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एक नई मूरत बनते अन्‍ना हजारे!

मूर्तिपूजकों के इस समाज को एक नयी मूर्ति मिल गयी है- अन्ना हजारे. दकदक सफ़ेद कुरता-धोती पहने और सिर पर टोपी रखे अन्ना हजारे इस समय उस प्रत्येक मानवीय श्रेष्ठता की निशानी माने जा रहे हैं जो हम पूजनीय मानते हैं. वे अद्भुत हैं, वे श्रद्धेय हैं, वे महान हैं, वे परम राष्ट्रभक्त हैं, वे गज़ब के ईमानदार हैं, वे युगद्रष्टा हैं, युगप्रवर्तक और एक नए युग के रचयिया के रूप में सामने आये हैं. वे इस देश की नयी रोशनी हैं, वे इस देश और इसके देश्वासियों के नए रखवाले हैं, वे हम सभी का उद्धार करने आये हैं. उनके असीम बुद्धि और विवेक है. वे जो कुछ भी कह देते हैं वह अंतिम सत्य होता है, आदि-आदि.

मूर्तिपूजकों के इस समाज को एक नयी मूर्ति मिल गयी है- अन्ना हजारे. दकदक सफ़ेद कुरता-धोती पहने और सिर पर टोपी रखे अन्ना हजारे इस समय उस प्रत्येक मानवीय श्रेष्ठता की निशानी माने जा रहे हैं जो हम पूजनीय मानते हैं. वे अद्भुत हैं, वे श्रद्धेय हैं, वे महान हैं, वे परम राष्ट्रभक्त हैं, वे गज़ब के ईमानदार हैं, वे युगद्रष्टा हैं, युगप्रवर्तक और एक नए युग के रचयिया के रूप में सामने आये हैं. वे इस देश की नयी रोशनी हैं, वे इस देश और इसके देश्वासियों के नए रखवाले हैं, वे हम सभी का उद्धार करने आये हैं. उनके असीम बुद्धि और विवेक है. वे जो कुछ भी कह देते हैं वह अंतिम सत्य होता है, आदि-आदि.

सौभाग्य से प्रत्येक ऐसी मूर्तियों की तरह उनके पास भी चेलों की एक अच्छी संख्या है. कुछ उनके लोग हैं जो अन्ना की अनुपस्थिति में बताते हैं कि अन्ना क्या हैं, कौन हैं, क्या चाहते हैं, क्या बोल रहे हैं और क्यों बोल रहे हैं. जैसे एक मसीहा कुछ बातें आधे-अधूरे ढंग से कहता है और फिर उनके अनुयायी उसकी शेष बातों को विस्तार दे कर उसका अर्थ प्रकट करते हैं, वही बात अन्ना के साथ भी हो रही है. भारतीय पुलिस सेवा की अधिकारी रहीं किरण बेदी अन्ना हजारे की तिहाड़ जेल में कही गयी बातों की विडियो रिकॉर्डिंग करती हैं और फिर इसे सारे चैनलों में राष्ट्र के नाम सन्देश के रूप में प्रसारित किया जाता है ताकि कोई भी व्यक्ति इतना अभागा नहीं रहे कि इन शब्दों की वाणी के वंचित रह जाए.

यदि आप रामलीला मैदान में बना अन्ना का मंच देखें तो पायेंगे कि ऊँचे एक कुर्सी पर परमब्रह्म की तरह अन्ना जी विराजमान हैं और उसके नीचे की पायदान पर उनके खास शिष्य. फिर उसके नीचे सामान्य शिष्य और सामने भक्ति रस में सराबोर आम जन. यदि मैं याद करता हूँ तो मुझे तमाम वे दृश्य सामने आ जाते हैं जो अकसर हमारे देश में कहीं ना कहीं आशाराम बापू, मोरारी बापू और तमाम दूसरे धार्मिक गुरुओं के भाषणों में दिख जाया करते हैं. अंतर सिर्फ यह है कि वे ब्रह्मज्ञान बांटते हैं अन्ना लोकपाल ज्ञान बाँट रहे हैं. वे तमाम लोग यह दावा करते हैं कि उनके शिष्यत्व में लोगों का परलोक सुधर जाएगा, अन्ना लोगों के इहलोक को पूरी तरह सुधार देने का दावा पेश कर रहे हैं और बड़ी चतुराई के पास जन लोकपाल नामक इस नयी जादू की पुडिया को अलग-अलग तरीके से जनता के बीच उछाल कर अपनी शाश्वत छवि बनाने की जुगत में लगे हुए हैं. इसके लिए वे अलग-अलग प्रकार से अपनी खासियत प्रस्तुत करने से भी नहीं चुकते जैसा हर व्यक्ति अपनी छवि में निरंतर इजाफे के लिए लगा रहता है. तभी तो वे कभी बिना कारण के भी दौड़ लगाने लगते हैं जबकि उसका किसी प्रकार से कोई प्रयोजन नहीं है, हाँ यह सब फोटोग्राफरों और टीवी कैमरामैन को बहुत अच्छा लगेगा.

