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उठाने होंगे अभिव्यक्ति के खतरे

बंशीधर मिश्र अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे/ तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब/ पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार… । गजानन माधव मुक्तिबोध की ये पंक्तियां कई दशक पहले जिन संदर्भों में लिखी गई थीं, भले वे बदल गए हों पर हालात बिलकुल नहीं बदले। भले ही भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता हो पर असल मायने में यह आजादी किताबी सच बनकर रह गई है। संसद से लेकर सड़क तक सच बोलने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष तमाम पाबंदियां और अनगिनत खतरे हैं। सच बोलना और लिखना आज भी सलीब पर चढ़ने जैसा है। अमूर्त और अदृश्य व्यवस्था पर पोथियां लिखने वाला कोई व्यक्ति जब गली के किसी गुंडे को टोक देता है, तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है। मंत्री के खिलाफ आवाज उठाने वाले की जुबान खींच ली जाती है और नौकरशाह के खिलाफ कुछ लिखने-कहने वाले को जेल में ठूंस दिया जाता है।

बंशीधर मिश्र

बंशीधर मिश्र अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे/ तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब/ पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार… । गजानन माधव मुक्तिबोध की ये पंक्तियां कई दशक पहले जिन संदर्भों में लिखी गई थीं, भले वे बदल गए हों पर हालात बिलकुल नहीं बदले। भले ही भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता हो पर असल मायने में यह आजादी किताबी सच बनकर रह गई है। संसद से लेकर सड़क तक सच बोलने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष तमाम पाबंदियां और अनगिनत खतरे हैं। सच बोलना और लिखना आज भी सलीब पर चढ़ने जैसा है। अमूर्त और अदृश्य व्यवस्था पर पोथियां लिखने वाला कोई व्यक्ति जब गली के किसी गुंडे को टोक देता है, तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है। मंत्री के खिलाफ आवाज उठाने वाले की जुबान खींच ली जाती है और नौकरशाह के खिलाफ कुछ लिखने-कहने वाले को जेल में ठूंस दिया जाता है।

भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे विशाल लोकतंत्र माना जाता है। हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था शेर और मेमने को एक साथ रहने, विचरने, आजीविका के साधन ढूंढ़ने की छूट देती है। यहां पर विचारों की आजादी है। आप कुछ भी सोच सकते हैं। मसलन, एक मजदूर को भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने का अधिकार है। उसके भी मत की उतनी ही कीमत है जितनी किसी भी खरबपति उद्योगपति, बड़े नौकरशाह और देश के राष्‍ट्रपति एवं प्रधानमंत्री की होती है। उसे भी अंबानी, टाटा और बिड़ला बनने का संवैधानिक अधिकार है। उसे मुंगेरी लाल के हसीन सपने तो देखने का अधिकार है पर गारंटी किसी भी चीज की नहीं है। वह शाम के वक्त की रोटी किस तरह जुटाएगा, सुबह के वक्त किसी शहर के लेबर चौराहे पर जब वह खड़ा होगा, तो उसके श्रम को खरीदने कोई आएगा या नहीं, इस बात की देश की व्यवस्था के पास कोई गारंटी नहीं।

हमारे देश में कोई भी अकिंचन, मजदूर और किसान भूख से दम तोड़ने की नैसर्गिक आजादी रखता है पर उसे आत्महत्या का अधिकार कदापि नहीं। यह ढोंग भारत ही नहीं, दुनिया के उन तमाम देशों में बदस्तूर कायम है जो अपने को लोकतंत्र और मानवधिकारों का अलमबरदार कहते हैं। अमेरिका में सभी को सब कुछ करने की आजादी है। उसी आजादी का नतीजा है कि वहां बलात्कार और हत्या की दर दुनिया में सर्वाधिक है। पर आधुनिक विश्व में आर्थिक व पहिया का चक्का घुमाने वाले पेट्रोलियम पदार्थों का सबसे बड़ा सौदागर भी वही है। जो जब चाहें जहां चाहें युद्ध की विभीषिका छेड़ दें। दशकों तक चला वियतनाम युद्ध, खाड़ी युद्ध और इराक की तबाही इसी का नतीजा थी।

दरअसल, यह हर पूंजीवादी व्यवस्था की अवश्यंभावी बुराई है। बल्कि यूं कहें कि यह उसका उपोत्पाद है। जान पड़ता है कि लोकतंत्र पूंजीवाद के फलने फूलने की सबसे मुफीद राजनीतिक व्यवस्था है। इसीलिए आर्थिक विषमताओं का ज्वार यहां देखने को मिलता है। भारत में हर साल लाखों लोग भूख से दम तोड़ देते हैं पर दुनिया के सौ सर्वाधिक धनी लोगों में कई भारतीय हैं। अंबानी और टाटा दुनिया के तमाम देशों को खरीद लेने की ताकत रखते हैं।

