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कभी रहा होगा एजुकेशन हब, अब तो सेक्स हब ही लग रहा है इंदौर…

इंदौर: इन दिनों जिहालत के दिन इंदौर में कट रहे हैं। पर अपन भी पक्के पत्रकार हैं, कुत्ते घाई। जहां रहेंगे खबर सूंघना और खोदना न छोड़ेंगे। जिस अपार्टमेंट में रह रहा हूं वहां से आने जाने के कई रास्ते है। और उन्हीं रास्तों में हर दूसरे दिन कोई न कोई लड़का-लड़की गुजरते हैं। चंद दिनों में मुझे रेड लाईट एरिया के रहवासी वाली फिलिंग आने लगी है। शुरुआत कुछ ऐसी होती है कि पहले लड़का आयेगा क्योंकि फ़्लैट उसके दोस्त का है। फिर आयेगी लड़की… मुंह ढाँककर बिलकुल प्रोफेशन स्कॉट जैसे।

इंदौर: इन दिनों जिहालत के दिन इंदौर में कट रहे हैं। पर अपन भी पक्के पत्रकार हैं, कुत्ते घाई। जहां रहेंगे खबर सूंघना और खोदना न छोड़ेंगे। जिस अपार्टमेंट में रह रहा हूं वहां से आने जाने के कई रास्ते है। और उन्हीं रास्तों में हर दूसरे दिन कोई न कोई लड़का-लड़की गुजरते हैं। चंद दिनों में मुझे रेड लाईट एरिया के रहवासी वाली फिलिंग आने लगी है। शुरुआत कुछ ऐसी होती है कि पहले लड़का आयेगा क्योंकि फ़्लैट उसके दोस्त का है। फिर आयेगी लड़की… मुंह ढाँककर बिलकुल प्रोफेशन स्कॉट जैसे।

खैर रोज रोज प्रैक्टिस से प्रोफेशनलिज्म आना लाजमी होता है। और ये कोई मोहब्बत या जन्म जन्मांतर के रिश्ते में भी नहीं है। ये तो कॉलेज टाइम में भागकर दोस्त यारों के फ़्लैट या रुम को इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले लड़का आता है फिर लड़की को बुलाता है। दोनों कमरे में चले जाते हैं फिर जिसमें जितना स्टेमिना उतनी देर “पढ़ाई” करते हैं। अब ऐसी पढ़ाई से मिलने वाली डिग्री वही होती है जिसका रिजल्ट आते ही बाप चोटी पकड़कर चट मंगनी पट ब्याह कर देता है पहली फुर्सत में जो लड़का मिले उसी से। क्योंकि उसे तो इसी समाज में रहना है न भाई… उसे खुद ही अपनी बचानी पड़ेगी।

फिर पता चला बाजू के फ़्लैट में लड़का रहने आया है जो पहले किसी लड़की के साथ रहता था और लोगों को बता रखा था की वो दोनों “कजन” हैं। माँ-बाप को लड़के के कारनामे पता लगे तो उठा लाये सामान सहित और हमसे बता गये पूरी राम कहानी। बाकी इंदौरियन स्टूडेंट कैसी पढ़ाई कर रहे हैं आपको बता दिया। खासकर जो बाहर से लड़के पढ़ाई का ड्रामा करने आते हैं और बाप के हराम के पैसों का भरपूर इस्तेमाल करके लड़की के साथ पलंग तोड़ रहे हैं। सतर्क हो जाइये कभी औचक निरक्षण भी कीजिये। कॉलेज फोन करके औलाद की जानकारी भी लीजिये। वरना फिर मत कहियेगा पत्रकार बाबू ने पहले चेताया नहीं अब इतने कम समय में “अच्छा” रिश्ता कहां से लायें। क्योंकि इनमें से ज्यादातर वही बच्चे हैं जो घर में बड़े शरीफ हैं। इसीलिये बाहर आकर कांड करते हैं।

फिलहाल तो जो दिख रहा है वो बड़े स्तर पर चिंतनीय है। न केवल भटकती या यह कहें मर्जी से भटकती औलाद बल्कि उसके अनभिज्ञ या तथाकथित मॉडर्न पेरेंट्स दोनों के लिए। क्योंकि हमारा समाज अभी इतना मॉडर्न नहीं हुआ कि लड़का-लड़की को रुम में घण्टों बन्द देख गर्व महसूस करे। हाँ तो शहर की आबोहवा ऐसी है कि सड़क से लेकर शॉपिंग कॉम्पलेक्स तक लिपटा चिपटी करते लड़का-लड़की मिलेंगे। यहां जो लड़की ईजी टारगेट लगती है उसे विशेष नाम “चिंकी” से सम्बोधित किया जाता है। यानी उस लड़की के पीछे जा सकते हैं। मौका देख उसे धर सकते हैं। और भी ज्यादा मायने है उस शब्द के लेकिन जानने लायक इतना ही है।

आशीष चौकसे

पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर

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