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एक ईमानदार कलमकार की दर्दनाक मौत!

भूपेन्‍द्र सिंहशर्मा जी एक ईमानदार कलमकार थे। ईमानदार थे इसलिए मुफलिस थे और अपने घर-परिवार की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थे। वही शर्मा जी अब हमारे बीच नहीं हैं। शर्मा जी अनुभवी और परिपक्व कलमकार थे, उनकी साहित्य साधना मुझ जैसों के लिए प्रेरणास्रोत ही रही। एक तरह से वह मेरे आदर्श रहे, आज भी जब लेखन कार्य करता हूं तो उनकी याद आती है। शर्मा जी वरिष्ठ कलमकार होने के साथ-साथ स्वाभिमानी भी थे। वह किसी कथित माननीय के आगे पीछे नहीं घूमते थे, उनके इसी गुण से लोग उनका बड़ा सम्मान करते थे। एक तरह से शर्मा जी प्रभावशाली कलमकार थे, बड़े-बड़े दिग्गज उनका लोहा मानते थे। उनके समकालीन ही नहीं उनसे वरिष्ठ कलमकार उनकी प्रतिभा के कायल थे। शर्मा जी अपने लेखन कक्ष में ही शार्ट-सर्किट से लगी आग की भेंट चढ़ गए थे।

भूपेन्‍द्र सिंहशर्मा जी एक ईमानदार कलमकार थे। ईमानदार थे इसलिए मुफलिस थे और अपने घर-परिवार की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थे। वही शर्मा जी अब हमारे बीच नहीं हैं। शर्मा जी अनुभवी और परिपक्व कलमकार थे, उनकी साहित्य साधना मुझ जैसों के लिए प्रेरणास्रोत ही रही। एक तरह से वह मेरे आदर्श रहे, आज भी जब लेखन कार्य करता हूं तो उनकी याद आती है। शर्मा जी वरिष्ठ कलमकार होने के साथ-साथ स्वाभिमानी भी थे। वह किसी कथित माननीय के आगे पीछे नहीं घूमते थे, उनके इसी गुण से लोग उनका बड़ा सम्मान करते थे। एक तरह से शर्मा जी प्रभावशाली कलमकार थे, बड़े-बड़े दिग्गज उनका लोहा मानते थे। उनके समकालीन ही नहीं उनसे वरिष्ठ कलमकार उनकी प्रतिभा के कायल थे। शर्मा जी अपने लेखन कक्ष में ही शार्ट-सर्किट से लगी आग की भेंट चढ़ गए थे।

शर्मा जी के साथ बिडम्बना यह थी कि ईमानदारी से उन्हें इस भौतिकवादी युग में उनके कथित अपनों से तिरस्कार मिलता था। पत्नी और पुत्र तथा अन्य परिजन उनसे धन की अपेक्षा करते थे, लेकिन शर्मा जी जैसा ईमानदार कलमकार ‘पैसा’ कहां से लाता? आए दिन घर में किचकिच होती पत्नी उलाहना देती और पुत्र अपने को सबसे बड़ा अक्लमन्द मानकर हमेशा उनकी बातों की अनदेखी करता। वह जब जीवित थे तो मुझसे अपनी व्यथा कहते थे और यह भी कहते कि जिस दिन मैं नहीं रहूंगा इन सभी को इनकी औकात पता चलेगी। ऐसा नहीं था कि शर्मा जी लक्ष्मी शून्य थे। घर के जायज खर्चे भर का पैसा कमाते थे और खर्च करते थे, लेकिन लाख-दो लाख की अपेक्षा रखने वाले खास परिजन पत्नी/पुत्र उनको ‘बेकार’ मानते थे।

एक दिन शर्मा जी ने मुझसे बातों बात में कहा था कि कलमघसीट जी मेरे कमरे का दस वर्ष पुराना कूलर खराब हो गया, बड़ी गर्मी होती है ऐसे में लेखन कार्य में बाधाएं आती हैं, उलझन रहती है। मैने कहा उसे बनवा अथवा बदल क्यों नहीं देते, तो वह हंसकर बोले डियर इतने वर्षों तक तपस्या किया है, गर्मी भी झेल लूंगा। इससे पता चलेगा कि साहबजादे जो लाट साहेब बने गलतफहमी का शिकार हैं उन्हें यह बोध होता है कि उनका दायित्व क्या है। पैसा कमाते हैं, परास्नातक हैं, उनका रोजगार अच्छा चलता है। उस दिन के बाद मैं एक माह के अन्तराल पर उनसे मिला था, देखा कि उनका ‘कूलर’ ठीक वैसा ही अपने स्थान पर रखा हुआ है, और वह लुंगी-बनियान पहने लिखने का कार्य कर रहे थे। मैंने सोचा कि इनका पुत्र कैसा शिक्षित नवयुवक है, जिसे दायित्व का बोध ही नहीं। फिर सोचने लगा कि यह घोर कलयुग है, हर पुत्र श्रवणकुमार नहीं हो सकता, शर्मा जी ही नहीं कितने ऐसे हैं जिनके लाडले कलयुगी ही होंगे। शर्मा जी से हाल-चाल पूछा था, वह सहजभाव से बोले ‘एवरीथिंग इज ओके।’ फिर कुछ देर तक शर्मा जी के कमरे में रहा भयंकर गर्मी का एहसास हो रहा था, इसलिए बहाना बनाकर मैंने उनसे जाने की अनुमति मांग ली थी।