काल मार्क्स के शब्दों में पूंजी चुराया हुआ श्रम है। श्रम की चोरी पर पूंजी का साम्राज्य खड़ा होता है। जब इसके साम्राज्य को कहीं से भी चुनौती मिलती दिखाई पड़ती है, तो पूंजीपति हमलावर हो उठता है। इराक के पूर्व राष्‍ट्रपति सद्दाम हुसैन और अमेरिका के बीच सिर्फ एक बात का झगड़ा था। सद्दाम का तर्क था कि तेल हम पैदा करें,  तो फिर उसका दाम अमेरिका क्यों तय करेगा? जार्ज बुश दुनिया की उन पांच बड़ी तेल कम्पनियों के मालिक हैं जो कि पेट्रोलियम पदार्थों पर एकाधिकार रखती हैं। सद्दाम उनकी सत्ता को चुनौती दे रहे थे। इराक पर हमले का मात्र यही एक कारण था। एक समूची सम्यता तबाह कर दी गई। लोकतंत्र और मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले देश ने जिस बर्बरता, हैवानियत और दादागीरी का परिचय दिया वह इतिहास में बेमिसाल है। इराकी युद्ध बंदियों के साथ कुत्तों से भी बदतर सुलूक किया गया। यह पूंजीवाद का भयावह साम्राज्यवादी चेहरा है।

भारत में मुंबई शहर में एक साहसी पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या कर दी गई। डे ने मुंबई के तेल माफियाओं पर कई सनसनीखेज खबरें लिखी थीं। उन्होंने अंडरवर्ल्ड की तिलस्मी दुनिया पर भी दो किताबें लिखी थीं। पूंजीपति एक सीमा तक चुनौती को खामोश झेलता है। इसके बाद वह पूंजी की ताकत के बल पर उस चुनौती को जड़ से उखाड़ देता है। कानून बिकाऊ है। सरकारें उनकी सरपरस्त होती हैं। संविधान महज छलावा है। पूरे देश में जेडे की हत्या के विरोध में पत्रकारों और समाजसेवियों की आवाजें मुखर हो रही हैं। पर सरकार और व्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? जंगल में मेमने की आजादी का कोई मतलब नहीं। शेर का निवाला बनना उसकी नियति है। लोकतंत्र में जंगलराज होता है। यहां बड़ी पूंजी और छोटी पूंजी को निगल जाती है। वैश्विक बाजार के हमले में करोड़ों दस्तकार, शिल्पकार इतिहास के पन्नों में दफन हो गए। यहां मत्सय कानून चलता है। यानी बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। क्योंकि वही उसका आहार है। वह मांसाहारी होती है। सच और सच का झंडा उठाने वालों की स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था में मेमने जैसी हो गई है। यही तो युवा संत निगमानंद का हुआ।

साम्यवाद और समाजवादी व्यवस्थाओं में ऐसा नहीं होता। वहां अभिव्यक्ति की आजादी नहीं। उत्पादन को निजी हाथों में रखने की इजाजत नहीं होती। जो कुछ भी है, वह राज्य का है। हर हाथ को काम यानी सभी की आजीविका की गारंटी राज्य की जिम्मेदारी होती है। हर काम राज्य के लिए किया जाता है। इसीलिए हर किसी को उसकी नैसर्गिक क्षमता गुणों और जरूरतों के हिसाब से हक मिलता है। उत्पादन और उसके लाभांश में समान भागीदारी होती है। साम्यवाद का केंद्र आर्थिक समानता और आर्थिक आजादी है जबकि लोकतंत्र की बुनियाद व्यक्ति की आजादी पर गढ़ी जाती है। सैद्धांतिक दृष्टि से दोनों कहीं से एक दूसरे के विपर्यय नहीं लगते पर व्यावहारिक रूप में दोनों कभी एक दूसरे से मिल नहीं पाते। क्योंकि सिर्फ एक व्यक्ति की असीमित आजादी की चाह पूरी धरती के संसाधनों को अपने में समेट लेना चाहती है। मनुष्य जब अपनी इच्छाओं पर लगाम नहीं लगा पाता, तो वह निरंकुश तानाशाह बन जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में पूंजी के स्वामी प्राय: ऐसे हो जाया करते हैं। पूंजी की ताकत अंततोगत्वा राज्य की ताकत पर भारी पड़ने लगती है। बाजार सरकार पर भारी पड़ने लगता है। सरकार भी बाजार की भाषा बोलती है।

आज स्थिति बहुत जटिल हो चुकी है। व्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार पूंजी के हिंसक जाल में फंसकर दम तोड़ रहा है। सरकारें मनुष्य और समाज की नहीं, बाजार और पूंजी की भाषा बोलती नजर आ रही हैं। चेहरा बचाने के लिए सरकार कहती है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनेगा। पर पत्रकार ही क्यों, सच कहने वाले हर नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं? पर सच तो यह है कि सरकार पूंजी की गुलाम है। व्यवस्था के भीतर सरकार, बाजार, पूंजी, माफिया नेता व अफसरों का गठजोड़ बन गया है। यही गठजोड़ व्यवस्था का नियामक बन गया है। इसको चुनौती देना सूली पर चढ़ने जैसा है। पर जे डे जैसे कुछ तो हैं, जो बिना डरे सूली पर चढ़ते रहेंगे।

लेखक बंशीधर मिश्र वरिष्‍ठ पत्रकार और डीएलए, झांसी के संपादक हैं. ये बुंदेलखंड विश्‍वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के निदेशक और विभागाध्‍यक्ष भी रह चुके हैं.

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