्कृतिक पलायन अवश्य ही चिंता का कारण हो सकता है। यूँ इससे अछूता रहना भी मुश्किल है।
महिलाओं के सत्ताकेन्द्रों पर बढ़ती भागीदारी से पुरूषों की भौंहें तनी हैं और जब भी मौका मिलता है सत्ताकेन्द्रों के ये मठाधीश नीचता के स्तर पर उतर कर स्त्रियों के अपमानित करने से नहीं चूकते हैं। देश में कैट (CAT) के फैसले बड़ी संख्या में लागू होने का इंतजार कर रही हैं। पर यौन शोषण के आरोपी झारखंड के आईपीएस अधिकारी नटराजन ने कैट के फैसले के बाद फिर से नौकरी ज्वायन कर ली। वहीं यौन शोषण की शिकार महिला सुषमा बड़ाईक न्याय की बाट जोहकर अब ‘नक्सली’ हो गई है और क्रिमिनल्स की ‘गैंग-लीडर’ हो गई है। आरूषि मर्डर केस के बाद उत्तर प्रदेश के आईजी गुरदर्शन सिंह ने प्रेस कांफ्रेस में बयान दिया कि आरूषि ‘कैरेक्टरलेस’ थी। रूपम ने यौन शोषण का आरोप लगाकर एक विधायक राजकिशोर की हत्या कर दी, तो बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने प्रेस कांफ्रेन्स में कहा कि रूपम ‘ब्लैकमेलर’ थी। ऐसा ही एक वाकया हाल में हुआ जब अपने घर की अकेली कमाउ पुत्री कबड्डी खिलाड़ी मनीषा की हत्या दो बच्चों के बाप एक शादीशुदा जवान ने कर दी, तो सीआरपीएफ के कमान्डेन्ट बीसी पात्रा ने मीडिया से कहा कि मनीषा के कई पुरूषों से संबंध थे और ये ‘लव ट्रायंगल’ का मामला है। ये सभी उदाहरण पुरूष वर्चस्ववादी समाज में टूटती मान्यताओं और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के दौर में ‘मेल- फ्रस्टेशन’ का एक्पोजर ही है।
विदेशी पूँजी निवेश के बाद देश की आर्थिक तरक्की के चाहे लाख आंकड़े- दावे पेश किए जाएँ समाज विकास की बड़ी हकीक़त आधी आबादी यानी महिलाओं से जुड़ी है। इनके हक़- हकूक, सम्मान और तरक्की सुनिश्चित किए बिना विकास की बात करना सिर्फ़ बेमानी है। हमें मान लेना चाहिए की औरतों को सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक बराबरी का सवाल महज “किट्टी पार्टी सर्कल” व “शहरी- संभ्रांत- परकटी” महिलाओं का हथकंडा भर नहीं रह गया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था में महिलाओं को 50 फीसदी भागीदारी देकर जो राजनीतिक सफलता और वाह-वाही बटोरी है, उसने देशभर के पुरूष मानसिकता वाले नेतृत्वकर्त्ताओं की आँखें बहुत हद तक खोल दी है।
स्पष्ट है कि जब संपूर्ण जनसंख्या का आधा भाग महिलाओं का हो, उनके व्यवहारिक और वैचारिक बदलाव को हल्के से नहीं लिया जा सकता है। इस बदलाव की जरूरत उनके निजी पहचान को लेकर विभिन्न स्तरों पर हो रहे संघर्ष का स्वाभाविक परिणाम है, क्योंकि ये वही आधा भाग है जिसके बिना ‘अर्द्धनारीश्वर’ की परिकल्पना तो सम्भव है ही नहीं, सृष्टि संकट अवश्यम्भावी है।
लेखक निखिल आनंद टीवी पत्रकार हैं. पटना के लोयोला स्कूल, डीयू, जेएनयू और आईआईएमसी में पढ़ाई करने के उपरान्त ईटीवी, सहारा समय, जी न्यूज जैसे संस्थानों में 12 वर्षो तक कार्य अनुभव। सम्प्रति ‘इंडिया न्यूज बिहार’ के पॉलिटिकल एडिटर हैं. इनसे संपर्क nikhil.anand20@gmail के जरिए किया जा सकता है.

