जब राजनेताओं और नौकरशाह की जुगलबंदी अंतरंग हो जाती है तो नौकरशाही का बेखौफ हो जाना लाजमी है। उत्तराखण्ड के नौकरशाह इतने ढीठ हो गये है कि उन्हें उच्च न्यायालय का भी खौफ नहीं रहा। उच्च न्यायालय के आदेशों की नाफरमानी अफसरों की आदत में शुमार होता चला जा रहा है। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के अवमानना नोटिस का जबाव नहीं देने के चलते सर्व शिक्षा अभियान की राज्य परियोजना निदेशक तथा अपर सचिव, शिक्षा सुश्री सौजन्या के खिलाफ जमानती वारंट जारी करने के निर्देश और एक दूसरे मामले में हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद हरिद्वार के तहसीलदार के अदालत में हाजिर नहीं होने तथा न ही जवाब दाखिल करने पर तहसीलदार के निलम्बन के आदेश देना इस बात का जीता-जागता सबूत है।
रामनगर के इन्दु समिति के संचालक उमेद सिंह रावत की याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सर्व शिक्षा अभियान की राज्य परियोजना निदेशक और अपर सचिव शिक्षा के खिलाफ जमानती वारंट जारी करने के आदेश दिये है। मामले कुछ यूं है- इन्दु समिति के संचालक उमेद सिंह रावत की संस्था ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत कोशी- दाबका नदियों के किनारे घुमन्तु बच्चों की शिक्षा के लिए केन्द्र खोले। शिक्षा विभाग ने वर्ष 2004 से 2007 तक उनके खर्चों को भुगतान किया। लेकिन बाद में रोक लगा दी, इस रोक के खिलाफ उमेद सिंह रावत ने हाईकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले पर विशेष अपील की। जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया। इसके बाद भी सर्व शिक्षा अभियान की राज्य परियोजना निदेशक ने समिति को भुगतान नहीं किया। इस पर समिति ने दुबारा न्यायालय की शरण ली। उच्च न्यायालय ने परियोजना निदेशक से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। लेकिन परियोजना निदेशक ने जवाब दाखिल नहीं किया। इस पर न्यायालय ने परियोजना निदेशक को अवमानना नोटिस जारी किया तो उन्होंने उसका भी जवाब नहीं दिया। अन्ततः हाई कोर्ट ने सर्व शिक्षा अभियान की परियोजना निदेशक के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिये है।
दूसरा मामला हरिद्वार निवासी अखिल सिंह की याचिका का है। अखिल सिंह ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि वह हरिद्वार का स्थायी निवासी है। लेकिन हरिद्वार के तहसीलदार उसे स्थायी निवास प्रमाण पत्र निर्गत नहीं कर रहे है। याचिका में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए तहसीलदार को अदालत में तलब किया। पर न तो वह न्यायालय में आये और न ही अपना काउन्टर दाखिल किया। इसे न्यायालय के आदेशों की अवमानना मानते हुए हाईकोर्ट ने हरिद्वार के तहसीलदार को निलंबित करने का आदेश प्रदेश के मुख्य सचिव को दे दिया है।
कुछ समय पहले हाईकोर्ट ने प्रदेश के बरिष्ठ आईएएस आफिसर तथा गढ़वाल मण्डल के तात्कालीन कमिश्नर डा. उमाकान्त पंवार के कामकाज को लेकर भी तल्ख टिप्पणी की थी। एक मामले में हाईकोर्ट ने कहा था कि गढ़वाल मण्डल का कमिश्नर रहते डा. उमाकान्त पंवार ने ऐसा महसूस किया कि जैसे गढ़वाल मण्डल विकास निगम उनकी निजी सम्पत्ति हो। कोर्ट ने कहा डा. उमाकान्त पंवार को फिर से आईएएस अकादमी में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाना चाहिए। ताकि उन्हें प्रशासनिक काम-काज और अपने अधिकार क्षेत्र का पता चल सके। हाईकोर्ट ने इस आदेश पर अमल करने के लिए छह महीने का समय देते हुए इस बाबत प्रदेश सरकार को बकायदा हलफनामा दाखिल करने के आदेश दिये थे। उत्तराखण्ड में स्टर्डिया जमीन घोटाले में संलिप्त अफसरानों के खिलाफ उच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणियों को भी नौकरशाही सहज भाव से पचा गई।
लेखक प्रयाग पाण्डेय उत्तराखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार तथा एक्टिविस्ट हैं.