शर्मा जी से प्रायः मुलाकात करने मैं उनके यहां जाया करता था। लेखन पर गुफ्तगू करता बहुत कुछ जानकारी हासिल करता और वापस हो जाता था। उनके कथन की पुष्टि हो गई। पूरी गर्मी बीत गई पुराना बिगड़ा कूलर यथावत रहा। यहां बता दूं कि शर्मा जी के नाम के प्रभाव का भरपूर लाभ उठाने वाले उनके परिजन, जो स्वयं पैसे कमाते थे धन की अपेक्षा करते थे। उनकी पत्नी सीधे मुंह बात नहीं करती, पुत्र की बात विस्तार से लिख दूं तो आप सभी थू-थू करेंगे। शर्मा जी थे वह बनियान-लुंगी पहने अपने धुन में रहते हुए सहज भाव से लेखन कार्य किया करते थे, किसी से कुछ भी नहीं कहते थे। कहते भी तो कोई हल नहीं निकलने वाला था, क्योंकि पत्नी और पुत्र की सोच आकाशीय थी। उन दोनों के पांव जमीन पर नहीं रहते थे। शर्मा जी जमीनी व्यक्ति थे, बनावट से कोसों दूर। अपने लेखन कक्ष के अलावा अगल-बगल के घरों की दीवालें भी नहीं पहचानते थे। घर-परिवार के लोग उन्हें असामाजिक कहते थे और समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए हर आमंत्रण पर पार्टियों में आते-जाते थे।

खैर! शर्मा जी से मैं गर्मी के बाद मिला तो बरसात के मौसम बाद कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी। शर्मा जी कम्बल ओढ़े लेखन कार्य में तल्लीन थे। हाल-चाल का आदान-प्रदान हुआ। वह सहज ही दिखे थे फिर भी मेरे मन में जिज्ञासा थी कि उनसे कुछ पूछा जाए। सो मैंने पूछा क्यों सर कैसा चल रहा है, वह बोले ठीक है बस ठण्डक थोड़ी ज्यादा है। इस बार सायं पदचालन (इवनिंग वाक) करने में दिक्कत आ रही है। गर्म स्वेटर, कपड़े नहीं हैं, चलो अच्छा है इसी बहाने लिखने का अच्छा अवसर मिल रहा है। मुझे शर्मा जी की बेबसी पर अन्दर से रोने का मन हो आया था। शर्मा जी के चेहरे से किसी के प्रति राग-द्वेष नहीं दिख रहा था। वह इस बार कुछ भी नहीं बोले थे।

वही शर्मा जी अचानक स्वर्गवासी हो गए। उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर मैं भी अवाक रह गया। मैं बाहर था- शोक संवेदना व्यक्त करने उनके घर जाने लगा। गली में पहुंचते ही कई लोगों ने दुःख प्रकट किया। कई महिलाओं ने कहा कि शर्मा जी इतने वर्षों से यहां रह रहे थे किसी की तरफ आंख उठाकर नहीं देखा था, ऐसा व्यक्ति इस शहर में और कोई नहीं होगा। मैं गली मोहल्ले के वासिन्दों की बातें सुनता हुआ उनके घर पहुंचा। वहां सब सामान्य दिख रहा था। उनके साहबजादे मोटर साइकिल पर बैठकर अपनी दुकान पर जाने को तैयार थे, बोले कलमघसीट जी अब तो पापा नहीं रहे आप कोई और स्थान तलाश कर लें। मैंने कहा डियर मैं आप की माता जी से मिलना चाहता हूं, शोक संवेदना व्यक्त करूंगा। उत्तर मिला वह तो अपनी संस्था के कार्य से बाहर गई हैं। बाद में आइएगा, वैसे आप कहां थे। काफी विलम्ब से आए पापा को मरे तो महीनों हो गया। मैंने शर्मा जी के एकमात्र लड़के से कहा भाई मैं तो बाहर था, लौटने के बाद जैसे ही सुना यहां चला आया। शर्मा जी के लड़के की बातों से मुझे एहसास हुआ कि शर्मा जी के मरने से उनके परिजनों को कोई गम नहीं, उल्‍टे सब और स्वच्छन्द हो गए हैं।

