स्त्री वामा है, अर्धांगिनी है, श्रेष्ठा है। वह कमला भी है शक्ति भी है और दुर्गा भी है, वह कुलटा, हरजाई और भोग्या भी है। ये सारे नाम समय-समय पर उसे पुरुषों ने दिये। जब जैसा स्वार्थ जगा तब वैसी पुकार लगायी। कभी उसके सौंदर्य और शक्ति को सराहा तो कभी अपनी गलतियां छिपाने के लिए उसे दुत्कारा, लांछित भी किया। अपनी भीरुता, कापुरुषता के क्षणों में स्त्री की जरूरत पड़ी तो उसे दुर्गा कहा, अपने अहंकार को छिपाकर सामाजिक स्वीकृति के विस्तार की आकांक्षा हुई तो वामा कहा। लगाम अपने हाथ में रहे, लगातार ऐसी कोशिश की। वह भोग्या और जननी के रुप में स्वीकार की गयी पर जब कभी उसने अपने सपने की, अपनी आकांक्षाओं की बात की तो उसे दुत्कारने, दंडित करने में पुरुष को तनिक देर नहीं लगी।
आदिम औरत फिर भी स्वतंत्र थी, शक्तिशाली थी, पुरुष की तरह शिकार कर सकती थी, प्रत्यंचा साध सकती थी, पत्थर उठा सकती थी, भाला फेंक सकती थी पर जैसे ही वह जंगल से बाहर आयी, उसे कैद कर लिया गया। वह वेद नहीं पढ़ सकती थी, वह विचार नहीं कर सकती थी, तर्क नहीं कर सकती थी। जिन स्त्रियों ने कभी कोशिश की वे यातना-गृह में डाल दी गयीं। उसे केवल मादा बनाकर रखा गया। उसे योनि से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दी गयी। वह पैदा होती रही मनुष्य के रुप में और स्त्री बना दी जाती रही। वह स्त्री, जिसके पास श्रम तो है, जननांग तो है पर मेधा नहीं है, बुद्धि नहीं है, विचार नहीं है, असहमति नहीं, अस्वीकार नहीं है, जिसके पास सपने नहीं हैं, उड़ान नहीं है, अलग रास्ते पर चल सकने का साहस नहीं है। जीवन की यह उदास और अप्रिय गूंज साहित्य में भी दिखती है। कुछ आदर्शवादी रचनाकारों ने भले नारी को केवल श्रद्धा के रूप में देखने की कोशिश की हो, उन्हें पुरुष को राह दिखाने वाली प्रेरणा के रुप में देखने की कोशिश की हो पर स्त्री के जीवन के असल अंधेरे इस आदर्श की चादर में छिपाये नहीं जा सके।
महादेवी ने स्त्रियों को शापमय वर कहना पसंद किया, शून्य मेरा जन्म था, अवसान है मेरा सबेरा, प्राण आकुल के लिए संगी मिला केवल अंधेरा…किसी का दीप निष्ठुर हूं। प्रकृति ने स्त्री को स्वभाव से सहज, सुंदर और कोमल बनाया, उसे योनि नहीं गर्भ की प्रतिष्ठा दी, उसे रचना की शक्ति दी लेकिन बहुत कम लोग सोच पाते हैं कि रचना की शक्ति ही ध्वंस की शक्ति भी है। वह गर्भरुपा होकर रचती है तो शक्तिरुपा होकर तोड़ भी सकती है, नष्ट भी कर सकती है। रचना भी या तो ध्वंस की नींव पर खड़ी होती है या ध्वंस की ताकत से लैस होती है। सारी स्त्रियों ने नहीं लेकिन कुछ स्त्रियों ने अपनी शक्ति का समय-समय पर परिचय दिया है। यह अलग बात है कि बहुसंख्य स्त्रियां अब भी यंत्रणा, शोषण और जुल्म के तहखाने से बाहर नहीं निकल पायी हैं। रघुवीर सहाय का एक शब्द चित्र उनकी नियति को बयान करता है, पढ़िए गीता/ बनिए सीता/ फिर इन सब में लगा पलीता/ किसी मूर्ख की हो परिणीता/ निज घरबार बसाइये/ होय कंटीली/ आंखें गीली/ लकड़ी सीली, तबियत ढीली/ घर की सबसे बड़ी पतीली/ भरकर भात पसाइये। पर अब धीरे-धीरे वह समय जा रहा है, स्त्रियां उठ रही हैं, बाहर निकल रही हैं, बोल रही हैं, पढ़ रही हैं, तर्क कर रही हैं। उदय प्रकाश की डरती हुई स्त्री अब भी है,लफंगे भी हैं, स्त्री नहाने से डर रही थी/ गुस्लखाने में कैमरे लगे थे और नल की टोंटी में/ कार लिए हुए कोई लफंगा हंस रहा था।
ऐसा कहना ठीक नहीं होगा कि स्त्री अब डरती नहीं, उसे मनुष्य होने का संपूर्ण हक मिल गया है लेकिन इतना सच है कि बिस्तरे और किचेन की गहरी नींद से वह जग गयी है और अपने होने के बारे में सोचने लगी है। कमोबेश उसे रास्ते चुनने की स्वतंत्रता भी है। खाप पंचायतों, झूठे सम्मान की नासमझियों, धार्मिक पाखंड और जाहिल कठमुल्लापन की कोख से निकले फरमान उसे घायल जरूर कर रहे हैं लेकिन बड़ी बात यह है कि वह इससे पराजित होने से इनकार करने लगी है। बेशक जहां भी अवसर मिला है, उसने अपनी मेधा, प्रतिभा, योग्यता और क्षमता का परिचय दिया है। इतना ही नहीं वह अब अपने अवसरों को पहचानने और कई बार उन्हें छीन लेने में भी संकोच नहीं करती।
उसने केवल मादा होने की छवि से बाहर निकलकर मनुष्य के रुप में पुरुष के बराबर खड़े होने की हिम्मत जुटा ली है। उसे पुरुष की हार नहीं, उसके स्वीकार की जरूरत है। उसकी प्रतिभा के स्वीकार की। जब तक पुरुष का नकली दंभ, उसका झूठा अहंकार नहीं जाता, खतरे तो रहेंगे ही। बाबा नागार्जुन ने तो गंभीर स्त्री विमर्श की शुरुआत से बहुत पहले पाषाणी की शापमुक्ति की उदात्त कल्पना की थी, उसे प्राणवंत देखा था। अब यह स्त्रियों पर निर्भर है कि वे शापित पाषाण का जीवन चुनती हैं या प्राणवान रहना चाहती हैं। उन्हें खुद अपने रास्ते बनाने होंगे, स्त्रीत्व को परिभाषित करना होगा। वे मु्क्त हैं वंदिनी, गृहिणी, जननी, भोग्या और प्रतिभा, योग्या की भूमिकाओं में से कोई भी चुनने को।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

