एक दिन रात के डिनर के बाद लालू यादव वॉक पर निकले तो सीधा पासवान जी के लॉन में रूके। वहां हवा ज्यादा ठंडी
और सुकून दे रही थी। कहा- बस चले आये। सोचा तुम्हारे नाती से नहीं मिले। बेबी को आशीर्वाद भी दे देंगे। लालू यादव ऐंवे ही तो कुछ करते नहीं। मजाक भी करते हैं तो उसके पीछे पोलिटिकल मीनिंग छुपा होता है। और उस पर पासवान के घर पहुंचना। बिना फौरी अपॉइन्टमेंट के। रात में। जिगरी दोस्त से जिगर के दुश्मन बने पासवान के नाती को आशीर्वाद देने। ये सब कुछ बस ऐंवे ही तो नहीं हो सकता। लालू के इस लेट नाइट वॉक की भी मीनिंग होगी। है..क्या मीनिंग हो सकती है।
लालू जी को पासवान की याद क्यों आयी। जब 2004 में जीत के आये थे तब इन्ही पासवान को रेल की पटरी से डीरेल कर दिया था। गठबंधन राजनीति में अपना पाउंड ऑफ फ्लेश लेने में जरा भी नहीं हिचकिचाये। 2004 और 2005 के विधानसभा चुनावों में भी अपनी बदकही के आगे सबको चुप करा दिया। कभी कहते हैं मैं किंग हूं, कभी कहते हैं मैं किंगमेकर। आजकल तो हिंदुस्तान की बादशाहइयत के सपने देख रहे। बादशाह इन मेकिंग का टैग लिये लालूजी आपको ये शोभा नहीं देता कि यूं रात के अंधेरे में निकल कर गली कूचे घूमें। पासवान टाइप लोगों से मिलें। कतई नहीं। लेकिन अभी फिजा बदली हुयी है। लोगों से कब तक कटे रहेंगे। कहीं लोगों ने ही सपने तार तार कर दिये तो।
लेकिन लालू जी आपके सपने कौन मटियामेट कर सकता है। यूपीए के सभी पार्टनरों में आप ही सोनिया के ब्लूआइड व्वॉय हैं। मनमोहन सरकार के मनमोहन हैं। सबसे एफिशियंट मंत्री की ढपली भी पीटी। रेलवे के टर्नअराउंड का दावा किया। बर्थ बढ़वा दिये, डिब्बे और जुड़वा दिये। गरीबों के नाम पर गरीब रथ चलवा दिया। लेकिन एक्सिडेंट नहीं रूकवा पाये। खाने का स्टैडर्ड नहीं बढ़ा पाये। सोने की चादर आज भी मटमैली मिलती है। रिन वाइट नहीं। तकिये बदबू मारते हैं। टॉयलेट वैसे ही गंदे रहते हैं। ट्रेन वैसे ही लेट होती है, क्योंकि अब आपको माल गाड़ी आगे बढ़वानी है ताकि आपके मंत्रालय को मुनाफा मिलता रहे। पैसेंजर फैसिलिटि की ऐसी तैसी।
लेकिन दुनिया आपको इंडियन रेल के पहले सीईओ के तौर पर जानती है। तो फिर ऐसे एफिशियंट और ताकतवर सीईओ और बादशाह इन मेकिंग को अचानक पासवान जैसे जूनियर प्लेयर्स की याद कैसे आ गयी। आप ही नें तो उनको पिछले लोकसभा चुनाव में 8 सीटें दीं थीं। खुद 26 पर लड़े थे। आज पासवान के लॉन की हरियाली में ज्यादा ऑक्सीजन मिल रहा।
आपने तो दोस्तों से दोस्ती रखी कब थी। एक एक कर के सब दोस्त तो आपसे छिटक कर दूर होते गये। पासवान हों या शरद यादव। जार्ज हों या रंजन यादव। नरेंद्र् सिंह हों या नितीश कुमार। आप दोस्तों को भी भूले और गुरू को भी। जेपी आंदोलन के प्रोडक्टस में आप की भी गिनती होती रही। लेकिन गुरू को ही चूना लगा दिया। आप तो कहते हैं आप जेपी के मेन आदमी थे। लेकिन जेपी को भी नहीं मालूम होगा कि इमरजेंसी की उस दोपहर जब पटना में नीतीश, सुशील मोदी और तमाम ऐसे युवा नेताओं नें रैली निकाल कर इंदिरा सरकार की किलेबंदी करनी चाही तो आप उस रैली में से धीरे से कट लिये थे। और जा कर अपने भाई के घर सो गये थे। बाद में नितीश आपकों ढूंढ़ते हुये आते तो पता चला आप अपने लिये सरसों के तेल वाली मछली बनाने में लगे हैं।
