Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

राजनीति-सरकार

कब चेतेंगे हमारे हुक्‍मरान

यूं तो इस विश्व के कई ऐसे भू भाग हैं जिन पर स्वामित्व और आधिपत्य की जंग सदियों से चली आ रही है, किन्तु कुछ भौगोलिक भाग ऐसे भी है  जिन पर अनावश्यक रूप से कलह पैदा की गई, जिससे कि किसी देश के अभिन्न अंग ये भू भाग विवादित हों तथा विश्व समुदाय को उन देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने का मौका मिले और इस बहाने कलह पैदा करने वाले देश अपना उल्लू सीधा कर सके. किसी भी राष्ट्र के भू भाग पर दावा ठोंकने वाले देशों की अगर गिनती की जाये तो भारत की भूमि को अपना बताने वाले देशो की संख्या सबसे ज्यादा है, वस्तुतः भारत का प्रत्येक पड़ोसी देश भारत के किसी न किसी अंग पर अपना मालिकाना हक प्रस्तुत करता ही रहता है, चीन जो कि भारत का एक बड़ा भू भाग कब्जाए बैठा है गाहे-बगाहे अरुणाचल को अपना हिस्सा बताने से नहीं चूकता और पाकिस्तान तो अरसे से कश्मीर को जिन्ना की मिलकियत समझता ही चला आ रहा है.

यूं तो इस विश्व के कई ऐसे भू भाग हैं जिन पर स्वामित्व और आधिपत्य की जंग सदियों से चली आ रही है, किन्तु कुछ भौगोलिक भाग ऐसे भी है  जिन पर अनावश्यक रूप से कलह पैदा की गई, जिससे कि किसी देश के अभिन्न अंग ये भू भाग विवादित हों तथा विश्व समुदाय को उन देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने का मौका मिले और इस बहाने कलह पैदा करने वाले देश अपना उल्लू सीधा कर सके. किसी भी राष्ट्र के भू भाग पर दावा ठोंकने वाले देशों की अगर गिनती की जाये तो भारत की भूमि को अपना बताने वाले देशो की संख्या सबसे ज्यादा है, वस्तुतः भारत का प्रत्येक पड़ोसी देश भारत के किसी न किसी अंग पर अपना मालिकाना हक प्रस्तुत करता ही रहता है, चीन जो कि भारत का एक बड़ा भू भाग कब्जाए बैठा है गाहे-बगाहे अरुणाचल को अपना हिस्सा बताने से नहीं चूकता और पाकिस्तान तो अरसे से कश्मीर को जिन्ना की मिलकियत समझता ही चला आ रहा है.

1962 की लड़ाई के बाद चीन तो खुल कर हिंदुस्तान में आतंकी गतिविधिया संचालित नहीं कर रहा, लेकिन पाकिस्तान के नापाक इरादे जरूर माँ भारती की छाती को 14 अगस्त 1994 से आज तक चली करते चले आ रहे है. कश्मीर के मामले में हिन्दुस्तानी हुक्मरानों की नीतियां बहुत ही विचित्र रही है या अगर सीधे-सीधे कहें तो देश पर सबसे अधिक समय तक शासन करने वाली पार्टी की मंशा कश्मीर को लेकर बहुत स्पष्ट प्रतीत नहीं होती.

आज़ादी के बाद से आज तक कभी इस पार्टी ने पाकिस्तानी कब्जे वाले वाले कश्मीर के मुद्दे को किसी अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर जोरदारी से नहीं उठाया,  जबकि केंद्र में सबसे ज्यादा शासन इसी पार्टी ने किया हालांकि औरों के शासन में भी ऐसा कुछ प्रकाश में नहीं आया, किन्तु कारगिल युद्ध के बाद भारतीय प्रधानमंत्री ने एक हुंकार अवश्य भरी की यदि अब पाकिस्तान हमला करता है तो युद्ध हिन्दुस्तानी धरती पर नहीं होगा, निश्चित रूप से यह सेना का मनोबल बढ़ाने वाला सन्देश था, किन्तु सत्ता परिवर्तन होते ही पोटा जैसे क़ानून की समाप्ति फिर अफजल गुरु जैसे गुनाहगारों की फांसी में ढील देने जैसी तमाम घटनाओं ने आतंक के सरपरस्तों की हौसला आफजाई का काम किया और नतीजा मुंबई हमले के रूप में पूरी दुनिया ने देखा.

