: कुछ बातें बेमतलब 12 : अहा क्या सौभाग्य है हम हिंदुस्तानियों का। ऐसे मौके पर हमें पाकिस्तानियों की बहुत याद आती है। पाकिस्तानी न हुए बिहार में अपनी जाति के वोटर हो गए। हम तो गदगद हैं कि उन्होंने यानी बाराक साहब ने– बड़े लोगों के साथ साहब लगाना जरूरी होता है, जैसे साहेब खैनी खा रहे हैं या कि जैसे साहेब झूठ वाचन का योग कर रहे हैं या कि साहब नमस्ते सदावत्सले मातृभूमि कर रहे हैं। यहां मातृभूमि का मतलब चुनाव क्षेत्र होता है। हां तो बाराक साहेब में एक बात है कि पूरा सेक्यूलर हैं। बाराक तो नाम है जिसका एक मतलब होता है कि जबरदस्ती के दुनिया के थानेदार हैं। यह भी कह सकते हैं कि हम अंग्रेजों के खानदानी गुलाम हैं। अंग्रेजों की हालत लालू जी जैसी हो गई तो अमरीकियों के गुलाम हो जाते हैं। फिर बाराक साहब में तो खास बात है कि वह हुसैन भी हैं।
उन्होंने अपने देश में कोई दंगा फसाद नहीं करवाया है। लालू जी के समान हर अश्वेत के प्यारे हैं। अभी-अभी वोट में हारे हैं। जैसे बिहार की इकॉनामी लालू जी और उनसे पहले के लोगों ने नामी बना दी, उसी तरह हुसैन के बाद के ओबामा को जो इकॉनामी मिली, वह वैसी ही मिली जैसी नीतीश कुमार को मिली। फर्क इतना है कि कांग्रेसी इसे 20 साल की दुर्गति मानते हैं और नीतीश कुमार 15 साल पटना का और 5 साल दिल्ली का जोड़ लेते हैं। ओबामा किसी को जिम्मेदार नहीं मानते। राजपाट का दो साल पूरा कर भारत भ्रमण पर आए हैं। लोग आगरा का ताजमहल देखने जाते हैं। यह मुंबई का ही ताजमहल से गदगद हैं क्योंकि पाकिस्तानियों ने यहां हमला किया था। अब भारत के साथ सहमत हैं कि आतंकवादी बहुत बुरी चीज है। जैसे बिहार में चुनाव आयोग सहमत है कि बूथ लुटेरे और आतंकवादी एक जैसे होते हैं। जैसे बिहार आ कर राष्ट्रमाता को पता चलता है कि यहां बहुत जात-पात होता है। यह किसी को पता नहीं चलता कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की ताजा रपट में बिहार को चिरकुट माना गया है।
पांच साल में 11 प्रतिशत या 16 प्रतिशत की तरक्की पर बिहार को पहुंचाने वाले नीतीश कुमार चुनाव आयोग की आचार संहिता के कारण चुप हैं। नहीं तो साबित कर देते कि पटना से महंगा मकान तो न्य़ूयॉर्क के मैनहंटन में भी नहीं मिलता। यह मत पूछिएगा कि मैनहंटन क्या होता है। यह पटना का मंदिरी जैसा मुहल्ला होता है। पहले यहां दलित रहते थे। अब नीतीश कुमार के महादलित रहते हैं। अब यह न पूछिए कि महादलित क्या होता है। जो नीतीश कुमार को वोट नहीं देता वह दलित होता है। जो वोट देता है वह महादलित होता है। बाकी शास्त्रों में चौथै दर्जे का कर्मचारी होता है और समय पर वेतन नहीं पाता। गाली वाली भी खाता है। दलित है इसलिए मान्यवर प्रकार का गाली खाता है। हुसैन वोट पाने के लिए नीतीश कुमार ने अपनी चंपु कमिटी से कहा है कि हुसैन को बिहार की शोषणमय विरासत देखने के लिए आमंत्रित किया जाए। चंपु कमिटी के राज्य सभाई सदस्य ने समझाया कि अमेरिका में हुसैन महादलित भी होता है।
सो तय हुआ कि छठ के अवसर पर ओबामा को बिहार बुलाया जाए। चुनाव आयोग अनुमति देने पर विचार कर रहा है कि बाराक को बुलाया जा सकता है या हुसैन को बुलाया जा सकता है या ओबामा को बुलाया जा सकता है। मनमोहन सिंह पहली बार गुस्से में आए कि हमारे मालिक को बिहार बुला रहे हो। दिल्ली के रहते भारत की नाक कटा रहे हो। बुलाना था तो उत्तर पूर्व में बुलाते। ओबामा को असली इंडिया दिखाते।
जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

