: महंगाई से परेशान आम जनता हुई, मजे लूट गए सांसद लोग : लोहिया के अनुयायी होने का दावा करने वाले कर रहे हैं संसद ठप : संसदीय व्यवस्था में पाक-साफ रहकर जीवन के आदर्श को यथार्थ के धरातल पर हू-ब-हू अंकित कराने वाले समाजवादी पुरोधा डा. राममनोहर लोहिया ने 1960 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी खर्च 25 हजार रुपये प्रतिदिन पर सवाल उठाया था, तो यह एक प्रतीक बन गया था। उस समय राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय नौ आना यानी 56 पैसे थी और कुल जनसंख्या 40 करोड़ में से, 20 करोड़ लोग तीन आने रोजाना पर जीवन गुजार रहे थे। ठीक वही हालात आज भी है, देश की जनसंख्या लगभग एक अरब में से 40 करोड़ लोग 20 रुपये प्रतिदिन पर गुजारा कर रहे हैं। मजबूरों, गरीबों और पिछड़ों की हिमायती और लोहिया का सच्चा अनुयायी होने का दावा करने वाले लालू, मुलायम और शरद यादव सांसदों का वेतन भत्ता 5 लाख रुपये प्रतिमाह करने के लिए संसद ठप कर रहे हैं।
यह संयोग ही है कि लोहिया के राजनीतिक आदर्शों को जमीन पर उतारने का हुंकार या स्वांग भरने वाले ये यादव तिगड़ी उसे अपनी राजनीतिक जरूरतों के लिए मिर्च-मसाला की तरह प्रयोग कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब समय के साथ देश, काल और परिस्थितियां बदल गई हैं तो क्या लोहिया जैसे महान नेताओं के सिद्धांत भी बदल जाएंगे? क्या यादव तिगड़ी इस बात का जवाब देगी? क्या वे लोहिया के अनुयायी कहलाने का नैतिक अधिकार रखने लायक रह गये हैं? जब वे संसद में सांसदों का वेतन कारपोरेट सीईओ की तरह लाखों में करने की मांग करते हैं? ढोंग और पाखंड तो राजनीति का हथियार हो सकता है लेकिन सिद्धांतों की कसौटी पर यह खोटा ही साबित होगा।
सांसदी और विधायकी ने उदारीकरण के बाद किस उद्योग का रूप धारण किया है, यह तथ्य चुनाव आयोग की कृपा से देश इसलिए जान पा रहा है, क्योंकि उसने नेताओं की आय, चल-अचल संपत्ति का ब्योरा देने की बाध्यता रख दी। इसके बाद ही देश ने जाना कि हमारे जनप्रतिनिधि पांच साल पहले कहां थे, और आज कहां हैं? जब 16 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर 1000 प्रतिशत की दर से उनकी दौलत बढ़ रही है तो 5 लाख के वेतन पर कहां जाकर रूकेगी? देश की विकास दर 8 प्रतिशत है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की तादाद बढ़ रही है। क्यों? देश की सर्वोच्च ताकतवर संस्था विधायिका यानी संसद का प्रतिनिधित्व करने वाले उन रहनुमाओं को इसके लिए सीधे जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया जा सकता। अपने वेतन के लिए संसद ठप करने वाले गरीबों और पिछड़ों का प्रतिनिधि होने का दावा कैसे कर सकते हैं?
