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उत्‍तराखंड बीजेपी में बगावत का बिगुल

: विजन 2020 पत्रिका ने किया खुलासा : उत्तराखण्ड में विधनसभा चुनाव की आधिका‍रिक घोषणा भले ही अब तक नहीं हुई हो, लेकिन कांग्रेस-भाजपा तथा क्षेत्रीय ताकतों की तैयारियां बता रही है कि विधान सभा चुनावों के लिए उन्होंने कसरत शुरू कर दी है। कांग्रेस जहां भाजपा को सत्ता से बेदखल करने को आतुर है तो छोटी ताकतें मुन्ना सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा तथा कांग्रेस को सत्ता के नजदीक भी फटकने नहीं देना चाहती। तीसरे मोर्चे की संभावना दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए नासूर बन सकती है। सत्ता में गुटबाजी को लेकर भले ही कांग्रेस बदनाम है, लेकिन उत्तराखण्ड की सियासत में यह पहला मौका है जब गुटबाजी के मामले में भाजपा ने कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इतना पीछे कि गुटबाजी ने अब बगावत का रूप ले लिया है। हैरत वाली बात यह है कि बगावत की यह गंध पार्टी की प्रथम पंक्ति के नेताओं से लेकर विलेज कैड़र तक है।

: विजन 2020 पत्रिका ने किया खुलासा : उत्तराखण्ड में विधनसभा चुनाव की आधिका‍रिक घोषणा भले ही अब तक नहीं हुई हो, लेकिन कांग्रेस-भाजपा तथा क्षेत्रीय ताकतों की तैयारियां बता रही है कि विधान सभा चुनावों के लिए उन्होंने कसरत शुरू कर दी है। कांग्रेस जहां भाजपा को सत्ता से बेदखल करने को आतुर है तो छोटी ताकतें मुन्ना सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा तथा कांग्रेस को सत्ता के नजदीक भी फटकने नहीं देना चाहती। तीसरे मोर्चे की संभावना दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए नासूर बन सकती है। सत्ता में गुटबाजी को लेकर भले ही कांग्रेस बदनाम है, लेकिन उत्तराखण्ड की सियासत में यह पहला मौका है जब गुटबाजी के मामले में भाजपा ने कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इतना पीछे कि गुटबाजी ने अब बगावत का रूप ले लिया है। हैरत वाली बात यह है कि बगावत की यह गंध पार्टी की प्रथम पंक्ति के नेताओं से लेकर विलेज कैड़र तक है।

आश्चर्य नहीं करना चाहिए लेकिन सूत्रों के मुताबिक टिकट बंटवारे के बाद राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री भी बगावत के इस खेल में खुलकर सामने आ सकते हैं। पिफलहाल बगावत का झण्डा जिन नेताओं ने थाम रखा है, उनमें पहला नाम भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा अंतरिम सरकार में मंत्री रह चुके मोहन सिंह रावत, ‘गांववासी’ का है। गांववासी भाजपा के उन नेताओं में रहे हैं जिन्होंने उत्तराखण्ड के पहाड़ी जनपदों में भाजपा को खड़ा किया। गांववासी पहले बीसी खंडूड़ी तथा अब ‘निशंक’ सरकार में भी उपेक्षित रहे हैं। उपेक्षा का यही दंश गांववासी को बगावत के रास्ते पर ले जा रहा है। गांववासी कई सार्वजनिक मंचों पर अपनी ही सरकार के मुखियाओं का खुलकर विरोध कर चुके हैं। मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’ अगला चुनाव श्रीनगर विधानसभा से लड़ने की तैयारी करने में जुटे हुये हैं, लेकिन वहां परेशानी यह है कि इस सीट से मुख्यमंत्री की पुख्ता दावेदारी है। ऐसे में गांववासी जानते हैं कि इस सीट से अगर चुनाव लड़ना है तो उनके पास बगावत ही एकमात्रा रास्ता बचता है।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक कई बार मंत्री रह चुके भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा विधायक केदार सिंह फोनिया भी बगावत करने को तैयार बैठे हैं। फोनिया भी गांववासी की भांति उपेक्षा के शिकार हैं। वरिष्ठ विधायक होने के बावजूद फोनिया को न तो खंडूड़ी मंत्रिमंडल में जगह मिली और न हीं उन्हें ‘निशंक’ कैबिनेट मे शामिल किया गया। ताजा हालात यह है कि भाजपा ने उनकी सीट से ‘निशंक’ कैबिनेट के सदस्य राजेन्द्र भण्डारी को तैयारी करने का इशारा भी कर दिया है। फोनिया से जुड़े सूत्रों के मुताबिक यदि उनका टिकट काटा गया तो वह बद्रीनाथ सीट से बागी प्रत्याशी के तौर पर चुनावी दंगल में ताल ठोकेंगे। फोनिया का नाम भाजपा के उन नेताओं में शुमार है, जिन्होंने चमोली और रूद्रप्रयाग जिलों में भाजपा का आधार तैयार किया था। निश्चित तौर पर फोनिया की बगावत का बुरा असर भाजपा पर न केवल बद्रीनाथ सीट पर पड़ेगा बल्कि चमोली तथा रूद्रप्रयाग जनपदों में भी पार्टी को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।

