Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मेरी भी सुनो

इस सरकार की ऐसी की तैसी

अखिलेशयह बात कहने में अब कोई गुरेज नहीं है कि इस सरकार की ऐसी की तैसी। इस सरकार के होने और ना होने का कोई मतलब नही है। सरकार केवल रोज हो रहे लूट के खेल पर सफाई देती नजर आ रही है और जनता भगवान भरोसे जी रही है। अगर किसी ने कोई आवाज निकाल दी तो इसकी खैर नही। आइए कुछ तथ्यों पर बात करते हैं। बिहार के बाद अब महाराष्‍ट्र में एक एडीएम को अपनी ईमानदारी की कीमत जान देकर गंवानी पड़ी है। इससे पहले भी बिहार और उत्तर प्रदेश में कई इमानदार अधिकारियों की हत्या कर दी गई थी। बिहार के ईमानदार इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या माफियाओं और सफेदपोश तंत्र के गुंडों और ठेकेदारों ने गोली मारकर कर दी थी। हमारे समाज में गलत काम करने वालों और खासकर देश को लूटकर धन पैदा करने वालों के हिम्मत के सामने कानून का शासन कितना ठिगना हो गया है, इसका जीता जागता उदाहरण मनमाड़ की ये दिल दहला देने वाली घटना है।

अखिलेशयह बात कहने में अब कोई गुरेज नहीं है कि इस सरकार की ऐसी की तैसी। इस सरकार के होने और ना होने का कोई मतलब नही है। सरकार केवल रोज हो रहे लूट के खेल पर सफाई देती नजर आ रही है और जनता भगवान भरोसे जी रही है। अगर किसी ने कोई आवाज निकाल दी तो इसकी खैर नही। आइए कुछ तथ्यों पर बात करते हैं। बिहार के बाद अब महाराष्‍ट्र में एक एडीएम को अपनी ईमानदारी की कीमत जान देकर गंवानी पड़ी है। इससे पहले भी बिहार और उत्तर प्रदेश में कई इमानदार अधिकारियों की हत्या कर दी गई थी। बिहार के ईमानदार इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या माफियाओं और सफेदपोश तंत्र के गुंडों और ठेकेदारों ने गोली मारकर कर दी थी। हमारे समाज में गलत काम करने वालों और खासकर देश को लूटकर धन पैदा करने वालों के हिम्मत के सामने कानून का शासन कितना ठिगना हो गया है, इसका जीता जागता उदाहरण मनमाड़ की ये दिल दहला देने वाली घटना है।

महाराष्‍ट्र मनमाड़ के एडीएम यशवंत की हत्या तेल तस्करों और भ्रष्‍टाचारियों ने की है। जिस तरह से यशवंत की हत्या की गई है और जिन लोगों ने की है, उससे पता चलता है कि इस पूरे आपराधिक षणयंत्र में मंत्री से लेकर संतरी तक शामिल हैं। इतना बड़ा दुःसाहसिक काम वही कर सकता है जिसकी पहुंच उपर तक हो। इस पूरे मसले को हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि इसी भ्रष्‍टाचार और घोटालों को लेकर पिछले कई महीनों से केंद्र सरकार विपक्ष के निशाने पर है और प्रधानमंत्री के इरादों पर उंगलियां उठाई जा रही हैं। इसमें कोई गलत भी नही है। सत्ता की लड़ाई में विपक्ष का सरकार पर आरोप राजनीति से प्ररित हो सकते हैं लेकिन जब जनता का विश्‍वास ही सरकार और लोकतंत्र से डगमगाने लगे तो इसे क्या कह सकते हैं। इससे तो एक बात साफ हो जाती है कि गांवों से लेकर शहरों में जो धन का प्रदर्शन हो रहा है, वे लूट के धन हैं और उस लूट में सब बराबर के शरीक हैं। और मान लीजिए वेतन लेने वाला आदमी कभी भी धनी नहीं हो सकता और ऐसा है तो सरकार को व्‍यापक स्तर पर सारे धनी हो चुके लोगों से आय का स्रोत मांगना चाहिए। और अगर देश्‍ा की सरकार ऐसा नहीं कर रही है तो जाहिर है कि हमारी सरकार महाभ्रष्‍ट है और प्रधानमंत्री बेकार और कमजोर।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, नरसिम्हा राव से भी दो कदम आगे निकलते दिख रहे हैं। आजाद भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा घोटाला और भ्रष्‍टाचार के लिए नरसिम्हा राव का शासन काल बदनाम रहा है, लेकिन अब मनमोहन सिंह राव से आगे बढ़ते दिख रहे हैं। लेकिन मनमोहन सिंह को याद रखना चाहिए कि भ्रष्‍टाचार और घोटाले के लिए बदनाम राव सरकार जाते-जाते कांग्रेस की लुटिया भी डुबो गए थे। इसी भ्रष्‍टाचार और घोटाले के कारण 96 और 98 के चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई और बीजेपी की अगुआई में एनडीए की सरकार बनी। आप को बता दें कि यही मनमोहन सिंह राव सरकार में वित मंत्री थे और उदारीकरण की नीति के प्रणेता भी। जाहिर है राव सरकार से लेकर अबतक के जितने घोटाले देश में हुए हैं  और हो रहे हैं, सबके बारे में प्रधानमंत्री को पता है। और उन्हें इस बात की भी जानकारी है कि ये घोटाले किस वजह से हुए हैं। और ऐसा नही है तो तो फिर यह कहने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि एक बेहतर अर्थशास्त्री राजनीति में आने के बाद अर्थशास्त्र के नियमों को या तो भूल गए हैं या फिर सच्चाई को कहने से परहेज कर रहे हैं। क्योंकि अर्थशास्त्र के छात्र होने के नाते उन्हें मालूम है कि जहां विकास की प्रक्रिया शुरू होती है वहां लिंकेज की शुरुआत होती हैं। अर्थशास्त्र में गलत तरीके से निकले धन को लिंकेज कहते है, जबकि समाज में इसे घोटाला और भ्रष्‍टाचार के नाम से जानते हैं। चूंकि यह बात इसलिए कही जा सकती है कि 20वीं सदी के महान अर्थशास्त्री जान मेनार्ड केंस की जिस अर्थनीति को प्रधानमंत्री 1991 से लागू करते आ रहे हैं, उस नीति की शुरुआत ही विकास और रोजगार निर्माण के लिए होती है और इस विकास से होने वाले साइड इफेक्ट को कैसे रोका जाए, पर जाकर खत्म हो जाती हैं। हमारे प्रधानमंत्री संभव है कि जे एम केंस से मिले भी होंगे क्योंकि केंस भारत में काम कर चुके हैं।

