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एक सपना है सौंदर्य

डा. सुभाष राय: सुनो भाई साधो – 6 : केदार जी की एक कविता की कुछ पंक्तियां देखिये… नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है/ जो पहाड़ से मैदान में आयी है/ जिसकी जाँघ खुली / और हंसों से भरी है/ जिसने बला की सुंदरता पायी है/ पेड़ हैं कि इसके पास ही रहते हैं/ झुकते, झूमते, चूमते ही रहते हैं/ जैसे बड़े मस्त नौजवान लड़के हैं। नदी और पेड़ को देखने का यह नजरिया कितना खूबसूरत है। प्रकृति सहज ही सुंदर है। पहाड़, झरने, फूल, तितलियां सभी मन को बरबस मुग्ध कर लेते हैं। परंतु यह भी देखने वाले की नजर पर मुनहसर है। कोई अगर फूल को सिर्फ कारोबारी नजरिये से देखे तो उसके लिए उसके सौंदर्य का महत्व थोड़े पैसों से ज्यादा कुछ नहीं है। चट्टानों को काट, तरासकर बेचने वालों के लिए पहाड़ की क्या महत्ता है?

डा. सुभाष राय

डा. सुभाष राय: सुनो भाई साधो – 6 : केदार जी की एक कविता की कुछ पंक्तियां देखिये… नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है/ जो पहाड़ से मैदान में आयी है/ जिसकी जाँघ खुली / और हंसों से भरी है/ जिसने बला की सुंदरता पायी है/ पेड़ हैं कि इसके पास ही रहते हैं/ झुकते, झूमते, चूमते ही रहते हैं/ जैसे बड़े मस्त नौजवान लड़के हैं। नदी और पेड़ को देखने का यह नजरिया कितना खूबसूरत है। प्रकृति सहज ही सुंदर है। पहाड़, झरने, फूल, तितलियां सभी मन को बरबस मुग्ध कर लेते हैं। परंतु यह भी देखने वाले की नजर पर मुनहसर है। कोई अगर फूल को सिर्फ कारोबारी नजरिये से देखे तो उसके लिए उसके सौंदर्य का महत्व थोड़े पैसों से ज्यादा कुछ नहीं है। चट्टानों को काट, तरासकर बेचने वालों के लिए पहाड़ की क्या महत्ता है?

नहिं पराग नहिं मधुर मधु के बावजूद अली कली सों ही विध्यो के विलास-दर्शन में मदमस्त रहने वालों के लिए स्त्री के सुंदर सुकुमार यौवन का क्या मतलब हो सकता है? कोई भी भौतिक सौंदर्य लंबे समय तक नहीं टिकता। फूल खिलते हैं, मुरझा जाते हैं। नदी बहती है, कभी-कभी बहुत वेगवती होकर लेकिन कभी-कभी सैकत शैया पर तन्वंगी और विरल होकर भी। सच कहें तो अब ग्रीष्म में नदी दिखती ही नहीं, रेत की शैया भर नजर आती है। सागर, बादल, सूरज, तारे सभी अपने समूचे जंगलीपन के साथ खूबसूरत लगते हैं लेकिन कोई भी अपने सौंदर्य का नैरंतर्य कायम नहीं रख पाता है। अपनी झुर्रियों में सिमटी एक बूढ़ी बीमार औरत को देखकर क्या कोई कल्पना कर सकता है कि वह भी कभी जीवन के मधुर सांगीतिक स्पंदनों और भविष्य के सपनों से पूरी तरह भरी रही होगी, खिली होगी, खिलखिलायी होगी, प्रेम किया होगा। मुझे कई बार आईने में अपनी जगह मेरे दिवंगत पिता की शक्ल दिखायी पड़ती है। इसी तरह अपने बेटे को देखते हुए कुछ पलों के लिए जवान हो जाता हूं। कुछ भी स्थायी और स्थिर नहीं है। क्षण-क्षण जीवन है, क्षण-क्षण मृत्यु। सौंदर्य एक सपना है, आंखों में समाया हुआ, एक कल्पना भर है सच और झूठ के बीच, होने और न होने के बीच। सच यह है कि सौंदर्य अपनी रचना में ही सुरक्षित रह सकता है। इस अर्थ में सौंदर्य स्थिर नहीं एक गत्यात्मक अवधारणा है।

