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तेरा-मेरा कोना

उम्र को हमेशा पीछे छोड़ते रहे आलोक

सचिनबगावत के तेवर लिए बागियों की मिट्टी में जन्में आलोक तोमर कुल-कुनबे से कम… कारनामों से ठाकुर ज्यादा थे… बंदूक उठाकर जंगलों का रुख करने वालों की धरती से वो कलम उठाकर पत्रकारों की दुनिया में आए… सोच और तरीके का ये फासला भी उनका मजहब नहीं बदल पाया… संघर्ष का धर्म उनके जीने की वजह रहा और जाने की भी… समाज में फैले कैंसर ने शरीर पर घात लगाकर दुश्मनी निभाई… आलोक इसके लिए तैयार नहीं थे… होते भी तो खुद के लिए सबसे बाद में लड़ने की उनकी शपथ अपने लिए कुछ करने नहीं देती… सरोकारों के लिए चौकन्ने… अपने-पराए और खुद से भी हमेशा भिड़ने को तैयार.

सचिन

सचिनबगावत के तेवर लिए बागियों की मिट्टी में जन्में आलोक तोमर कुल-कुनबे से कम… कारनामों से ठाकुर ज्यादा थे… बंदूक उठाकर जंगलों का रुख करने वालों की धरती से वो कलम उठाकर पत्रकारों की दुनिया में आए… सोच और तरीके का ये फासला भी उनका मजहब नहीं बदल पाया… संघर्ष का धर्म उनके जीने की वजह रहा और जाने की भी… समाज में फैले कैंसर ने शरीर पर घात लगाकर दुश्मनी निभाई… आलोक इसके लिए तैयार नहीं थे… होते भी तो खुद के लिए सबसे बाद में लड़ने की उनकी शपथ अपने लिए कुछ करने नहीं देती… सरोकारों के लिए चौकन्ने… अपने-पराए और खुद से भी हमेशा भिड़ने को तैयार.

आदर्शों के सूर्य ने उन्हें जूझने का रास्ता दिखाया… बदलाव की जिद ने कलम को हथियार बनाया… वो कमजोर के साथ रहे… ईश्वर उनके साथ रहा… जंग परम्परा बनी रही… दुश्मन कई बार बदले… विजेता हमेशा एक ही रहा… छल-कपट नहीं सूझबूझ हथियार था… जीत पर उनका एकाधिकार था… यहां लड़ाइयों का जिक्र करना सिर्फ आंकड़े गिनाने जैसा है… आलोक तोमर के काम न तो  दस्तावेज बनाकर फाइलों में ऱखे जाने के लिए हैं… न ही उनका संघर्ष दो चेहरों की लड़ाई की कहानी है… वो व्यवस्था और सभ्यता के बीच अनंत तक अनवरत चलने वाली झड़पों की एक लघु कथा हैं.

हठधर्मी और हंसमुख… बातों से बातें निकालने वाले… हाजिर जवाबी से लाजवाब कर देना आलोक जी का नैसर्गिक गुण था… अपराध की खबरों से संवेदना निकालना… भाषा की व्याकरण से खेलना… लिखावट में नुकीलापन… विचारों में बहाव… तथ्य और तर्क की कसौटी पर पड़ताल के बाद सूचनाओं को खबर बनाने की समझदारी उन्होंने जहां जिससे मिली… सीखी… खासतौर पर प्रभाष जोशी जी ने उनकी प्रतिभा को तराशा… प्रभाष जी के निधन के सदमे से उबरने में आलोक जी को बहुत वक्त लगा.

अपराध की पत्रकारिता को आलोक तोमर ने नई व्याकरण दी… जुर्म की रिपोर्टिंग में मानवीय संवेदनाओं को उन्होंने आंचलिक शब्दावली से पैनापन दिया… जब अपराधी का पीछा किया तो दाउद इब्राहिम तक से मिल आए… जब भूख के पीछे लगे कालाहांडी पहुंच गए… इंदिरा की हत्या की खबर को उन्होंने भरोसे की मौत की खबर बताया… दंगों की कवरेज में सिखों पर हुए अत्याचार का आंखों देखा हाल आलोक तोमर ने रो-रोकर लिखा… गुनगुने आंसू दिल में दहकती आग के गवाह थे… इंसान-इंसान को मार रहा था… रूह कई बार कांप गई… पर कलम न सहमी… न भटकी… भटकाव के उन स्याह अंधेरों के दौर में भी संतुलन और संवेदना साथ-साथ चले.

रचनाशीलता की उंगली पकड़कर आलोक बॉलीवुड तक पहुंचे….मजहबी नफरत फैलाने वालों को उन्होंने बताया कि मां और मुल्क बदले नहीं जाते… छोटे पर्दे पर पहली बार उतरे अमिताभ से कंप्यूटर जी को लॉक करवाया… अग्निपथ और खिलाड़ी जैसे सीरियल लिखे… जी मंत्री जी के व्यंग्यों पर आने वाली हंसी सियासत पर आलोक तोमर की टीस का हमला थी.

