मायानगरी मुंबई जहां शाम होते ही रंग बिरंगी लाइटों में डूब जाता है यह शहर. यहां की शाम शाम-ए-अवध तो सुबह बनारस से कम नही.हर शाम लाखों लोग अपनी मस्तियों में डूबने के लिए अपनी तनहाई को दूर करने करने के लिए कहीं ना कहीं कोई ना कोई रास्ता निकाल लेते है. डांस बारों के देर रात तक ना खुलने की वजह से लोगों ने मुजरे का सहारा लिया. मुंबई की बच्चू वाडी, जो कि अपने मुजरों की वजह से मशहूर है. यहां कई कोठे हैं जहां कई सालों से मुजरों की महफिलें सजाई जाती है. जहां ना जाने कितने लोग बरबाद हो गए और कितने करोड़पति कोडी कौड़ी के मोहताज हो गए.
एक दौर था जब दिल्ली और लखनऊ के नवाबों की तफरीह का एक जरिया था मुजरा. मगर गदर के बाद यहा उनकी बरबादी का कारण बना. लखनऊ और दिल्ली से मुजरे का यह काफिला अपना सफर तय करते हुए मुंबई में अपना पडाव डाल दिया और फिर से शुरू हो गई उमराव जान जैसी कई तवायफों की रोजी रोटी. मुंबई में बच्चू वाडी में ऐसे कई कोठे हैं जहां मुजरा कई सालों से चला आ रहा है और इसके शौकीनों की भी तादाद काफी ज्यादा है. इन कोठों पर हर एक की अपनी अपनी अलग कहानी है. हर शाम जब लोग अपने कामों से थक कर चूर हो जाते हैं तो यहां आकर वह मस्तियों मे डूबे नजर आते हैं. दुनिया और माफिया से बखौफ अपनी एक अलग ख्वाबगाह बनाए लोग यहां नोटों की बारिश करते है. और उन नोटों और रोशनियों के बीच मधुर आवाज जो सब को अपने तरफ खीचती है.
हाल ही में प्रशासन की ओर से सख्ती बरतने की वजह से इन सारी जग्हों से मुजरे की महफिलें तकरीबन तकरीबन खत्म हो गई है. मतलब ऐसी जगह जहां की रातों में महफिलें सजी होती हैं. अब वही जगहें सुनसान हो गई हैं..प्रशासन सख्त होना ठीक है लेकिन उसके अलावा इन लोगों की रोजी रोटी के बारे में अगर ध्यान दिया जाए तो शायद कुछ बेहतर उपाय हो सकता है. लेकिन मामला बिल्कुल उसके उल्टा हुआ. रुपए की उछाल में नाचने गाने वाली मुजरों की महफिल की शान बनी रहने वाली महिलाएं. मुजरा बंद होने की वजह से आज इस मुकाम पर पहुंच गईं कि उनको दो वक्त की रोटी भी मयस्सर नही. हालांकि एक वक्त था जब इन कोठों से हर एक की रोजी-रोटी चलती थी, चाहे वह पुलिस वाला हो या खुद यह मुजरा की महफिलों की शान बनी रहने वाली महिलाएं. लेकिन अब हालात बदल गए. अब इन जगहों पर खामोशी और सन्नाटा छा गया. जहां रुपए की रेल पेल रहा करती थी वहां अब फांके की नौबत गई है.
हालांकि इस बारे में आस पास की जो एनजीओज इनकी उद्धार के लिए काम किया करती थीं. वह भी अब इनका हाल दरयाफ्त करने की जरूरत नहीं समझतीं. बच्चू वाडी से ही सटे मुंबई की बदनाम जमाना जगह कमाटीपूरा भी है, यहां पास में एक बैंक है. जो कभी इनकी मदद या लोन जैसी छोटी मोटी जरूरतें पूरी किया करती थी. हालात यह हो गए कि बैंक में ताला लग गया. मतलब एक रही सही उम्मीद पर भी पानी फिर गया. यह बात सच है कि समाज में इस तबके को बडे़ ही गिरी निगाह से देखा जाता है..चाहे वह लखनऊ की महफिल हों या दिल्ली का बाजार..तवायफ और मुजरों का जमाने के साथ चोली दामन का रहा है. उस वक्त के नवाबों का शौक रहा हो या उनकी जरूरत, लेकिन कहीं ना कहीं यही उनकी बरबादी का जरिया भी बनी. यही स्थिति है इस इलाके की यहां भी एक से एक तीस मार खां आए अधिकतर गुजरातियों की आमद का खास केद्रं बना यह बच्चू वाडी और यही उनकी बरबादी का भी.
यह सच है कि यह आज के दौर के लिए मुनासिब नहीं या इसकी की जरूरत नहीं लेकिन उन्हें भी जीने का हक है. अगर सरकार इन सारी गतिविधियों पर लगाम लगा सकती है तो इनके भविष्य के बारे में क्यों गंभीर नही है. मुजरों की महफिलों की जीनत बनी रहने वाली लडकियां जो अपने आप तक पहुंचने के लिए लाखों की गड्डियों को ठुकराती थी, अब वही चंद पैसों के लिए अपने पेट की भूख मिटाने के लिए अपने जिस्म का सौदा करने से नही चूकती. यह इनकी मजबूरी है. इन सारे हालात का अगर जाती तौर से जाएजा लेने के बाद एक बात समझ में आती है कि सरकार शायद इन को मौत के मुंह में झोंकने की कोशिश कर रही है. यही वजह है कि बरसों से चले आर हे मुजरे पर महारष्ट्र सरकार ने पाबंदी लगा दी है. सरकार को इनकी स्थिति के बारे में कुछ ना कुछ बेहतर उपाय सोचने चाहिए. क्योंकि उन्हीं लोगों ने स्थिति ऐसी पैदा की है जो कि खुद एलेक्शन के समय वोटों की भीख मागंने के लिए बहनों से राखी बंधवाने कमाटी पूरा और बच्चू वाडी की तवायफों के पास जाते हैं, तो अब उन से क्यों परदा किया जा रहा है. अब उनसे क्यों मुंह फेरा जा रहा है. सरकार को इस पर गौर करना चाहिए.
लेखक शाहिद अंसारी मुंबई में न्यूज एक्सप्रेस से जुड़े हुए हैं.