केदार जी के सामने जिस खास दृश्य ने नदी और पेड़ के प्रेम का उद्घाटन किया होगा, वह भले न रहे लेकिन वैसे दृश्य हमेशा होंगे। यही सौंदर्य की गत्यात्मकता है। प्रकृति इसीलिए हमेशा सुंदर बनी रहती है क्योंकि वह विनाश और रचना के सतत क्रम में खड़ी रहती है। बीज मिट्टी में पड़ते ही सुंदर अंकुर के रूप में धरती की ऊपरी परत चीरकर बाहर आ जाता है, वृक्ष के रूप में बढ़ता है, फूल रचता है और बीज में बदल जाता है। सागर से पानी वाष्प बनकर उड़ता है, बादल बनता है, सघन होकर बरसता है, विशाल पहाड़ों से झरता हुआ नदियों के रूप में बढ़ता है और फिर सागर की बांहों में समा जाता है। ज्वालामुखी फटते हैं, गर्म लावे की दहकती हुई लाल नदी समुद्र को पाटकर नये द्वीप रचती है। बीज, पक्षियों के अंडे, सांप और तमाम छोटे-छोटे जीव लहरों के साथ बहकर वहां उतर जाते हैं और लरजते बीहड़ बियाबान में जीवन का नया रोमांच शुरू हो जाता है। एक तारा टूटकर पूरे वेग से धरती से टकराता है और उसकी टकराहट से पैदा हुई ऊर्जा से एक चौथाई धरती का जीवन नष्ट हो जाता है। लाखों वर्ष तक अंधकार छाये रहने के बाद वहां फिर सूरज पहुंचता है, ऋतु चक्र शुरू होते हैं और नया जीवन झिलमिला उठता है, रचना का नया संगीत बज उठता है।

इस गति में, परिवर्तन में ही सौंदर्य है। परिवर्तन बिना विनाश के नहीं आता। ध्वंस पर ही नयी रचना खड़ी होती है। इसलिए सौंदर्य रचना में है। वह रचना चाहे प्रकृति की हो या मनुष्य की। प्रकृति एक विशाल गर्भ की तरह है, निरंतर रचती हुई। स्त्री को भी प्रकृति ने गर्भ का वरदान दिया हुआ है। वह रचती है तो मां हो जाती है। उसका मां होना उसके सौंदर्य का पुनर्पाठ है। इस अर्थ में स्त्री की सत्ता विराट प्रकृति से कम नहीं है। अगर कोई कहे कि सुंदर स्त्री को मां नहीं बनना चाहिए तो निश्चय ही वह अज्ञानी है, मूर्ख है। कवि, कथाकार, कलाकार या किसी भी विधा का रचनाकार प्रसव में जाये बगैर कहां रच पाता है। यह पीड़ा तो उसे भी भोगनी ही पड़ती है। रचते हुए वह स्त्री ही हो जाता है, उसकी चेतना एक गर्भ मैं बदल जाती है। वह अपनी रचना का पिता भी होता है और मां भी। जीवन चाहे जितना कुरूप हो, संकटों से भरा हुआ हो, उथल-पुथल से परिपूर्ण हो पर रचना हमेशा सुंदर होती है। रचना एक सपने को शब्द देती है। वर्तमान में जो अग्राह्य है, अस्वीकार्य है, गर्हित है, उसे बदलने की छटपटाहट में नये सपने अंकुरित होते हैं और ऐसे सपने कभी बदसूरत नहीं हो सकते। सपनों के पांव समय में आगे टिक सकते हैं, इसीलिए रचनाकार स्रष्टा है और द्रष्टा भी। सौंदर्य सृजन में है, दृष्टि में है। जो सुंदर है, वही शिव है, वही सत्य भी।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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