लोहिया जब बीमार पड़े तो उन्हें देखने एक साथ कई डाक्टर आए। एक साथ इतने डाक्टरों को देखकर उनके मुंह से निकल गया था ‘एक आदमी को देखने के लिए इतने डाक्टर? देश की तीन चौथाई जनता तो डाक्टर को देखे बिना ही मर जाती है।’ लोहिया का जीवन आदर्श और यथार्थ में भेद नहीं करने वाला दर्शन था। मरने से पूर्व वेल्गिंटन अस्पताल में भर्ती हुए लोहिया का अपना कोई स्थायी पता नहीं लिखा जा सका था, क्योंकि वह था ही नहीं और मरने के बाद किसी बैंक में कोई खाता नहीं था। यही हाल आज के भारत में 40 करोड़ लोगों के साथ है, और लोहिया के कथित चेलों की आय-व्यय, चल-अचल संपत्ति का विवरण आपके सामने है। यह प्रसंग इसलिए सामने लाना पड़ा क्योंकि सांसदों का वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर अपने को समाजवादी पुरोधा लोहिया का कलयुगी अवतार होने का दावा करने वाले लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव ने ही मुखरता से हो-हल्ला मचाया था और संसद ठप की थी।
जनप्रतिनिधि हमारे नायक होते हैं। वे जो रास्ते बनाते हैं, देश उस पर चलता है, उसका अनुसरण करता है, इसलिए लोग उसे लीडर कहते हैं। आजादी के पहले नेतागिरी एक मिशन था, जज्बा था। साथ में पत्रकारिता भी उसी मिशन का अंग था। आजादी के बाद हमारे देश में विकास की गति जैसे-जैसे तेज होती गई, सांसदी, विधायकी और पत्रकारिता मिशन न होकर धनार्जन का साधन बन गया। देश की आम जनता इस साधन को हासिल करने का साध्य बन गयी। सांसदों का वेतन बढ़ना चाहिए, जैसा वे मांग करते हैं कि भारत सरकार के सचिवों के स्तर तक का वेतन उन्हें मिलना ही चाहिए। 5 लाख प्रतिमाह वेतन भी दिया जाए, इसके लिए भी देश की जनता तैयार हो जाएगी। लेकिन फिर उन्हें अपने को जनप्रतिनिधि कहने की जगह जन प्रबंधकीय निदेशक कहना होगा। जनप्रतिनिधि शब्द के मायने बहुत ही गंभीर और फलक विस्तृत है।
एक ओर जहां इस देश की जनता 20 रुपये रोजाना पर गुजारा कर रही है वहीं दूसरी ओर उसी जनता के प्रतिनिधि होने का स्वांग भरने वाले अपने वेतन बढ़ाने के लिए संसद ठप कर रहे हैं। 80 हजार प्रति माह से कम वेतन मिलने पर वे अपने को अपमानित महसूस करते हैं? आखिर ये भूखे-नंगे-लाचार-बेरोजगार लाखों लोगों के प्रतिनिधि होने का दावा किस नैतिक आधार पर कर सकते हैं? महंगाई पर चली आठ दिनों की वोट बटोरू राजनीतिक कार्यवाही की कीमत भी आम जनता ने ही चुकाए हैं। उसके बाद अगले आठ दिनों तक सभी पार्टियां अलग-अलग आम जनता और गरीब हितैषी होने का प्रमाणपत्र संसद में अपने नेताओं के भाषणों में बांटती नजर आई। मुद्दा कॉमन होने के बावजूद विरोधी दल अलग-अलग महंगाई मोर्चा खोल रखा था। क्यों? आम जनता के लिए ही न, जिसका वे सच्चा प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं!