बगावती टीम के तीसरे महत्वपूर्ण नेता के तौर पर कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुये पूर्व मंत्री तथा सांसद टीपीएस रावत का नाम लिया जा रहा है। चर्चा है कि टीपीएस भी अपनी उपेक्षा से इन दिनों खासे आहत हैं। राजनीतिक समीकरण भी टीपीएस पर फिट नहीं बैठ रहा है। धुमाकोट विधनसभा पहले ही भाजपा की झोली में डाल दी थी। वहां अब उनके लिए जगह नहीं बची है। भविष्य में संसद पंहुचने की उनकी संभावनाएं भी अब क्षीण हो गई हैं, क्योंकि पौड़ी लोकसभा सीट से भविष्य में पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी ही दावेदार होंगे। यह खंडूड़ी की परम्परागत सीट है। ऐसे में टीपीएस रावत की छटपटाहट जायज भी है। टीपीएस राजनैतिक तौर पर बेहद महत्वाकांक्षी नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं। मसलन कांग्रेस के नेता सतपाल महाराज उन्हें राजनीति में लेकर आये थे। सतपाल की राजनीतिक जमीन में लहलहा रही वोटों की पफसल को काटकर ही टीपीएस दो बार विधायक बने। महाराज की सिपफारिश पर उन्हें कांग्रेस के टिकट से लेकर तिवारी सरकार में पर्यटन तथा आबकारी जैसे भारी-भरकम विभाग दिये गये थे, लेकिन कांग्रेस के सत्ता से बाहर होते ही टीपीएस भी कांग्रेस से दूर हो गये। उनका राजनीतिक लालच उन्हें भाजपा में ले गया। अब भाजपा द्वारा उनसे किनारा करने के बाद उनके बगावती होने की चर्चायें यकीन में बदलने लगी हैं।

जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि बगावत की इस जमीन पर दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम भी सामने आने की चर्चायें हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब आलाकमान ‘निशंक’ को नेतृत्व सौंपकर उनकी ताकत को कम करेगा। मसलन उनके समर्थकों को टिकट न दिये जाने की सूरत में वह पार्टी के खिलापफ मोर्चा खोल सकते हैं। नये परिसीमन के कारण ज्यादातर विधायकों की सीटें खत्म या आरक्षित हो जाने के कारण दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को टिकट बंटवारे में अपनी उपेक्षा झेलनी पड़ सकती है। इन नेताओं के साथ-साथ मौजूदा कई विधायक भी पार्टी को अलविदा कह सकते हैं। जिनमें पहला नाम सहसपुर के विधायक राजकुमार का है। भाजपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक भाजपा उत्तरकाशी जनपद की पुरोला सीट से अपने पूर्व विधायक मालचंद को टिकट देना चाह रही है। जबकि मालचंद को अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी निष्काषित कर चुकी है। इस सीट पर सहसपुर के विधायक राजकुमार लम्बे समय से तैयारी कर रहे हैं। राजकुमार की सीट सामान्य हो जाने के कारण उन्हें पुरोला का रूख करना पड़ रहा है। यहां पार्टी मालचंद को टिकट देती है तो निश्चित तौर पर वहां राजकुमार बागी प्रत्याशी के तौर पर ताल ठोंकते नज़र आ सकते हैं। राजकुमार की यह बगावत पुरोला के अलावा सहसपुर में भी भाजपा के लिए संकट बन सकती है।