किसी राजनीतिक दल की आलोचना अथवा किसी राजनीतिक दल की प्रशंसा किंचित मात्र इस लेख का उद्देश्य का नहीं है, लेकिन उंगलिया उन कदमों पर अवश्य उठेंगी जिन्होंने इस देश की संप्रभुता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया, कुछ सवाल हैं अंतरमन में जो कचोटते हैं, जो विकल कर देते है मन को कि आखिर ऐसा क्यों?

क्या हमारे हुक्मरानों के पास इन सवालों के जबाब है-

(1) कश्मीर घाटी के भीतर हमारी माँ-बहनों से बलात्कार कर उनकी जंघाओं पर जिहाद जिंदाबाद और पाकिस्तान जिंदाबाद लिखने वाले दरिंदो से हिंदुस्तान की सरकार क्या बात-चीत करना चाहती है?

(2) दिलीप पद्गाओंकर जैसे वार्ताकार जो पाकिस्तान से त्रिपक्षीय वार्ता के समर्थन का बयान देते हों, ऐसे वार्ताकारों से केंद्र सरकार क्या सपने संजोये बैठी है?

(3) “कश्मीर का भारत में विलय नहीं हुआ” का बयान देने वाले मुख्यमंत्री, जिसके बाप-दादाओं की निष्ठा हमेशा कटघरे में रही है, उसको कांग्रेसी युवराज और समय देने के पक्षधर क्यों हैं?

(4) हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में लोकतांत्रिक तरीके से चुना गया मुख्यमंत्री सीधे-सीधे हिन्दुस्तानी प्रभुसत्ता को चुनौती देकर बयान जारी करे, ऐसा अधिकार उसको किसने दिया?

(5) जिस प्रकार से श्रीनगर के लालचौक पर पाकिस्तानी झंडा फहराया गया यदि इस प्रकार कि घटना केंद्र के किसी विरोधी राजनीतिक दल द्वारा शासित राज्य में घटित होती तो क्या केंद्र उस राज्य कि सरकार को बिना बर्खास्त किये मान जाता.

(6) कब तक 126 करोड़ का देश 36 करोड़ के देश से अपने यहाँ आतंकी न भेजने की आरजू मिन्नत करता रहेगा?

(7) देश के घोषित शत्रु को कब तक राजकीय अतिथि की भांति शासकीय सुविधाएं देकर आतंकियों को यह सन्देश दिया जाता रहेगा कि भारत आतंकियों के लिए एक क्रीडा स्थली है?

(8) अपने जीवन के कुछ अश्लील प्रसंगों को लिपिबद्ध कर फिरंगियो से बुकर लेने वाली एक महिला क्या संविधान से भी बड़ी है, जो खुल कर संविधान के विरुद्ध बोल रही है?

(9) कारगिल के शहीदों के परिजनों से विश्वासघात कर रुपये कमाने वाले एक मुख्यमंत्री पर आखिर धारा 420 के अंतर्गत कार्यवाही क्यों नही गई?

(10) सशस्त्र सेना बल के अधिकारों में कटौती कर क्या सरकार श्रीनगर की दिवारों पर लिखी Welcome to Pakistan की इबारतों को सच साबित करना चाहती है?

भड़ास के माध्यम से ये सवाल हुक्मरानों को प्रेषित है, अगर सवालों के जबाब अगले लोकसभा चुनावों तक मिल जाये तो अति उत्तम अन्यथा बिहार चुनाव के परिणाम उनको इस बात का भरोसा तो दिला ही देंगे की भारतीय जनता का विश्वाश उनके ऊपर कितना रह गया है.

लेखक क्रांति किशोर मिश्र टीवी पत्रकार हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...