कुछ कथित प्रतिक्रियावादी कलमकार अपने को साफ सुथरा होने का दावा करते हुए सांसदों का वेतन भत्तों के अलावा 5 लाख रुपये प्रतिमाह करने की वकालत भी कर रहे हैं। दुनिया भर के लोगों को जाहिल और नासमझ साबित करना ऐसे लोगों की शगल होती है। यह अजीब संयोग है कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाले महंगाई का हौव्वा खड़ी कर अपनी महंगाई दूर करने में सफल रहे। संसद में महंगाई पर चली बहस और उसमें स्वाहा हुए लाखों-करोड़ों रुपये तो जनता की ही जेब से गये और मिला क्या? सांसदों की वेतन वृद्धि! महंगाई और बढ़ गयी। सांसदों ने अपने वेतन और भत्ते बढ़ाकर किस पर बोझ डाला है? नेता शब्द आज समाज में किस सोच के रूप में लिया जा रहा है, इसकी अच्छी जानकारी हमारे सांसदों को है। वे यह भी जानते हैं कि देश की आधी आबादी अब तक यह भी नहीं जान पाई होगी कि हमने अपनी वेतन वृद्धि के लिए उनके जेबों को ढीला किया है। जो जानते और चिल्ला रहे हैं वे वोट नहीं देते। तो क्या लोकतंत्र में प्रतिक्रिया पर रोक लगा दिया जाए।
टीवी ने इस खबर को सनसनी की तरह लिया। इसके वाजिब कारण हैं, टीवी की पहुंच महानगरों और नगरों तक सीमित है। टीवी दर्शक तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले होते हैं, बाद में भले वे इसे भूल जाएं, लेकिन मोहल्ला मीडिया का चलन इसी वर्ग में है। इस वर्ग में वोट देने वाले और नहीं देने वाले दोनों तरह के लोग हैं। नेताओं की क्रियाकलापों को लेकर हमारा देश चौकन्ना रहता है और बात जब उनकी वेतनवृद्धि की आयी तो शहरी लोगों के कान खड़े हो गए। महंगाई की मार से बेजार हुए लोगों के घावों पर यह खबर मिर्च मिले नमक छिड़कने के समान था। भले ही लोग और खबरों की बाल की खाल निकालने के लिए लोग टीवी को कोसें, लेकिन महंगाई के समंदर में सांसदों की वेतन वृद्धि की हायतौबा पर टीवी वालों को बधाई दे रहे थे। टीवी चैनल संचालक इस मनोविज्ञान को जानते हैं, तो क्या हमारे सांसद जो लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इस बात से अनजान हैं?
जो लोग सांसदों की वेतन वृद्धि को नाकाफी बताते हुए इसे पांच लाख करने और भत्तों में बेहिसाब वृद्धि करने की वकालत कर रहे हैं, उन्हें राम मनोहर लोहिया के उस वक्तव्य को याद कर लेना चाहिए, जो उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निजी खर्च 25 हजार रुपये पर टिप्पणी करते हुए संसद में कहा था, ‘देश के तीन चौथाई से ज्यादा लोग भले ही तीन आने पर गुजारा कर रहे हों लेकिन इसी देश का प्रधानमंत्री अपने निजी कार्यों पर 25 हजार रुपये खर्च करता है।’ यह जुमला उस समय खूब चला था। आज की परिस्थिति भी उससे उलट कैसे है? महंगाई अपने पूरे शबाब पर है, गरीबों को एक जून की रोटी मुश्किल से मयस्सर हो रही है। बेरोजगारी का आलम बढ़ ही रहा है।
ऐसे में आम जनता की महंगाई दूर करने के नाम संसद को ठप करके अपने वेतन चार गुना करा लेने वाले सांसदों को जनसेवक कैसे कहा जा सकता है। यदि ये सांसद 16 हजार रुपये के वेतन पर चुनाव में करोड़ों खर्च करने की हौसला रखते हैं तो एक दो हजार लोगों को चाय पिलाने और कुछ लोगों को दो चार हजार की मदद करने के भी काबिल होंगे ही! चुनाव के दौरान शराब और नोटों की नदी बहाने के लिए पैसा कहां से आ जाता है? यदि इन माननीयों का वेतन 10 लाख प्रति माह भी कर दिया जाए तो कोई इस बात की गारंटी दे सकता है कि ये चुनाव में शराब और नोट नहीं बांटेंगे? जनता की देखभाल ठीक से करेंगे और महंगाई के मुद्दे पर भाषण देते हुए अपना कल्याण नहीं करेंगे? क्या वेतन बढ़ने से भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाना बंद कर देंगे? यदि उन्हें 5 लाख वेतन चाहिए और कारपोरेट कंपनियों की सीईओ की तरह जीवन चाहिए तो उन्हें सबसे पहले राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए।