उत्तरकाशी की गंगोत्री विधानसभा सीट पर वर्तमान विधयक गोपाल रावत का टिकट काटे जाने की चर्चायें भी इन दिनों आम है। इस सीट पर चारधम विकास परिषद के अध्यक्ष सूरतराम नौटियाल को टिकट दिये जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है। ऐसे में पुराने कांग्रेसी रह चुके गोपाल रावत भी बगावती तेवरों के साथ मैदान में उतर सकते हैं। यमुनोत्री विधनसभा में चर्चा है कि मुख्यमंत्री यहां अपने निजी सचिव मनवीर सिंह चौहान को टिकट दिलाने की फिराक में हैं। यदि ऐसा हुआ तो इस सीट पर भाजपा की सभी इकाइयां बगावत कर सकती हैं। टिहरी गढ़वाल की नरेन्द्रनगर सीट पर आदित्यराम कोठारी, ज्योति गैरोला तथा प्रदेश उपाध्यक्ष लाखीराम जोशी दावेदार हैं। यहां भी बगावत तथा भीतरघात की प्रबल संभावनायें है। धनोल्टी सीट पर भाजपा के आधा दर्जन नेता दावेदार है। यहां खेल परिषद् के अध्यक्ष नारायण सिंह राणा को प्रत्याशी बनाया जा सकता है। राणा भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के संबन्धी हैं। राणा को टिकट मिलने की स्थिति में इस सीट पर पूर्व ब्लॉक प्रमुख व भाजपा नेता महाबीर सिंह रांगड़ बागी प्रत्याशी हो सकते हैं। जनपद की अन्य सीटों पर भी बगावत की बदबू आने लगी है। देहरादून जनपद मे तो अभी से ही बगावत की बदबू आने लगी है।

मसूरी सीट पर गणेश जोशी तथा रविन्द्र जुगरान भी दावेदार है तो धर्मपुर विधानसभा सीट पर भाजपा में बगावत तय है। व्यापारी नेता उमेश अग्रवाल यहां टिकट के दावेदार हैं तो मेयर बिनोद चमोली भी हकदार हैं। इनके अलावा नरेश बंसल, प्रकाश सुमन ध्‍यानी भी इस सीट पर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हुये हैं। इस सीट पर भी बगावत के बादल मंडरा रहे हैं। विकासनगर सीट पर मौजूदा विधायक कुलदीप कुमार का टिकट खतरे में होने के कारण वह भी बगावत कर सकते हैं। राजपुर विधानसभा सीट पर भाजपा खेलमंत्री को उतारने की फिराक में है, लेकिन वहां चमन लाल वाल्मीकि उनका खेल बिगाड़ने के लिये तैयार बैठे हुये हैं। कुमांऊ मण्डल में भी भाजपा का यही हाल है। यहां कोश्यारी समर्थकों के टिकट काटना आसान नहीं है, ऐसे में कोश्यारी विरोधी वहां एकजुट होकर पार्टी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूकेंगे। खुद कोश्यारी की परंपरागत सीट कपकोट से ही बगावत का धुंआ उठ सकता है। यहां मौजूदा विधायक शेर सिंह गड़िया का टिकट कटा तो वह बबाल काट सकते हैं। कांड़ा विधानसभा सीट खत्म हो जाने के कारण इस सीट पर कैबिनेट मंत्री बलवंत सिंह भोर्याल दावा ठोंक रहे हैं।

लेखक अमरेंद्र सिंह विष्‍ट स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. उन्‍होंने यह लेख विजन2020 के लिए लिखा है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित.

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