शर्मा जी स्वर्गवासी क्यों और कैसे हुए इसे जानकर तो मुझे अपार कष्ट हुआ। हुआ यूं कि शर्मा जी के लेखन कक्ष में बिजली का मीटर लगा था, स्विच पुरानी हो गई थी, तार ढीले हो गए थे, प्रायः शार्ट-सर्किट होने का अंदेशा बना रहता था। बिजली की आवाजाही से ढीले तारों से चिंगारियां निकलती थीं। इस बात को उनकी पत्नी और पुत्र दोनों जानते थे, लेकिन वह लोग 50-100 रूपए खर्च करके उसे ठीक नहीं करवाए। पुत्र ने कहा था कि दिन भर कमरे में बैठे-बैठे छोटा सा कार्य भी नहीं करवा सकते। स्विच, मीटर बोर्ड के पास ही शर्मा जी का तख्त था। एक रात बिजली के एकाएक प्रवाहित होने से ‘स्विचबोर्ड’ से चिंगारी निकली और शर्मा जी के बिस्तर पर गिर गई, शर्मा जी गम्भीर रूप से जल गए फलतः उनकी मौत हो गई।

मैंने पता किया आखिर शर्मा जी ने स्विच बोर्ड क्यों नहीं ठीक करवाया था तो पता चला कि अपने एक पुराने शिष्य को बुलाकर स्विचबोर्ड ठीक करवाने को कहा था। वह भी लापरवाह निकला। उस दिन बहाना बनाकर चला गया था। उसी रात शार्ट-सर्किट होने से शर्मा जी की जलकर मृत्यु हो गई। यदि शर्मा जी की मौत के कारणों पर विचार किया जाए तो कलयुगी, स्वार्थी परिजनों की कलई खुलेगी। अब क्या होगा कलई खोलकर, शर्मा जी पैदा हुए थे तो मरना ही था, वह मर गए। बहाना जो भी रहा हो। इस कलयुग में हर पत्नी सती-सावित्री और पुत्र श्रवण कुमार नहीं हो सकता।

शर्मा जी की मौत के कारणों को जानकर मुझे उनके पुत्र और पत्नी तथा अन्य परिजनों से घृणा सी हो गई। शर्मा जी की जहां अत्येष्टि हुई थी, मैं वहां गया था और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी। इस घटना के बाद मुझे भी भय सताने लगा कि कहीं शर्मा जी के पत्नी-पुत्र की तरह की आदतें मेरे घर-परिवार के लोगों को न पड़ जाए, वर्ना मेरी भी दुर्गति ही होगी। इसीलिए मैं सतर्क हो गया हूं, और अपने घर की विद्युत वायरिंग डीपी आदि ठीक करवा लिया। शर्मा जी की याद आ रही है उनके बारे में क्या लिखूं उनके अपने ही जब इतने स्वार्थी निकले तो गैरों के प्रति क्या सोचा जाए। शर्मा जी की मृत्यु उपरान्त मुझे ये पंक्तियां याद आ रही हैं- ‘‘सुर, नर, मुनि सबकी या ही रीती, स्वारथ लागि करै सब प्रीती।।’’

आज मैं बड़े उदास मन से यह लेख लिख रहा हूं। बार-बार शर्मा जी का व्यक्तित्व सामने आ जाता है। इतना स्वाभिमानी कलमकार जिसके नाम के प्रभाव को उसके परिजन भुनाते थे, वह अपने ही अपनों से कितना उपेक्षित था। दो रोटी खाने के लिए ताने, उलाहने सुन-सुनकर शर्मा जी ‘डिप्रेस’ थे, जो मेरी जानकारी में है वह यह कि शर्मा जी के भोजन वस्त्रादि की व्यवस्था पत्नी, पुत्र के जिम्मे थी, जबकि वह इतने निरीह नहीं थे, फिर भी बगैर कुछ कहे वह मां-बेटा के रहमो करम पर जी रहे थे। विरोध करने की वह इसलिए भी नहीं सोचते थे, यदि ऐसा करते तो घर में नित्य चिकचिक होती। ऊपरवाला शर्मा जी जैसे कलमकारों की आत्मा को शान्ति प्रदान करे।

लेखक भूपेन्‍द्र सिंह गर्गवंशी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं और स्‍वतंत्र लेखन करते हैं. उन्‍होंने पत्रकारिता में ईमादारी और बेइमानी दोनों के बनते-बिगड़ते रुपों को नजदीक से देखा है. यह कहानी भी उन्‍होंने अपने आसपास मिले अनुभवों से रुबरू होने के बाद लिखी है.

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