संभव है कि उनके लिए किसी मल्टीनेशनल कंपनी में इससे भी ज्यादा का पैकेज मिल जाए और वे वहां मजे से नौकरी कर सकते हैं। नेता बने हैं। समाज का नेतृत्व करने का दंभ भरते हैं तो वेतन का मोह त्यागना होगा। दिखावे के लिए ही सही। जब देश में उदारीकरण की बयार नहीं बह रही थी तब भी सांसद और विधायक बनने के बाद हजारों जनसेवक सात पुश्तों के लिए खजाना भर गए हैं। उदारीकरण के बाद तो सांसदी और विधायकी ने जनसेवा शब्द को ही माखौल बना दिया है। माननीयों का एकमात्र विजन और मिशन यह हो गया है कि जल्द से जल्द कुबेर के खजाने पर कब्जा हो जाए। जनता और जनसेवा इनके किस पहलू को रेखांकित कर रही है। राजनीति के शब्दकोश में सेवक और नौकर कहलाने का जमाना लद चुका है।
लंबे-चौड़े संसदीय क्षेत्र में घूमने के लिए उन्हें भत्ता के रूप में मोटी राशि मिलती है। भले घूमें या नहीं लेकिन भत्ता जरूर उठ जाता है। क्षेत्र की सड़कें चलने लायक नहीं हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? व्यवस्था को पंगु बनाकर जनता को अपनी अहमियत जताने के लिए, चक्कर लगाने के लिए मजबूर कौन किया है? एक अदद राशन कार्ड के लिए सांसद से सिफारिशी पत्र लिखवाने की नौबत लोगों को क्यों आती है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्षेत्र भ्रमण वे जनता की भलाई के लिए करते हैं या अपनी भलाई के लिए यह कहना मुश्किल है।
हमारे देश में लोगों (अपने को ईमानदार कहने वाले पत्रकार से लेकर आम जनता तक) की प्राकृतिक सोच है कि सरकारी धन को लूटने का मौका मिले तो चूकना नहीं चाहिए। 5 फीसदी ही ईमानदार उसे सार्वजनिक धन समझकर लूटने से बाज आयेंगे, बाकी लोगों के लिए वह कामधेनू या कुबेर का खजाना होता है। कुछ लोग अपने को पाक-साफ दिखाने के लिए गप्पे हांकते हैं। मौका मिलता है तो सरकारी टूर ही सही, उसका सदुपयोग करना, ज्यादा से ज्यादा उपभोग करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। सांसदों-विधायकों द्वारा उपलब्ध कराये गये मकान, गाड़ी और फाइव स्टारी थाली को अपना माल समझते हैं। उनके लिए सांसदों का वेतन बढ़ना कितना जरूरी है, इसे समझा जाना चाहिए।
आज की तारीख में राममनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले नेता और पत्रकार दोनों को पेटी चाहिए। एक को चुनाव लड़ने के लिए तो दूसरे को संबंधित मुद्दे के प्रचार के लिए। जब राष्ट्रीय लूट में हिस्सा लेने की बारी आती है तो सारी ईमानदारी धरी की धरी रह जाती है। वे बड़े ही बेशर्मी से तर्क देते हैं, जब समाज को लीड करने वाले ऐसे हैं तो हम वैसा करके कोई गुनाह नहीं कर रहे हैं, यह आम जुमला है। जिसे मारा जाना है, वह है आम जनता, जिसके लिए न तो कोई जनप्रतिनिधि है और न ही पत्रकार। मिशन का दिखावा अब किताबों से भी लुप्त हो चुकी है। लोहिया के आदर्श तो यही सिखाते हैं हमारे सांसदों को। भारत की तुलना अभी भी अमेरिका, यूरोप और इजरायल के सांसदों से नहीं की जा सकती। वहां 20 रुपये पर गुजर बसर करने वाले लोग नहीं के बराबर हैं। इसलिए अमीरों का प्रतिनिधि अमीर हो इसके लिए कोई बहस नहीं कर सकता। गरीबों का प्रतिनिधि लाखों में वेतन उठाये, उसे किस आधार पर गरीबों-भूखों का प्रतिनिधि कहा जा सकता है?
लेखक शशिकांत सुशांत पत्रकार हैं तथा दैनिक भास्कर एवं प्रभात खबर में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

