देश के विभिन्न राज्यों में पिछले दो दशकों के दौरान क्षेत्रीय दल भारतीय राजनीति की प्रमुख धुरी रहे हैं। लेकिन उत्तराखण्ड इसका बहुत बड़ा अपवाद है। यहां इकलौते क्षेत्रीय उत्तराखण्ड क्रान्ति दल की हालत देखकर अस्पताल के आईसीयू में पड़े किसी एक मरीज की याद आ जाती है। सूबे की सियासत में अपना वजूद बचाने को संघर्ष करने में इस दल के संगठन और कुल जमा तीन विधायकों में एक राय नहीं है। यूकेडी ने राज्य की भाजपा सरकार से अपना समर्थन तो वापस ले लिया है। लेकिन कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट और अन्य विधायक खुले आम कह रहें हैं कि वह सरकार के साथ हैं। आलम ये है कि दल का नेतृत्व और विधायक आमने सामने आ खड़े हुए हैं। जिससे उत्तराखण्ड क्रान्ति दल में एक बार फिर विभाजन का खतरा पैदा हो गया है। बीते 27 दिसम्बर को दल के केन्द्रीय अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार ने कुछ पदाधिकारियों के साथ राज्यपाल को राज्य सरकार से समर्थन वापसी का पत्र सौंप दिया। उन्होंने पहले ही घोषणा कर दी थी कि यूकेडी साल 2010 के बीतने से पहले ही उत्तराखण्ड की निशंक सरकार से अलग हो जाएगी।
गौरतलब है कि 2007 में सरकार में शामिल होने के समय से ही दल के जमीनी कार्यकर्ताओं का बड़ा तबका इसके खिलाफ आवाज मुखर करता रहा है। यूकेडी के अलम्बरदारों ने कई बार ऐसा करने का दम भरा लेकिन हर बार गीदड़ भभकी से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुआ। इस बार पार्टी नेतृत्व ने मजबूत इच्छाशक्ति तो दिखाई है किंतु विधायक सरकार का साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं। दिवाकर भट्ट के खेमे का कहना है कि विधानमंडल दल के नेता और विधायकों विश्वास में लिए बिना अलोकतांत्रिक तरीके से राज्यपाल को समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंपी गई। दल में तनातनी का आलम ये है कि पहले तो केन्द्रीय अध्यक्ष ने दिवाकर भट्ट को आजीवन पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। जिसके जबाब में कबीना मंत्री दिवाकर के धड़े ने दल के मुखिया त्रिवेन्द्र पंवार को निलंबत करके एक समानांतर कार्यकारी अध्यक्ष की घोषणा कर दी है।
ये हास्यास्पद स्थिति उस उत्तराखण्ड क्रांति दल की है जिसकी स्थापना 25 जुलाई 1979 को मसूरी में हुई। पार्टी का उददेश्य उत्तर प्रदेश से अलग पर्वतीय राज्य के सपने को साकार करना था। उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण के लिए यूकेडी ने अपने वजूद तक को गिरवी रखने में परहेज नहीं किया। इस दल ने राज्य नहीं तो चुनाव नहीं का नारा देकर 1994 में विधानसभा चुनावों का बहिष्कार कर दिया था। उक्रांद ने राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 9 नबम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड देश के नक्शे में एक नए राज्य के रूप में उभरा। राज्य का गठन होना जरूर यूकेडी के लिए गर्व का विषय हो सकता है, लेकिन अपने सपनों के उत्तराखण्ड की सियासत में ही इस दल को आज तक सम्मानजनक स्थान नहीं मिल पाया।
राज्य विधान सभा के 2002 में हुए पहले आम चुनावों में यूकेडी को सिर्फ चार सीटें प्राप्त हुई। वहीं, 2007 के दूसरे विधान सभा चुनावों में उसे और एक सीट कम यानी तीन पर संतोष करना पड़ा। दल के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी और नारायण सिंह जंतवाल को हार का स्वाद चखना पड़ा। संस्थापक अध्यक्ष डीडी पंत के बाद जसवंत सिंह विष्ट, काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट, त्रिवेन्द्र पंवार, विपिन चन्द्र त्रिपाठी, बीडी रतूडी और नारायण सिंह जंतवाल दल की बागडोर संभाल चुके हैं। यानी उक्रांद के तरकश के लगभग सभी तीर आजमाये जा चुके हैं। लेकिन 31 साल की उम्र पूरी करने के बाद भी यह क्षेत्रीय दल अपने पैरों पर खड़े होने की स्थिति में नहीं है।
उत्तर प्रदेश के जमाने में जसवन्त सिंह विष्ट रानीखेत से चुनाव जीतकर दल के पहले विधायक बने। उनके बाद काशी सिंह ऐरी तीन बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे। ऐरी ने उत्तराखण्ड के पहले विधानसभा चुनावों में भी जीत हासिल की। उत्तप्रदेश के जमाने में तो पहाड़ी क्षेत्र में यूकेडी की अहमियत समझी जाती थी। लेकिन उत्तराखण्ड में तो इस दल की प्रासंगिकता पर रही सवाल उठने लगे हैं। गौरतलब है कि राज्य बनने के बाद सत्ता लगातार भाजपा और कांग्रेस के हाथों में रही हैं। इन परिस्थितियों के मददेनजर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि राज्य के इकलौते क्षेत्रीय दल की इतनी दयनीय हालत क्यों है?
