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उत्तराखंड में मंत्री पद की आस लगाये विधायकों का इंतजार कब होगा खत्म!

उत्तराखंड में मंत्री पद की आस लगाये विधायकों सब्र जवाब देने लगा है। विपरीत हालातों में पार्टी के साथ खडा रहने वाले विधायकों को उम्मीद थी कि सरकार वहाली के बाद उनकी ख्वाइश पूरी होगी लेकिन हरीश रावत के सत्ता की कमान संभालने के बाद भी कैबिनेट में लम्बे अर्से से खाली पडी दो सीटों पर विधायकों की ताजपोशी नहीं हो पाई है। हालांकि रावत के मुख्यमंत्री की कमान संभालने के बाद से ही कैबिनेट में नये चेहरों को शामिल करने की बात हवा में तैरती रही लेकिन सियासी मजबूरी के चलते अभी तक ऐसा संभव नहीं हो पाया है।

उत्तराखंड में मंत्री पद की आस लगाये विधायकों सब्र जवाब देने लगा है। विपरीत हालातों में पार्टी के साथ खडा रहने वाले विधायकों को उम्मीद थी कि सरकार वहाली के बाद उनकी ख्वाइश पूरी होगी लेकिन हरीश रावत के सत्ता की कमान संभालने के बाद भी कैबिनेट में लम्बे अर्से से खाली पडी दो सीटों पर विधायकों की ताजपोशी नहीं हो पाई है। हालांकि रावत के मुख्यमंत्री की कमान संभालने के बाद से ही कैबिनेट में नये चेहरों को शामिल करने की बात हवा में तैरती रही लेकिन सियासी मजबूरी के चलते अभी तक ऐसा संभव नहीं हो पाया है।

पार्टी में मची उथल पुथल के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं। यही कारण है कि वो खाली पडी कैबिनेट की दो सीटों पर किसी विधायक की ताजपोशी नहीं कर पाये हैं। दरअसल आधा दर्जन से अधिक वरिष्ठ विधायक मंत्री बनने के सपने संजाये हुए हैं। दस विधायकों के पार्टी से बगावत करने के बाद मुख्यमंत्री पर दबाव है कि कैबिनेट की दो खाली पडी सीटों पर पार्टी विधायकों को बैठाया जाय। पार्टी संगठन भी कई बार सार्वजनिक तौर पर इस बात को कह चुका हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किषोर उपाध्याय तो कई बार पीडीएफ कोटे को कम करने की सलाह दे चुके हैं, लेकिन राजनीति की गहरी समझ रखने वाले हरीश रावत पीडीएफ को शायद ही छेडें।

मुख्यमंत्री के सामने सबसे बडी मजबूरी एक अनार सौ बीमार वाली है। आधा दर्जन विधायकों में से किसी दो का चयन करना परेशानी का सबब बना हुआ है। कठिन दौर में रावत के साथ खडे इन चेहरों को साइड लाइन करना आसन नहीं है। मुख्यमंत्री को न केवल अपना कार्यकाल पूरा करना है बल्कि छह माह बाद प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में भी ताल ठोकनी है। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के बयान से लगता है कि उनकी नजर अभी कांगेस के अंदर संभावित फूट पर टिकी है। शायद ये भी एक अहम कारण है कि कांग्रेस आलाकमान व मुख्यमंत्री कैबिनेट विस्तार को तव्वजो नहीं दे रहे हैं। इ्रसके अलावा कांग्रेस थिंक टैंक अलग अलग संभावनाओं पर भी मंथन कर रहा है। इसमें से रावत कैबिनेट के एक दो कांग्रेसी चेहरों को बदलकर गढवाल व कुमाऊं से दो विधायकों एडजेस्ट करना व दो खाली पडी सीटों पर दो ओर विधायकों को मत्री पद देना। इस तरह से कुल चार विधायकों को मैनेज किया जा सकता है। या फिर एक अन्य विकल्प एक दो माह इसी तरह खींच कर विधानसभा भंग करना हो सकता है।

इधर चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसके लिए 18 जुलाई से दिल्ली में दो दिन की बैठक बुलाई गई है। इन राज्यों में फरवरी से पहले चुनाव होने हैं। जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने में उनमें उत्तराखंड भी है। ऐसे में इस बात के ज्यादा आसार  हैं कि कांग्रेस आलाकमान कैबिनेट विस्तार के मुददे को तरजीह न दे।

ये हैं मंत्री पद के दावेदार
फलोर टेस्ट में कांग्रेस का दामन थामने वाले व कांग्रेसी रणनीति को धरातल पर उतारने वाले कांग्रेसी विधायकों को दो महीने से अधिक का समय गुजर जाने के बावजूद कैबिनेट में जगह नहीं मिल पाई है। हालांकि हरीश रावत के सदन में विश्वास मत हासिल करने के बाद इस बात की पूरी संभावना थी कि संकट के दौर में कांग्रेस के साथ खडे कुछ विधायकों को मत्री पद से नवाजा जा सकता है लेकिन तब राज्य सभा चुनाव तक मसले को टाल दिया गया था। लेकिन 11 जून को राज्यसभा चुनाव होने के बाद भी अभी तक कैबिनेट विस्तार न होने से पद के दावेदारों में बैचेनी है। मंत्री पद की दौड में फ्लोर मेनेजमेन्ट में अहम किरदार निभाने वाले नव प्रभात, वरिष्ठ नेता हीरा सिंह, बदरीनाथ के विधायक व कभी सतपाल महाराज के करीबी रहे राजेन्द्र भंडारी, वसपा कोटे से मंत्री रहे सुरेन्द्र राकेश की पत्नी ममता राकेश, डा जीत राम, कुमाऊं से मयूख महर के नाम प्रमुख हैं।

बृजेश सती, देहरादून
संपर्क- 9412032437 , 8006505818

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