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एक मुद्दत से मेरी मां सोई नहीं.. जब रात को मुझे डर लगा था

समाज में संतानों द्वारा अपनी ही मां-बाप के प्रति बढ़ती ईर्ष्या आज चरम पर है। ज़्यादातर देखा गया है कि खुद की संतानों द्वारा ही उन माँ-बाप को कोई महत्व नहीं दिया जाता, जिन्होंने उन संतानों को जन्‍म दिया और बड़ा किया और समाज में रहने के तौर तरीके से अवगत कराया। आज ऐसी संतानों को क्या हो गया है जो उन माँ-बाप यह कह कर चुप करा देते है कि ”तुम्हें क्या पता कि आज के ज़माने में क्या हो रहा है, तुम क्या जानो क्या गलत है क्या सही, मेरे कामों में दखल मत दिया करो।”  अक्सर सुनने में आता है कि खुद की संतानों द्वारा एक मज़बूर और असहाय पिता को घर से निकाल दिया गया या फिर उनसे उस समय अलग हो जाते है,  जब वो उनकी सेवा के मोहताज रहते हैं।

समाज में संतानों द्वारा अपनी ही मां-बाप के प्रति बढ़ती ईर्ष्या आज चरम पर है। ज़्यादातर देखा गया है कि खुद की संतानों द्वारा ही उन माँ-बाप को कोई महत्व नहीं दिया जाता, जिन्होंने उन संतानों को जन्‍म दिया और बड़ा किया और समाज में रहने के तौर तरीके से अवगत कराया। आज ऐसी संतानों को क्या हो गया है जो उन माँ-बाप यह कह कर चुप करा देते है कि ”तुम्हें क्या पता कि आज के ज़माने में क्या हो रहा है, तुम क्या जानो क्या गलत है क्या सही, मेरे कामों में दखल मत दिया करो।”  अक्सर सुनने में आता है कि खुद की संतानों द्वारा एक मज़बूर और असहाय पिता को घर से निकाल दिया गया या फिर उनसे उस समय अलग हो जाते है,  जब वो उनकी सेवा के मोहताज रहते हैं।

ऐसे लोग ये क्यों भूल जाते है जब वो छोटे थे तो उनकी हर छोटी बड़ी ज़रूरतों को उस माँ बाप के द्वारा उसकी हैसियत के मुताबिक ज़रूर पूरा किया जाता था। उंगली पकड़ कर चलना सिखाने वाली उस शख्सियत को आज अपने ही संतानों द्वारा घर से क्यों निकाला जा रहा, जिसने उसे बड़े होने तक सर छुपाने की जगह दी थी? हालाँकि आज के समाज में बनाये गए नए नए तौर तरीकों पर गौर करें तो आज नौजवान उस बूढ़े माँ-बाप को घरों में कैद कर के रखते हैं,  ऐसे किसी समारोह में उन्हें शामिल नहीं किया जाता जहाँ उन्हें लगता है कि माँ बाप को ले जाने पर उनकी साख पर असर पड़ेगा। कौन समझाए इन नौजवानों को की तुम्हें समाज में उठने बैठने के तौर-तरीकों से उन्हीं माँ-बाप ने अवगत कराया है।

अक्सर ऐसी खबरें समाचार पत्रों में सुर्खियाँ बनती नज़र आती है कि एक बूढी माँ को उनकी संतानों द्वारा ही घर से निकाल दिया गया,  जिसके बाद वो बूढी माँ सड़कों पर रोटी मांग कर अपना गुज़ारा करती है। ऐसे लोग क्यूँ भूल जाते है कि जिस समय वो छोटे थे और उन्हें भूख लगती थी तो उसी माँ के पास दौड़ कर आते थे और माँ से कुछ खाने को मांगते थे,  उस समय उस माँ ने तो नहीं कहा कि जाओ सड़कों पर मांग कर खाओ। क्यों आज उस माँ का तिरस्कार किया जा रहा है? ज़्यादातर युवक उस समय अपने माँ-बाप से अलग हो जाते हैं,  जब उनकी शादी हो जाती है या फिर उनके माँ बाप बूढ़े हो जाते है, उस वक़्त वही माँ बाप उनके लिये एक बोझ लगने लगते है,  जिसने उन्हें उस वक़्त अपना प्यार दिया होता है जब वो बहुत छोटे थे। ऐसे लोग उन माँ-बाप को कैसे तकलीफ देने की सोच लेते हैं?

ऐसे लोग ये भूल जाते है कि कल जब वो छोटे थे और उनकी बात कोई समझ नहीं पाता था तब सिर्फ एक हस्ती थी,  जो उनके टूटे-फूटे अल्फाज़ भी समझ जाती थी। और आज ऐसी हस्ती के साथ अन्याय क्यूँ? ऐसे लोगों को अपने माँ-बाप का ध्यान भी ठीक उसी तरह रखना चाहिए जैसे उनके माँ-बाप ने उन्हें बचपन में रखा था। बचपन में जिस तरह उनकी एक आहट पर माँ उठ कर बैठ जाती थी और अपने सीने से लगा कर सुलाती थी,  उस माँ के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?

लेखक इमरान जहीर मुरादाबाद में पत्रकार हैं.

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