आपको अब पासवान के साथ सटने की क्या जरूरत आ पड़ी। इस बार तो आप उनको और सीटें देने पर आमादा हैं। वो अलग बात है कि पासवान इस बार आपकी चाल का हर तोड़ आपके सामने फेंक कर गुगली पर गुगली मार रहे। आपको क्या अपने एमवाई कॉम्बिनेशन पर भरोसा नहीं रहा। या डर रहे ये कॉम्बिनेशन कहीं आपका पुराना दोस्त नितीश पूरी तरह न कब्जा कर ले।
कम से कम एम तो आपके साथ होने चाहिये। उनके वोट बैंक की खातिर तो आपने समस्तीपुर में हिडेन एजेंडा वाले आडवाणी का रथ रोका था। राजनीति में अपनी सेक्युलर इमेज बनायी थी। अख्लियत को बताया आप उनके रहनुमा हैं। अगले दस सालों तक वो आपसे छिटके भी नहीं। लेकिन उनके लिये उन दस सालों में आपने किया क्या। वो अपने लिये छोटा मोटा कारोबार सैटअप कर सकें उसके लिये आप जरूरी बिजली भी मुहैय्या नहीं करा पाये। मजहब का कार्ड खेलकर सेक्युलर इमेज तो प्रोजेक्ट की मगर उनके लिये नौकरी नहीं दिलवा पाये। जुलाहों की छोटे-मोटे गृह उद्दोगों को चौपट कर दिया। उन गांवो में जुलाहों के करघा की खटर-पटर की आवाजें आनी बंद हो गयीं क्योंकि वहां तक बिजली के खंभे लगाना आप भूल गये। लोग रोजी रोटी की तलाश में गांब और शहर क्या आपका सेक्युलर स्टेट ही छोड़कर जाने लगे। पसमंदा समाज के मुस्लिमों को तो आपके रहनुमाई की सबसे ज्यादा दरकार थी। आपने उन्हे भी वोट बैंक से ज्यादा कुछ
नहीं समझा। यही कारण है कि 2004 का विधानसभा चुनाव आते ये मुस्लिम भी समझ गये उन्हे आपने सत्ता में बने रहने के लिये यूज़ किया। और 2004 – 2005 के दो बैक-टू-बैक चुनावों में उन्होने आपको और आपकी राबड़ी को सत्ता से बेदखल कर दिया।
आपका जादू चलते और बिखरते 15 साल लगे। और इस दौरान बिहार ने बहुत कुछ खोया। मवेशियों ने अपना चारा तक। उस दौरान बिहार के अखबार में एक कार्टून छपा था। दो जानवर आपस में बात कर रहे कि आज क्या लंच करें। और दूर बैठे आप उनका लंच गपागप खा रहे थे। आप अपनी राजनीति के दायरे में इन्कलूड उन्ही को करना चाहते थे जिनको बहला फुसला कर आप सत्ता में बन रहें। लेकिन आपका मिशन इन्क्लूसिव पॉलिटिक्स नहीं था। डेवलप्मेंट में आपको कोई भरोसा नहीं था। आपका और राबड़ी जी को डेव्लपमेंट हो दरअसल ये आपका हिडेन एजेंडा था।
तो रेल के सीईओ साहव, पीएम बनने के सपने देखने वाले साहब, दोस्त को गच्चा देने वाले साहब आप आज पासवान की दहलीज पर नाक रगड़ रहे कि मान जाओ दोस्त, बिहार में तो बेघर हो चुकें हैं। लोकसभा चुनाव में इज्जत बचा लेना। चुनाव बाद कहीं दोबारा सरकार बनती नजर आई तो ताकत कम नहीं होनी चाहिये। वर्ना मोटा मंत्रालय कैसे मिलेगा। पीएम कैसे बनूंगा। इतना ताकतवर आदमी और ये हाल। कुछ लेते क्यों नहीं जनाब। दोस्तों से दोस्ती की दुआएं ही ले लो। लालूजी आप कहते हैं कि आडवाणी का पीएम बनने का सपना, सपना ही रह जायेगा। मगर जनता जनार्दन की गट फीलिंग का क्या करेंगे जो आपका भी हिडेन एजेंडा समझ गयी है।
लेखक प्रभात शुंगलू आईबीएन7 में एडिटर, स्पेशल एसाइनमेन्ट्स हैं। प्रभात से संपर्क करने के लिए आप उन्हें मेल [email protected] पर भेज सकते हैं।

