: मेरी विदेश डायरी 8 : दंगा कराने की साजिश रच रहे हैं विरोधी : वैसे तो उगांडा में प्रेसिडेंट का चुनाव हो चुका है और उम्मीद के अनुसार मुसोविनी एक बार फिर अगले पांच बरस के लिए चुन लिए गए हैं। उन्हें 68 फीसदी से ज्यादा वोट मिले और उनके प्रमुख विरोधी डा. बिसिजे को केवल 26 फीसदी। लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन विरोधी नेताओं को केवल 1 फीसदी या 0.6 फीसदी वोट मिले वे चार नेता एक मंच पर आकर इस पूरी चुनाव प्रक्रिया को नकार रहे हैं। इन चारों नेताओं के वोट प्रतिशत जोड़ भी दें तो वह 5 फीसदी भी नहीं बनता। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग, न्यायालय और उगांडा की पुलिस ने मिलकर मुसोविनी के पक्ष में काम किया और जोरदार गड़बड़ी की है।
जब से प्रेसिडेंट और सांसदों के चुनाव के लिए वोट डाले गए हैं तब से यानी 18 फरवरी से ही पूरे उगांडा में दहशत का माहौल है। स्थानीय लोग दंगे की आशंका से भयभीत होकर अपने अपने गांव चले गए हैं। अनेक चीनी और भारतीय मूल के लोग भी अपने-अपने देश चले गए हैं और बार-बार यहां की हालत के बारे में जानकारी चाहते हैं कि सबकुछ सामान्य हो तो वे अपने काम पर लौटें। अब इसे हम वर्तमान शासन की चुस्ती कहें या कुछ और पर यह सच है कि इस बार ऐसा इंतजाम किया गया कि देश भर में कोई बड़ी हिंसा नहीं हुई। हिंसा हुई तो जरूर पर उगांडा में जो विदेशी हैं उनपर कोई बड़ा हमला नहीं हुआ। यह जरुर है कि वे अपने-अपने घरों में नजरबंद से रहे। कंपाला समेत सभी बड़े शहरों में पुलिस और सेना के जवान बंदूकों और दंगा विरोधी दूसरे उपकरणों के साथ चौकस घूमते रहे। इंडियन एसोसिएशन ने पहले ही परिपत्र के माध्यम से सभी भारतीयों को कह रखा था कि वे अपने घरों में कम से कम 15 दिनों के लिए सभी जरुरी सामान इकट्ठा करके रख लें। हालत ऐसी थी कि मैं भी घर में नजरबंद रहा और अपने बड़े भाई अनिल सिन्हा से आखिरी समय में मिलने भारत नहीं ही जा सका।
पर जो हो, उगांडा में चुनाव होने के इतने दिनों बाद भी सबकुछ पूरी तरह सामान्य नहीं हो सका है। हारे हुए विरोधी दलों के नेता सामान्य होने भी नहीं दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि अब यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि मुसोविनी का विरोध करने वाले ये नेता खुलेआम लोकतंत्र का माखौल उड़ा रहे हैं। सबसे मजेदार बात है कि महामहिम मुसोविनी के प्रमुख विरोधी डा. बिसिजे ने भी कहा था कि वे कंपाला में मुसोविनी के विरोध में रैली करेंगे लेकिन मुसोविनी के एक ही बयान के बाद वे खामोश हो गए लगते हैं। जीतने के बाद मुसोविनी का सीधा और बेहद कड़ा बयान प्रेस को जारी किया गया। उन्होंने कहा कि जो भी इस लोकतंत्र का अपमान करेगा और देश की शांति भंग करेगा और दंगा भड़काने की कोशिश करेगा, उसे वे समोसे की तरह खा जाएंगे। डा. बिसिजे यह जरुर कहा कि उन्हें भी वर्तमान पुलिस और न्यायालय पर कोई भरोसा नहीं है, लेकिन वे दूसरे विरोधी नेताओं के अभियान में शामिल नहीं हैं। और यहीं से विरोधी दलों के नेताओं की एकता टूट गई।
9 मार्च को लगभग 5 फीसदी वोट पाने वाले तमाम नेताओं ने कंपाला में रैली का आह्वान किया और कहा कि इस रैली को कोई रोक नहीं सकता और उगांडा की जनता वैसे तो शांत रहेगी पर अगर पुलिस ने ज्यादती की तो उसका सीधा विरोध किया जाएगा। मुसोविनी की ओर से फिर जवाब आया कि अगर किसी ने कहीं भी शांति भंग की तो परिणाम भुगतने को तैयार रहे। और अगर पुलिस के एक बड़े अधिकारी के आधिकारिक बयान को सच मानें तो 9 मार्च को पूरे कंपाला में जोरदार दंगे की तैयारी थी। पुलिस अधिकारी ने विरोधी दलों के यूथ ब्रिगेड के एक नेता पीटर किराबिरा और एक अन्य नेता एरियस कौमा के एक बयान का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने उगांडा में रहने वाले भारतीयों, चीनियों और सरकार का समर्थन करने वाले जजों को मार देने की योजना बनाई है। उन्हें आशंका है कि ये लोग मुसोविनी को हर तरह से मदद करते हैं। पुलिस ने बाद में ऐसे 21 लोगों को हिरासत में भी लिया है। महामहिम मुसोविनी ने कहा कि उनके विरोधी जनता में गलमफहमियां फैला रहे हैं।
9 मार्च को विरोधियों ने जो रैली की उसमें आम जनता का कोई सक्रिय सहयोग दिखा भी नहीं। इसके बावजूद उन्होंने पुराने कंपाला में दंगा करने का पूरा प्रयास किया पर पुलिस ने किसी को टिकने नहीं दिया। इसका मतलब है कि अभी भी टकराव का माहौल बना हुआ है और यही हालत अगले कुछ दिनों तक जारी रहेगी।
लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहेंगे. अंचल सिन्हा से सम्पर्क उनके फोन नंबर +256759476858 या ई-मेल – [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