उत्तराखण्ड क्रांति दल 2007 ने विधान सभा चुनावों के बाद भाजपा नेतृत्व वाली सरकार को न सिर्फ समर्थन दिया, बल्कि उसमें शामिल हो गया। इस आत्मघाती कदम से दल की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। ऐसा करने वाले में बाहरी नहीं बल्कि दल के लोगों की तादाद ज्यादा है। जमीनी कार्यकर्ताओं ने शुरू से ही राज्य सरकार से समर्थन वापस लेने की मांग शुरू कर दी थी। लेकिन फील्डमार्शल के उपनाम से मशहूर दिवाकर भट्ट का धड़ा हमेशा उसके बीच में दीवार बना रहा।
गौरतलब है कि दिवाकर राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में कबीना मंत्री हैं सो दल में उनकी तूती बोलना स्वाभाविक ही है। 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान यूकेडी में बड़ा अजीबो-गरीब माहौल देखने को मिला। दल ने राज्य सरकार में रहते हुए उत्तराखण्ड की पांचों लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा। पार्टी के शूरमाओं ने उसे फ्रेन्डली फाइट का नाम दिया। काशी सिंह ऐरी और बीडी रतूड़ी ने अपने कार्यकर्ताओं को बेबकूफ बनाने के लिए राज्य सरकार में मिले अपने अपने दायित्वों से इस्तीफा दिया। फिर लोकसभा चुनावों के बीत जाने के बात बेशर्मी के साथ फिर पदभर संभाल लिया। लेकिन यह उम्मीद भी नहीं थी कि 2012 के भावी विधानसभा चुनावों के कमोबेश एक साल पहले दिवाकर भट्ट समर्थन वापसी के मुददे पर आस्तीन चढ़ाकर पार्टी संगठन के सामने ताल ही ठोंक देंगे।
हालांकि दिवाकर भट्ट लंबे समय तक चले राज्य आंदोलन से तपकर निकले हैं। उन्होंने सड़कों पर अपने दल को ला खड़ा करने में बड़ा योगदान दिया है। फिर भी उनका अतिवादी होना किसी से छिपा नहीं है। अतीत में ऐसे मौके आए हैं जब भट्ट पार्टी लाइन के खिलाफ जाते दिखाई दिए। श्रीयंत टापू में धरना देना उसका उदाहरण है। अन्य कारणों के अलावा अतिवादी रवैया 1995 में उत्तराखण्ड क्रांति दल में विभाजन का एक कारण बना। आज एक बार फिर उत्तराखण्ड क्रान्ति दल में ठीक वैसी ही परिस्थितियां बनती नजर आ रही हैं।
वैसे और भी कई ऐसे निर्णय हैं जिन्होंने उक्रांद के ताबूत में कील ठोंकने का काम किया। मसलन 1994 में जब राज्य आंदोलन चरम पर था तो यूकेडी राष्ट्रीय दलों की कुटिल चालों का शिकार हो गया। तत्कालीन नेतृत्व इतना अदूरदर्शी था कि उसने अपने झण्डे को साइड में रखकर राज्य आंदोलन की अगुवाई करना मंजूर कर लिया। कांग्रेस और भाजपा को इल्म था कि यूकेडी के नेतृत्व में आंदोलन में शरीक होने से उनके हिस्से में ज्यादा कुछ नहीं आने वाला। लिहाजा, संयुक्त संघर्ष समिति की अगुवाई में राज्य आंदोलन हुआ। बेचारा उक्रांद यह कह पाने का साहस नहीं जुटा पाया कि हमारी नींव ही उत्तराखण्ड राज्य के लिए पड़ी है। अगर आप राज्य बनाने को लेकर गंभीर हैं तो हमारे पीछे खड़े हो जाइए।
बहरहाल, यह सब अतीत की वो गलतियां हैं जिन्होंने अपने सपनों के ही उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय दल यूकेडी को बेचारा बनाकर रख दिया। लेकिन गजब ये है कि इस दल ने अपनी गलतियां से सबक लेना तो दूर उनको कभी गंभीरता से लेने की जहमत नहीं उठाई। यूकेडी पिछले चार सालों से सत्ता की चासनी तो चाट रहा है, लेकिन फण्ड और संसाधनों का आज भी अता पता नहीं है। उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड बनने के बाद यह दल लगातार अन्दरूनी सिर फुटव्वल के लिए ही ज्यादा सुर्खियों में रहा है। हालांकि पहाड़ का एक तबका आज भी दिल में यूकेडी के लिए साफ्टकार्नर रखता है लेकिन दल अपने आपको एक विकल्प के तौर पर रखने में नाकाम रहा।
उत्तराखण्ड के इस इकलौते क्षेत्रीय दल की दिक्कत यह है कि आज उसके पास सर्वमान्य और सार्वभौमिक पहचान रखने वाला नेतृत्वकर्ता नहीं है। शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी में कहीं वह क्षमता है। लेकिन पहले वह पिछला विधानसभा चुनाव हारे और फिर शह मात के खेल में कबीना मंत्री दिवाकर भट्ट के आगे कमजोर साबित हुए। कमोबेश एक साल बाद 2012 में उतराखण्ड में विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन उसकी तैयारियों में जुट जाने की बजाय यूकेडी विभाजन की दजलीज पर खड़ा है। इन हालातों में शायद ही किसी को ये मुगालता होगा कि आगामी चुनावों में यह दल सत्ता बनाने या बचाने की भूमिका में नजर आएगा। लेकिन यह उत्सुकता सभी को रहेगी कि सूबे की सियासत में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल अपनी प्रांसगिकता साबित कर पाऐगा या फिर हमेशा के लिए बेचारा बनकर रह जाएगा।
लेखक राहुल सिंह शेखावत उत्तराखंड में ईटीवी के संवाददाता हैं.

