: हिन्दी के विकास में नेता बड़े अवरोध : रोने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं : 15 अगस्त के बाद यानी आजादी का पर्व मनाने के बाद के दिन और बाद का महीना काफी व्यस्तता भरा रहता है। सितम्बर माह में सरकारी कार्यालय से लेकर कवि, साहित्यकार जहां 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस से संबंधित उत्सवों, समारोहों, गोष्ठियों और परिचर्चाओं में व्यस्त हो जाते हैं। इन्हीं दिनों हिन्दू समाज गणेश उत्सव के बाद पितृ पक्ष की तैयारी में जुट जाता है। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी निधन तिथि को ध्यान में रखकर अच्छे पकवान बनवाते हैं। ब्राह्मण भोज कराते हैं और यथाशक्ति दान-पुण्य भी करते हैं। फिर पूर्वजों को साल भर के लिए भुला दिया जाता है। ऐसी ही कुछ स्थिति हिन्दी की है। सरकारी पैसे से हिन्दी से संबंधित उत्सव होते हैं और फिर उसे भी पूर्वजों की भांति साल भर के लिए भुला दिया जाता है।
हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन काम बहुत कम। संविधान के अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक हिन्दी और उसके विकास के बारे में बताया गया है। अनुच्छेद 351 हिन्दी के प्रचार-प्रसार के बारे में बताता है। इस अनुच्छेद में कहा गया है- ‘हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत के समसामासिक तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी तथा आठवीं अनुसूची में शामिल अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत तथा गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि करना संघ का कर्तव्य होगा।
संविधान में उल्लेखित तथ्यों से स्पष्ट होता है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए पूरी छूट दी गई है। अब सवाल उठता है कि आखिर क्या कारण रहे जिससे हिन्दी का पूर्णतया विकास नहीं हो पाया। वास्तव में देखा जाए तो पिछले 59 सालों में ऐसा कोई काम ही नहीं हुआ जिससे हिन्दी का पूर्णतया विकास हो सके। जो हुआ वह सिर्फ कागजी ही हुआ। आज भी भाषा के नाम पर लोगों को लड़ाया जा रहा है और राजनीतिक पार्टियां अपनी रोटियां सेंकने में लगी हैं। हिन्दी के विकास में सबसे बड़ा अवरोध नेता ही हैं। तमिलनाडु जैसे प्रदेश में हिन्दी के बहिष्कार के कारण ही लंबे अरसे से द्रविड़ दल सत्ता पर काबिज हो रहे हैं। इसका अनुसरण कुछ अन्य प्रदेश भी करने लगे जैसे नामपट्टी पर पहले क्षेत्रीय भाषा हो बाद में हिन्दी या अंग्रेजी। सभी प्रदेश अपनी-अपनी भाषा को प्राथमिक पाठशाला से अनिवार्य कर रहे हैं। द्वितीय स्थान पर अंग्रेजी को प्राथमिकता देते हैं। माता-पिता भी अपने बच्चों को हिन्दी के बजाय अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना चाहते हैं। उन्हें सरकारी स्कूलों के स्थान कांन्वेंट स्कूलों में भेजते हैं, भले ही उनकी आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत न देती हो। सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं।
हिन्दी को पूरा मान न मिलने के कारणों में राजनीति, क्षेत्रवाद के अलावा अंग्रेजी भी है। अहिन्दी भाषी क्षेत्र जब तक नहीं चाहेंगे तब तक केंद्र न तो हिन्दी को अनिवार्य कर सकती है और न ही अंग्रेजी को हटा सकती है। अगर हिन्दी को जन-जन तक पहुंचाना है तो अंग्रेजी को हटाना होगा। इसके लिए राजनेताओं में इच्छा शक्ति होनी चाहिए। यदि सभी अहिन्दी भाषी एकमत से हिन्दी की हिमायत करें तो उसका विकास निश्चित है। यहां एक उदाहरण देना समीचीन होगा। तुर्की स्वतंत्र हुआ तो वहां के राष्ट्रपति कमाल आतातुर्क ने अपने सहायकों से पूछा कि तुर्क को राजभाषा बनाने में कितना समय लगेगा। सहायकों ने कहा- 10 वर्ष। इस पर आतातुर्क ने कहा कि समझ लो कि वे 10 वर्ष आज ही पूरे हो गए। कल से पूरे तुर्की में तुर्कभाषा का उपयोग हो। हिन्दी के विकास के लिए आज ऐसे ही एक कमाल आतातुर्क की जरूरत है।
हिन्दी की दुर्दशा में हिन्दी भाषी क्षेत्रों का भी हाथ माना जाएगा, क्योंकि इन्होंने भी ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे की उसका विकास हो सकता। राजनेताओं के अलावा लालफीताशाही भी हिन्दी के विकास में अवरोध बने हुए हैं। अधिकारी अंग्रेजी को अपनी शान समझते हैं। भूले-भटके यदि केंद्र सरकार कोई फरमान जारी भी करता है तो अफसर उस पर अमल नहीं करते। उन्हें शायद लगता है कि हिन्दी गरीबों की भाषा है। अदालतों में कितना काम हिन्दी में हो रहा है, सभी जानते हैं। वैश्वीकरण के दौर में भाषा की सोच और सोच की भाषा पर चर्चा आवश्यक है। हिन्दी राजभाषा बनते ही जनसाधारण के लिए कठिन हो गई। शब्दावली आयोग ने कई ऐसे शब्दों को प्रयोग में लाया जिसे समझना मुश्किल था। आयोग को अन्य भाषाओं के जन प्रचलित शब्दों को प्रयोग में लाना चाहिए।
आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में हिन्दी को प्रवेश दिया जाए। हिन्दी दिवस के नाम सिर्फ तमाशा हो रहा है। साल में 364 दिन भुलाकर सिर्फ एक दिन हिन्दी के नाम की माला जपने से उसका विकास नहीं होगा। विकास होगा उसे अपनाने से। होना तो यह चाहिए कि 364 दिन हिन्दी के विकास के लिए काम किया जाता और एक दिन यानी की 14 सितम्बर को कामकाज की समीक्षा की जाती तथा चिंतन किया जाता। फिर उसके विकास में आ रही अड़चनों को दूर करने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ा जाता। इसके साथ ही केंद्र व राज्य सरकारों को हिन्दी के विकास के लिए उपाय करने चाहिए। इसके लिए उस प्रदेश की भाषा और राजभाषा को एक साथ लेकर चलने की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश में हिन्दी सिखाने के लिए तेलुगु का सहारा लेना चाहिए न कि अंग्रेजी का। यदि सभी मिलकर सही ढंग से हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे तभी हिन्दी का विकास हो सकेगा। यदि सभी क्षेत्रों में विकास करना चाहते हैं तो अपनी भाषा को महत्व देना ही होगा।
लेखक बालेश तिवारी दैनिक भास्कर, नागपुर में वरिष्ठ उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं.

