24 मार्च को हमारे प्रकाशक… (पूरा नाम.. .राघव जी ) का फोन आया कि प्रेमचंद की पत्रकारिता 1200 पेज से ज्यादा हो गया है, लिहाजा आप आकर इसे देखें और इसे या तो 900 पृष्ठों में समेटे या दो खंड को तीन खंड़ों में करें। सारा मैटर लगभग पूरी तरह तैयार है, बस आप कोई फैसला करके इसे फौरन फाइनल करें। मेरे लिए बड़ी दुविधा आ खड़ी हो गई। मुझे एक सप्ताह के लिए बाहर जाना है, मगर राघवजी कोई बहाना मानने को राजी नहीं थे। वे खुद पिछले सात माह से इस किताब को लेकर परेशान है। पहले इसे आठ अक्टूबर 2010 को प्रेमचंद के निधन के 75 साल पूरा होने के अवसर पर लाना चाह रहे थे, जो किसी कारणवश साकार नहीं हो पाया। वाकई प्रेमचंद की रचनाओं के साथ रहते हुए काम करना बेहद कठिन सा है। प्रकाशक के फोन आने के बाद एक बार फिर उसी रचना संसार में जाने का मेरा मन नहीं कर रहा था। मगर मजबूरी थी।
लिहाजा तमाम कठिनाईयों और ज्यादातर सामग्री लुप्त हो जाने के बावजूद साहित्य सम्राट प्रेमचंद द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय रपटों टिप्पणियों, आलेखों, समीक्षा, विश्लेषण तथा समसामयिक हालात काम से हैरानी होती है। पूरी दुनिया पर प्रेमचंद की पैनी नजर और सबसे अलहदा रपटों को देखकर यह बार बार सोचने के लिए मन लाचार हो जाता है कि यदि वे केवल पत्रकार होते तो पता नहीं क्या करते? वे एकदम कमाल के थे। जहां विचारों की कोई कमी नहीं थी। जब पत्रकार प्रेमचंद को लेकर काम करना आरंभ किया गया था। तब इसे दो खंडों में समायोजित करने की योजना थी। मगर, जब इनकी पत्रकारिता के मूल्यांकन की बारी आई, तो हमें एक साथ इतनी सामग्री मिली कि हम लगभग अवाक रह गए। पत्रकारिता में उल्लेखनीय सामग्री चयन करने की जब बारी आई, तो किसे रखा जाए या किसे छोड़ा जाए? यह एक बड़ी दुविधा बन गई। पत्रकारिता के जिस काम को आज तक उल्लेखनीय तक नहीं माना गया उन्हीं रचनाओं को उनके दिवगंत होने के 75 साल के बाद देखना, पढ़ना और मूल्यांकन करना एक रोमाचंक अनुभव सा लग रहा है।
भारी मन से इसे तीन भागों में बांट तो दिया गया, मगर खबर है भी और खबर नहीं भी है की तर्ज पर प्रेमचंद की 100 से भी ज्यादा उन छोटी छोटी रपटों, टिप्पणियों या कमेंट्स को चाह कर भी हम यहां पर नहीं ले सके है। जिसको देखकर घटना विशेष पर प्रेमचंद के नजरिए को देखना मुमकिन नहीं हो पाया। उन चुटीली टिप्पणियों में एक अलग प्रेमचंद सामने आते हैं. जो ना केवल एक सजग पत्रकार थे, अपितु एक सार्थक सामाजिक प्रवक्ता के रूप में भी अपनी छाप प्रकट करते है। समय समाज, सत्ता संघर्ष, स्वराज, स्वाधीनता दमन, संग्राम और इनसे पीस रही जनता की पीड़ा को प्रेमचंद ने सामने रखा है। उनकी नजर से ना कोई दलित, महिला अभावग्रस्त समाज बाकी रहा और ना ही कोई क्रूर जालिम जमींदार या फिरंगी फौज की दमनकारी नीतियां ही बच पाई। एक पत्रकार के रूप में वे हमारी उम्मीदों से भी बड़े और महान और कालजयी पत्रकार के रूप में उभरते है। इस पहचान को सर्वमान्यता की जरूरत है। ताकि हिन्दी समेत पूरा साहित्य समाज प्रेमचंद को एक तेजस्वी पत्रकार की पत्रकारिता को देख देख कर अपने आपको धन्य माने। पत्रकार प्रेमचंद को लेकर कमसे कम दो और पुस्तकों की योजना चल रही है।
पिछले एक दशक में जापान और भारत श्रीलंका मे सुनामी के ज्वार से लाखों लोगों की बर्बादी और तबाही का खतरनाक मंजर अभी तक यादों में है। पत्रकार प्रेमचंद ने 1934 में बिहार में आए प्रलंयकारी भूकंप और जान माल की तबाही को जो चित्र खींचा है। इस मार्मिक रपट को पढ़कर आज की तबाही, के खतरनाक मंजर का सहज में अंदाजा लगाया जा सकता है। एक पत्रकार के रूप में प्रेमचंद पर बहुत सारी बातें की जा सकती है, मगर यहां पर इस चर्चा को विराम लगाने की बजाय इसे और तेज करना ही मेरा लक्ष्य है। देखना है कि क्या आज के मीडिया वार एज में प्रेमचंद कितना और किस तरह नए रूप में स्वीकार पाना क्या सहज होगा? अपने तमाम पाठकों से पत्रकार प्रेमचंद पर प्रतिक्रिया और बेबाक राय विचारों की आवश्यकता है, ताकि बाद के संस्करणों में आपके विचारों को भी समायोजित किया जा सके।
पत्रकार अनामी शरण बबल ने मशहूर कथाकार और उपन्यासकार प्रेमचंद को एक पत्रकार के रूप में स्थापित करते हुए तीन खंडों में ”प्रेमचंद की पत्रकारिता” पुस्तक का संपादन किया है। इस पुस्तक के दो खंडों में अनामी ने जो भूमिका लिखी है, उसे भडास4मीडिया के पाठकों के लिए खासतौर पर प्रस्तुत किया गया है. इनसे सम्पर्क इन नम्बरों 09868568501, 09868568701,09312223412 के जरिए किया जा सकता है।