तो 1991 के बाद देश में जितने घपले-घोटाले हुए है, उसके सबसे नजदीकी गवाह देश में कोई है तो वह हैं हमारे प्रधानमंत्री। संभव है कि मनमोहन सिंह साफ सुथरे छवि के हैं और ईमानदार भी है, लेकिन उस ईमानदारी का क्या मतलब है? जब मंत्रिमंडल में शामिल दर्जनों लोग घपले घोटाले और आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं। ऐसे लोगों के साथ काम करने की मजबूरी कांग्रेस और यूपीए की हो सकती है लेकिन पाक साफ प्रधानमंत्री जैसे लोगों के लिए तो कतई नहीं। और यदि प्रधानमंत्री को लगता है कि उनके बगैर देश नहीं चल सकता तो इस पर सिर्फ हंसा ही जा सकता है। प्रधानमंत्री को याद करना चाहिए कि वे पिछले सात साल से इस देश को चला रहे हैं। पिछले सात सालों में देश के आर्थिक विकास के साथ-साथ देश के तंत्र से जुडे़ हुए जितने लोगों का विकास हुआ है, उनकी ही आर्थिक स्थिति की जांच कर दी जाए तो उन्हें कई चौंकाने वाले आंकड़े मिल सकते हैं। और तब उनको मालूम होगा कि जिस विकास की दुहाई दी जा रही है उसकी सच्चाई क्या है। और जो लोग उनके तंत्र से जुड़े हुए हैं, उनके सफेद कपड़े कितने दागदार हैं।

अपने ईमानदार प्रधानमंत्री से देश की जनता यह भी जानना चाहती है कि यदि कोई आम आदमी 10 रूपए की चोरी करता है तो वह सजा का हकदार होता है। और उसको सजा मिलती भी है। चाहे उसकी पिटाई हो, चाहे पुलिस को घूस देना पड़े या फिर उसे जेल जाना पड़े। लेकिन देश के कारपोरेट घरानों ने बैंकों से अरबों रूपए कर्ज लेकर भी लौटाने को तैयार नहीं है। वही पुलिस, वही तंत्र, वही अदालत और वही कानून उन्हें दंडित क्यों नहीं करते। कर की चोरी के मामले में आम आदमी को दंडित कर दिया जाता है, लेकिन अरबों-खरबों की कर चोरी करने वालों के यहां से संतरी से मंत्री तक उपकृत होते देखे जाते हैं। फिर उन्हें दंडित कौन करेगा। क्या हमारे पीएम को इस बात की जानकारी नहीं है कि देश में आम जनों के साथ क्या किया जाता है। जब दिल्ली जैसे शहरों में गुंडों-बदमाशों और दलालों की करसतानी को रोकने में सरकार के लोग हांफते नजर आ रहे हैं तो बाकी देश का क्या हाल है, भगवान ही जानता है? फिर जो लोग दिन दहाड़े सत्ता सरकार को चकमा देकर सरकारी धन को लूट रहे हैं, क्या सरकार उसे दंडित कर पा रही है? सवाल यह भी है कि निजी कंपनियों में घोटाले क्यों नहीं होते। निजी कंपनियों में काम करने वाले लोग बहुत जल्द अमीर नहीं बनते। जाहिर है कि प्रधानमंत्री जी को सब कुछ मालूम है लेकिन वे अनजान बने हुए है। तो फिर ऐसे अनजान व्‍यक्ति को अपने बारे में सोचना चाहिए कि उनकी नैतिकता क्या कहती है। जिस तरह मनमोहन सिंह काम करते दिख रहे हैं, ऐसे में कहा जा सकता है कि वे जाते-जाते इस कांग्रेस को सुता कर चले जाएंगे। पहले यही काम नरसिम्हा राव कर गए और अब मनमोहन सिंह करेंगे।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के निवासी हैं. पटना-दिल्ली समेत कई जगहों पर कई मीडिया हाउसों के साथ कार्यरत रहे. मिशनरी पत्रकारिता के पक्षधर अखिलेश अखिल से संपर्क [email protected]  के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...