छपने के लिए नहीं अपने लिए वो कविताएं और कहानियां भी लिखते थे… सोच की मौलिकता और कतार के अंतिम आदमी से हासिल की जमीनी हकीकत को उन्होंने किताबों की शक्ल दी… चम्बल में सिर्फ डकैत नहीं हैं ये हुक्मरानों को आलोक तोमर ने बताया… उड़ीसा के भूखे नंगों की रोटियां खाकर किसने कितनी चर्बी बढ़ाई सरकार को बौखला देने वाले हरे भरे अकाल की सच्चाई उन्होंने दुनिया को बताई…. न दिल्ली में बैठी सरकार से डरे… न दुबई में माफियाओं से… उनकी किताब काला धंधा गोरे लोग अपराध की दुनिया का सनसनीखेज हकीकत सामने लाई… सूचना के अधिकार को वो लोकतंत्र का ब्रह्मस्त्र मानते थे… हजारों आरटीआई फाइल की… बेईमानो की नाक में दम कर दिया… सरकारी चोर-उचक्कों के कई एनकाउंटर किए.

आलोक उम्र को हमेशा पीछे छोड़ते रहे… उम्र से पहले पढ़ाई कर ली… उम्र से पहले नौकरी मांगने पहुंच गए… उम्र से पहले इतना कुछ लिख-पढ़ डाला… काश वो विदाई में तो अपनी उम्र का ख्याल कर लेते… हमारी होली हमेशा के लिए काली नहीं होती… आलोक, उदयन शर्मा जैसा बनना चाहते थे… आज एक पूरी पीढ़ी आलोक तोमर बनने के लिए कतार लगाए खड़ी है… ये पल दो पल की नहीं… हर एक पल की शायरी है… जाना सबको है… गीता बोलकर कृष्ण को भी जाना पड़ा… अहम ये है जीवन के कुरुक्षेत्र में कौन साथ किसका देता है.

कृष्ण को जब भी मिला ताना मिला,
एक वंचित समर में, जिसमें वो महज़ एक सारथी था,
योद्धा के संकट पर,
सिर्फ रुक जाना मिला
…जो तटस्थ हैं-समय लिखेगा उनका भी अपराध
न मैं योद्धा, न में सेना, न किसी का ताप छीना,
किन्तु रणछोर नाम मेरा है ज़रूर,
टूट जायेगा गुरूर,
उन सभी का जो सिर्फ पाखंड पर और परावर्तित प्रभा पर जी रहे हैं,
मित्र अर्जुन, हर किसी की निजी अपने युद्ध होते हैं,
अस्त्र अपने हों तभी तुम जीत पाओगे,
दूसरों के कवच में,
कब तक कहां छिप पाओगे.

इंसान सिर्फ इन पांच तत्वों की मिलावट भर नहीं है… चिता पर जलते हमारी खुली आंखों ने जिस आलोक को देखा है… वो आंखें धोखेबाज हैं… आलोक जिस मिट्टी के… जिन चीजों के बने हैं वो इन पंचतत्वों की परिभाषा परेय है… 20 मार्च 2011 को उनकी संपूर्णता में सिर्फ ये पांचों घटे हैं… नुकसान हुआ है पर आलोक अब भी हमारे इर्द-गिर्द हैं… खुली आंखें भ्रमित कर रही हैं… आंखें बंद करिए… उस अंधेरे में आलोक सामने होंगे… दृढ़ विश्वास रखिए… जो बुझ जाए वो हमारा आलोक हो ही नहीं सकता… अपनी मृत्‍यु से कुछ दिन पहले आलोक ने कविता लिखी… जो आलोक के मायने बताती है.

काल तुझसे होड़ है मेरी,
जानता हूँ चल रही है
मेरी तुम्हारी दौड़,
मेरे जन्म से ही
मेरे हर मंगल गान में,
तुमने रखा है ध्यान में
एक स्वर लहरी, शोक की रह जाए,
आपके दूत मुझसे मिले हर मोड़ पर
और जीवन का बड़ा सच,
चोट दे, ढह जाए
सारे स्वप्न, सारी कामनाएं, असक्तियाँ,
तुम्हारे काल जल में बह जाए
लेकिन अनाड़ी भी हूँ
अनूठा भी, किंतु
तुम्हारी चाल से रूठा भी
काल की शतरंज से कभी जुड़ा,
और एक पल टूटा भी,
तुम सृष्टि के पीछे लगाते दौड़,
देते श्राप और वरदान
और प्रभंजन अप्रतिहत
चल रही है,
दौड़ तुमसे मेरी
ऐ अहेरी,
काल,तुझसे होड़ है मेरी.

लेखक सचिन अग्रवाल पिछले पन्‍द्रह वर्षों से मुख्‍य धारा की पत्रकारिता कर रहे हैं. इन दिनों सीएनईबी न्‍यूज चैनल से जुड़े हुए हैं.

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