इस तरह से लगातार हो रहे प्रयासों के पीछे एक लंबी तैयारी भी है,  जो खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक और ट्विटर, बल्क एसएमएस, ताबडतोड इंटरनेट मैसेज, चौबीस गुने सात मीडिया के समुचित प्रयोग आदि पर आधारित हैं. इनमे से हर मैसेज में अर्धसत्य का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है और ऐसी मधुर बातें बोली जा रही हैं जो जादुई असर करती हैं. यह तो ठीक है ही कि आज हमारे देश का आम आदमी भ्रष्टाचार से परेशान है. यह भी सही है कि लोग आम तौर पर नेताओं के प्रति अच्छे भाव नहीं रख रहे हैं और उनके प्रति एक निगेटिव भावना है. इन दोनों तथ्यों का भरपूर उपयोग करते हुए एक नयी मूर्ति की श्रृष्टि का पूरा ताना-बाना बुना गया है. एक ऐसा व्यक्ति जो संतनुमा है, जिसका अपना कोई नहीं है, जो मंदिर में सोता है, जो पूरी तरह समाज को प्रतिबद्ध है, जिसका उद्देश्य महान है, जो देशवासियों का दर्द नहीं देख सकता, जो देश को इस गैरत की स्थिति से उबारना चाहता है. ये सारी बातें इतनी चतुराई के साथ और इतनी बार कही जा रही हैं कि आज हमारे देश की एक अच्छा-ख़ासा प्रतिशत आबादी इस बात को सत्य मान ले रही है और इस प्रकार अन्ना रुपी इस नयी मूर्ति का सृजन हुआ है.

अब प्रश्न यह है कि यदि यह मूर्ति सृजित हो ही गयी है तो मुझे क्या परेशानी है. मेरी सबसे बड़ी दिक्कत है कि मुझे मूर्तियों से डर लगता है. अपने अब तक के जीवन में मैंने यही देखा है कि कोई आदमी मूरत नहीं होती, हर इंसान इंसान होता है, उसमे वे सारी अच्छाइयां और बुराइयां होती हैं,  जो किसी दूसरे में होता है. दूसरी बात यह कि कोई मनुष्य पूरी तरह परमार्थी नहीं हो सकता. यदि मैं यह लिख रहा हूँ तो इसके पीछे मेरे कुछ मकसद हैं. कुछ बातें तो मैं स्पष्ट रूप से कह रहा हूँ, कुछ अन्य बातें मेरे मन में छिपी हुई हैं जो मैं सामने नहीं ला रहा. इसी प्रकार से मैं यह मानने से साफ़ इनकार करता हूँ कि भूख हड़ताल पर बैठे अन्ना हजारे इंसान नहीं कुछ और हैं. मैं उन्हें किसी खास मूरत के रूप में स्वीकार करने से साफ़ तौर पर मना करता हूँ. यदि और कोई चाहत नहीं रही तो कम से कम नाम, पद और ताकत की चाहत तो हर आदमी में होती है. फिर यह चाहत इतनी बलवती होती है कि इसके सामने बाकी सारी चाहतें बौनी हो जाती हैं.

मैं खुद को ही देखता हूँ, मुझ में अपने नाम को लेकर इतनी तीव्र चाहत है कि मैं कई बार खुद ही उससे परेशान हो जाता हूँ. ऐसे में अचानक आसमान से कोई ऐसा फरिश्ता उतर आये जो और कुछ नहीं चाह रहा हो, मात्र देश की भलाई और जनता का उद्धार चाह रहा हो, ऐसी बात मुझे हलक के नीचे नहीं उतर पाती. बहुत प्रयास कर के भी. मैंने जिसे भी देखा है उसमे कुछ चाहतें देखी हैं, कुछ अच्छाइयां और कुछ बुराईयां देखी हैं. यानि कुल मिला कर इंसान देखे हैं. ऐसे में जब कोई स्वयं को अद्भुत युगद्रष्टा के रूप में प्रकट करता है तो मैं आदतन बहुत चौकन्ना हो जाता हूँ. यह मेरा सबसे बड़ा कारण है कि जब से अन्ना हजारे रुपी कथित महामानव का उदय हुआ है और एक नयी मूर्ति बाज़ार में आ कर गड़ गयी है,  तब से मुझे भयानक अपच सा हो रहा है. ऊपर से तब जब वह मूरत ऐसी-ऐसी बातें कह रहा है, ऐसे-ऐसे काम कर रहा है जो लोगों को अपने किसी छद्म तिलस्म में वशीभूत करने का बहुत साफ़ प्रयास दिख पड़ता है.

हो सकता है यह मेरे मन का वहम् हो, यह भी संभव है कि यह मेरा ओछापन हो, मैं खुद जैसा हूँ वैसा ही दूसरों को भी समझता हूँ. पर जब आज तक कोई महामानव नहीं देखा तो अचानक अवतरित हुए इस दिव्यदेव के प्रति मेरी अपनी शंकाएं मानव स्वभाव के अनुकूल बहुत गलत नहीं दिखतीं. साथ ही यह भी मेरा अनुभव रहा है कि जो व्यक्ति अपना जितना ही गुणगान करता है और जितनी आदर्शवादी बातें करता है बहुधा उसकी पूँछ उठने पर उतनी ही प्रकार की आतंरिक बातें प्रकट हो जाती हैं. मैंने अपनी सेवा में भी यह काफी देखा है और उसके बाहर आम जीवन में भी. अन्ना हजारे के रूप में स्थापित की जा रही मूरत की भावभंगिमाएं मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह आश्वस्त करती हैं कि यह मूरत बनने का प्रयास ज्यादा है, सच कम. पर अभी शायद इसका वक्त नहीं क्योंकि अभी तो जादू सिर चढ कर बोल रहा है और देश के सारे परेशान डूबते हुए लोग तिनके की तलाश में इस नयी मूरत को हाथो-हाथ उठाने को बेताब नज़र आ रहे हैं.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अफसर हैं. यूपी के कई जिलों में पुलिस अधीक्षक रहे. दो वर्ष तक अवकाश लेकर एमबीए किया. इन दिनों मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा के प्रमुख के बतौर पदस्थ हैं. कई अखबारों, मैग्जीनों और पोर्टलों में विभिन्न विषयों पर लेखन.

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